फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Difference between electoral victory and good governance: BJP under PM Modi political crisis of opposition

चुनावी जीत और सुशासन में फर्क : पीएम मोदी के नेतृत्व में भाजपा और विपक्ष के समक्ष राजनीतिक जमीन का संकट

Sun, 25 Sep 2022 07:03 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 25 Sep 2022 07:03 AM IST
विज्ञापन
सार
एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014 के बाद से सीबीआई द्वारा गिरफ्तार या छापेमारी करने वाले 95 फीसदी राजनेता विपक्षी दलों के हैं। केंद्र सरकार ने गुप्त चुनावी बांड योजना, और स्वतंत्र मीडिया चैनलों को धमकाकर और सच बोलने वाले पत्रकारों को गिरफ्तार करके भी राजनीतिक प्रक्रिया को अपने पक्ष में विकृत करने की कोशिश की है।
loader
Difference between electoral victory and good governance: BJP under PM Modi political crisis of opposition
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह। - फोटो : पीटीआई

विस्तार

नरेंद्र मोदी द्वारा भाजपा का नियंत्रण अपने हाथ में लेने के बाद से उनकी पार्टी ने 2014 और 2019 के आम चुनावों में अपने दम पर बहुमत हासिल किया है। यह ऐसी उपलब्धि है, जिसे हासिल करने के करीब भी वह कभी नहीं पहुंच पाई थी। कभी उत्तर और पश्चिम तक सिमटी रहने वाली भाजपा ने पूर्व और दक्षिण में भी अपना प्रभाव बढ़ाया है। मोदी के राष्ट्रीय फलक पर आने की अपनी महत्वाकांक्षा को सार्वजनिक करने से पहले तक बहुत कम लोगों ने सोचा होगा कि भाजपा पश्चिम बंगाल में दूसरे नंबर की पार्टी बन सकती है, अपने दम पर असम में सत्ता में आ सकती है और तेलंगाना में भी सत्ता हासिल करने के करीब पहुंच सकती है।



हालांकि चुनावों में भाजपा की प्रभावी जीत प्रभावी शासन में नहीं बदल सकी है। मई, 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से भारत आर्थिक, सामाजिक, नैतिक और संस्थागत रूप से अपने रास्ते से भटक गया। महामारी के टूटे कहर से पहले ही नोटबंदी और पैबंद लगी जीएसटी ने अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा दिया था और फिर कोविड के दौरान प्रधानमंत्री की नीतियों ने उसे और नुकसान पहुंचाया। मोदी की सत्ता के दौरान खतरनाक रूप से संपत्ति कुछ पसंदीदा पूंजीपतियों के हाथों में केंद्रित हो गई है और दूसरी ओर श्रम भागीदारी दर में गिरावट आई है। 


केंद्रीय गृहमंत्री की देखरेख में मुस्लिमों को कलंकित करने और हमारे सबसे अधिक आबादी वाले राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा उत्साह के साथ इसे आगे बढ़ाने से पहले से कमजोर सामाजिक ताना-बाना और तार-तार हो गया है। हमारे श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में योग्यता के बजाय विचारधारा के आधार पर कुलपतियों/ निदेशकों की नियुक्तियां किए जाने से विज्ञान तथा ज्ञान सृजन के क्षेत्र को बड़ा झटका लगा है। कुछ ऐसे सार्वजनिक संस्थान जिनसे स्वतंत्र रूप से काम करने की अपेक्षा रही है, वे हिंदुत्व की विचारधारा के औजार बन गए हैं; और अन्य संस्थान निर्लज्ज तरीके से सत्ता के करीबी पूंजीपतियों के लिए पक्षपाती हो गए हैं। 

