टूट भी सकती है कांग्रेस
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इस बार के लोकसभा चुनाव का जनादेश निर्णायक नेतृत्व के पक्ष में है। इस जनादेश में यह साफ दिखता है कि लोगों में यूपीए सरकार की नेतृत्वहीनता के प्रति कितना गुस्सा और आक्रोश था। महंगाई, भ्रष्टाचार, अर्थव्यवस्था, विदेश नीति आदि के मोर्चे पर यूपीए सरकार की नीतिगत अपंगता से लोग आजिज आ चुके थे। जब भी कोई समस्या सामने आई, यूपीए सरकार जनता को यह भरोसा नहीं दिला पाई कि वह उन समस्याओं को खत्म करेगी। हर समस्याओं के लिए बस बहाने ढूंढती रही, जिससे आम लोगों का सरकार और उसका नेतृत्व कर रही कांग्रेस पर से भरोसा उठ गया। लोगों को एक निर्णायक नेतृत्व की तलाश थी, जो उन्हें नरेंद्र मोदी में दिखी। इसलिए जनता ने नरेंद्र मोदी को बहुमत से जिताया, ताकि वे निर्बाध लोगों की आकांक्षाओं को पूरा कर सकें। लेकिन लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। उनके पास यूपीए की तरह यह बहाना भी नहीं होगा कि गठबंधन राजनीति की कुछ मजबूरियां होती हैं।
इसके अलावा इन नतीजों से यह भी स्पष्ट है कि अब तक जो नेता निर्वाचन क्षेत्र को अपनी जागीर समझते थे, वैसी बात नहीं रह गई है। राहुल गांधी और सुप्रिया सुले के निर्वाचन क्षेत्रों की स्थिति इसके उदाहरण हैं। अब अगर कोई नेता यह समझेगा कि अमुक सीट तो हमारी अपनी पुश्तैनी सीट है, हम यहां से जीतेंगे ही, तो ऐसा नहीं होने वाला। अब जनता जागरूक हो गई है और कोई भी नेता अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों को हल्के में नहीं ले सकता।
जहां तक कांग्रेस की बात है, वह अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। आपातकाल के बाद जब इंदिरा गांधी हारी थीं, तो बहुत कम समय में उन्होंने वापसी की थी। लेकिन अभी कांग्रेस में वैसा कोई करिश्माई नेतृत्व नहीं दिख रहा है, जो कांग्रेस को इस कठिन घड़ी में उबार सके। अब भी कांग्रेस के नेता इस हार के लिए सामूहिक जिम्मेदारी की बात कहते हैं। यह एक तरह से सोनिया और राहुल गांधी को बचाने जैसा है। हालांकि सोनिया और राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होने के नाते अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की है, पर उन्हें आत्मनिरीक्षण करना होगा।
आज जो स्थिति है, उसमें कांग्रेस की हालत क्षेत्रीय दलों जैसी हो गई है। उसके पास इतने भी नंबर नहीं हैं कि वह विपक्षी दल की भूमिका निभा सके। दूसरी ओर भाजपा इस चुनाव में अखिल भारतीय स्तर की पार्टी बनकर उभरी है। अगर कांग्रेस ने अपने नेतृत्व में बदलाव पर विचार नहीं किया, तो इस बात का भी जोखिम है कि कहीं पार्टी टूट न जाए। ऐसा होगा ही, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन हो सकता है कि कांग्रेस के कुछ नेता कुछ पुराने कांग्रेसियों, जो पार्टी में एक परिवार के वर्चस्व के कारण बाहर जा चुके हैं, के साथ मिलकर अलग समूह बना लें। कांग्रेस को अब बिल्कुल सतह से शुरुआत करनी होगी और पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। ऐसे में यह हो सकता है कि कांग्रेस अब प्रियंका गांधी को आगे लाए, जैसी पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की लंबे समय से अपेक्षा रही है। इस चुनाव में जब प्रियंका अमेठी और रायबरेली में प्रचार करने उतरीं, तो उनके करिश्माई व्यक्तित्व और दबंगई ने लोगों को प्रभावित किया।