कुल मिलाकर मोदी सरकार का सत्ता में रहने का रिकॉर्ड अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारों की तुलना में काफी कमतर है। वे अर्थव्यवस्था के संचालन में अक्षम हैं और उन्होंने समाज का गहराई से ध्रुवीकरण कर दिया है, उन्होंने सांविधानिक संस्थानों को खोखला कर दिया और हमारे लोकतंत्र को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया, इसके बावजूद मोदी की पार्टी को इन पंक्तियों के लिखे जाने तक राष्ट्रीय स्तर पर किसी तरह की चुनौती नहीं है। इस साल की शुरुआत में हुए पांच राज्यों के चुनावों में चार में जीतने के बाद भाजपा 2024 के आम चुनाव में जीत की प्रबल दावेदार हो गई।

उनकी यह आरामदायक स्थिति उनके वित्तीय संसाधनों, वैचारिक प्रतिबद्धता, संगठनात्मक ताकत और राज्य संस्थानों के नियंत्रण के कारण है, और दूसरी तरफ एक विश्वसनीय राष्ट्रीय विपक्ष की कमी है। एक उदासीन प्रशासनिक रिकॉर्ड के साथ स्थायी राजनीतिक सफलता की परिघटना आधुनिक दुनिया में असामान्य नहीं है। रूस में व्लादिमीर पुतिन, तुर्की में रिसेप एर्डोगन और जिंबाब्वे में रॉबर्ट मुगाबे ने लंबे समय तक सत्ता सुख भोगा है, बावजूद इसके कि उनके शासनकाल में उनके देश की अर्थव्यवस्था, संस्थाएं, सामाजिक ताना-बाना और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा छिन्न-भिन्न हो गई। 

भारत के एक इतिहासकार के रूप में मैं छोटी-सी तुलना करना चाहूंगा, जो कि वास्तव में इसके काफी करीब है। मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा केंद्र के स्तर पर उसी का अनुकरण कर रहे हैं, जो ज्योति बसु और माकपा ने पश्चिम बंगाल में पहले किया था। वाम मोर्चा, माकपा जिसका प्रमुख घटक था, 34 बरसों तक कोलकाता में सत्ता में रहा। उसमें से 23 साल ज्योति बसु मुख्यमंत्री रहे। और वह कोई प्रभावी मुख्यमंत्री भी नहीं थे। भारत में मोदी की भाजपा की तरह पश्चिम बंगाल में बसु की माकपा चुनाव जीतने में माहिर थी और शासन में अयोग्य। 

1977 में जब ज्योति बसु पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने, उस समय उसके पास मजबूत औद्योगिक आधार था, शानदार यूनिर्विसिटी थीं, तट तक पहुंच थी और समृद्ध सांस्कृतिक जीवन था। यदि राज्य सरकार को समझदारी से चलाया गया होता, तो पश्चिम बंगाल आज भारत के सर्वाधिक विकसित प्रदेशों में से एक होता। माकपा अपने आप में पश्चिम बंगाल में कुछ है और केरल में कुछ और। केरल में वाम जाति और लैंगिक समानता को लेकर सामाजिक आंदोलनों से प्रेरित रहा है और सत्ता में रहने के दौरान उसने शिक्षा और स्वास्थ्य पर गंभीरता से ध्यान केंद्रित किया है। 

राज्य में कांग्रेस के साथ बारी-बारी से सत्ता में हिस्सेदारी करने के कारण उस पर एक जवाबदेही का दबाव भी रहा है। मानव विकास में उनके योगदान के संदर्भ में, केरल में कम्युनिस्टों के पास गर्व करने के लिए बहुत कुछ है। पश्चिम बंगाल के उनके कॉमरेडों के पास ऐसा कुछ नहीं है। फिर भी, माकपा वहां चुनाव जीतती रही। क्यों? एक बात तो यह है कि इसके कार्यकर्ता अन्य दलों की तुलना में अधिक संख्या में, अधिक व्यापक रूप से बिखरे हुए और अधिक प्रतिबद्ध थे। ज्योति बसु जहां पार्टी का सार्वजनिक चेहरा थे, उनकी कुलीनता और परिष्कार ने उन्हें कोलकाता के मध्यम वर्ग से प्रशंसा दिलाई, वहीं प्रमोद दासगुप्ता और अनिल विश्वास जैसे प्रतिबद्ध नेताओं ने जिलों में पार्टी के विकास की कड़ी निगरानी की।

माकपा की चुनावी सफलताओं के लंबे समय तक चलने का एक अन्य कारण यह था कि, 'सर्वहारा अंतरराष्ट्रीयवाद' के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के बावजूद, मतदाताओं के लिए इसने सफलतापूर्वक खुद को बंगाली गौरव की पार्टी के रूप में प्रस्तुत किया। खासतौर से चुनाव के समय जब कांग्रेस उसकी मुख्य प्रतिद्ंवद्वी थी और केंद्र में राज कर रही थी, तब वह मुद्दा बनाती थी कि, 'सेंटर कॉम दिये छे' (केंद्र ने कम हिस्सा दिया)। (विडंबना यह है कि बंगाली क्षेत्रीय गौरव की यह तख्ती तृणमूल कांग्रेस ने उठा रखी है, जो अब राज्य में प्रमुख पार्टी है और उसने भाजपा को किनारे कर रखा है, जो कि अभी केंद्र में है)।

निरंतर आर्थिक विकास और रोजगार सृजन केंद्र की मोदी सरकार से परे की चीज है, (जैसा कि पश्चिम बंगाल में बसु सरकार के लिए था), इन दोनों ने लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के साथ कुछ सफलता हासिल की। वाम मोर्चे द्वारा 'ऑपरेशन बर्गा' के तहत जारी किए गए भूमि अधिकार और भाजपा द्वारा प्रचारित रसोई गैस और मुफ्त राशन योजनाओं में साम्य देखा जा सकता है। चुनाव के समय इन लाभों का सत्तारूढ़ दलों को लाभ हुआ।

अतीत के पश्चिम बंगाल और आज के भारत के बीच ये राजनीतिक समानताएं गौर करने लायक हैं। यकीनन, उनमें कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। राष्ट्रीय राजधानी के प्रति एक प्रांत की नफरत सामाजिक ताने-बाने के लिए उतनी हानिकारक नहीं है, जितनी पहले से ही कमजोर धार्मिक अल्पसंख्यक के लिए धार्मिक बहुमत की नफरत। ज्योति बसु एक अप्रभावी प्रशासक थे, लेकिन, नरेंद्र मोदी के विपरीत, उन्होंने कभी भी अपने चारों ओर एक व्यक्तित्व पंथ का निर्माण करने की कोशिश नहीं की। बसु में एक बुनियादी शालीनता थी, एक निश्चित समझदारी थी, जो हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री में पूरी तरह से नहीं है। वह मोदी से कहीं अधिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे। अंत में, एक राज्य की प्रगति को रोकना स्पष्ट रूप से पूरे देश की प्रगति को रोकने की तुलना में बहुत कम लोगों को आहत करता है।

एक और बड़ा अंतर यह है कि, मोदी की भाजपा ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को परेशान करने के लिए जांच एजेंसियों पर अपने नियंत्रण का इस्तेमाल किया है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014 के बाद से सीबीआई द्वारा गिरफ्तार या छापेमारी करने वाले 95 फीसदी राजनेता विपक्षी दलों के हैं। मोदी और शाह के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने गुप्त चुनावी बांड योजना, और स्वतंत्र मीडिया चैनलों को धमकाकर और सच बोलने वाले पत्रकारों को गिरफ्तार करके भी राजनीतिक प्रक्रिया को अपने पक्ष में विकृत करने की कोशिश की है।

पश्चिम बंगाल का आधुनिक इतिहास बहुत स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है कि लगातार कई विधानसभा चुनाव जीतना सुशासन या सामाजिक कल्याण की गारंटी नहीं है। अगर भाजपा इसी तरह से देश को चलाते हुए आम चुनाव जीतती रहती है, तो यह आधुनिक भारत की भी कहानी हो सकती है। एक पुरानी कहावत, 'बंगाल आज क्या सोचता है, वही कल भारत सोचेगा', एक बार फिर सच साबित हो रही है, हालांकि पहले से कहीं ज्यादा गहरे और भयावह अंदाज में।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed