16 दिसंबर: दहशत का एक पन्ना
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दिल्ली में रह रही एक लड़की स्वप्ना की डायरी का एक पन्ना मिला है। वैसे इसे लिखने वाली लड़की का नाम रिया, श्रद्धा, रूपम, या रानी कुछ भी हो सकता है, जो भी आप तय कर लें, लेकिन उसके लिखे को पढ़ना इसलिए भी जरूरी है कि आज से ठीक एक साल पहले 16 दिसंबर को दिल्ली ने दरिंदगी का एक ऐसा चेहरा देखा था, जो किसी सभ्य समाज का चेहरा नहीं हो सकता है।
आज एक साल बाद कहां है दिल्ली? यहां ख्वाब बुनने आई एक लड़की को क्यों लिखनी पड़ रही है ऐसी डायरी?
अब डर लगता है। घर हो या बाहर, अकेले में डर लगता है। सड़क पर पीछा करती पदचाप डराती है। बस और ट्रेन में सफर करते डर लगता है। दुनिया की आधी आबादी से अब डर लगने लगा है। 16 दिसंबर की दिल्ली गैंगरेप की घटना ने हर अनजान पुरुष के प्रति असुरक्षा और गहरे अविश्वास से भर दिया है।
कौन जानता था?? दिल्ली के मेरे इस सफर में मुनिरका बस स्टैंड और यादव बस सर्विस की बस से ऐसी दिल दहलाने वाली याद जुड़ जाएगी। मुनिरका का बस स्टैंड और यादव बस सर्विस की वो सफेद स्कूल बस, जघन्य वारदात के गवाह बन जाएंगे। वो बस स्टैंड...जहां से रोज सैकड़ों लोगों का सफर शुरू होता है, वहां से एक युवा जिंदगी का दर्दनाक अंत शुरू होगा। लोगों को सर्दी, गर्मी और बरसात में आश्रय देने वाला बस स्टैंड श्रद्धांजलि स्थल बन जाएगा।
अपने घर मुनिरका से नोएडा स्थित ऑफिस जाने के लिए मेरा सफर भी उसी बस स्टैंड से शुरू होता है। 9 साल से ये सिलसिला चल रहा है। यहां से शुरू होने वाला सफर साउथ एक्सटेंशन पहुंचकर वहां से यादव बस सर्विस की किसी स्कूल बस से नोएडा के लिए आगे बढ़ता था। साउथ एक्स. से मेरे साथ होती थीं, एक प्राइवेट इंस्टीट्यूट की मेरी हमउम्र लेक्चरर। डीटीसी की बस में सीट की कमी और भीड़ से बचने के लिए ये बेहतर विकल्प था।
यादव बस सर्विस के ड्राइवर-कंडक्टर हमसे भली-भांति परिचित हो गए। हमारे आने-जाने का टाइम और छुट्टी का दिन, यहां तक कि शिफ्ट तक की जानकारी उन्हें हो गयी थी। वो साउथ एक्स. से चढ़ने वाली "लेडीज सवारी" को खुशी-खुशी सीट जरूर दिलवा देते थे। पुरानी सवारी को किराये में 5 रुपए का कंसेशन अलग से। रोज 45 मिनट के सफर के लिए इससे ज्यादा सुविधा और भला क्या मिल सकती थी।
16 दिसंबर 2012 की रात घटी दिल्ली गैंगरेप की वारदात के बाद मुनिरका बस स्टैंड अखबारों और उसका साइन बोर्ड इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के फुटेज में सुर्खियों में रहा। लेकिन अब इस बस स्टैंड का चमचमाता साइन बोर्ड और यादव बस सर्विस का नाम मुझमें सिहरन पैदा करता है।
हमारी बस के तमाम कंडक्टर-ड्राइवर के चेहरे, उनकी आपस में बातें, हंसी-ठिठौली की याद घबराहट पैदा करती है। लगता है, पता नहीं...वो 6 अपराधी, कहीं उन्हीं में से तो कोई नहीं। घटना से 3 दिन पहले 13 दिसंबर को श्री राम कला केंद्र में फैज़ का नाटक देखकर मेट्रो से हौजखास और वहां से मुनिरका तक ठीक उसी रास्ते से लौटी थी, जिस रास्ते उन दरिंदों ने 16 दिसंबर को कहर बरपाना शुरू किया था।
लेकिन अब उस घटना के बाद से सब कुछ बदल गया। अनजान पुरुषों के प्रति मन का विश्वास कम हुआ ही, घर से निकलने-आने-जाने का समय और तरीका भी बदल गया। अब दिल्ली में अंधेरा होने के बाद अकेले नहीं निकलती। नाटक देखने के लिए नियमित तौर पर मंडी हाउस जाना एकदम बंद कर दिया। नोएडा जाने का रास्ता और जरिया भी बदल दिया। अब बस का सफर छोड़ मेट्रो से सफर करती हूं। ये नया जरिया और रास्ता लंबा भी है और महंगा भी। लेकिन ये महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी देता है। और सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं।
हर रोज मैं उस अनजान बहादुर लड़की को याद करती हूं। खबरों में देखी-सुनी बातें मन-मस्तिष्क में बार-बार कौंधती हंै। अनदेखी घटना बार-बार आंखों में तैरती है। पाशविक बल के सामने वो अकेली हार गयी, लेकिन उसके हौसले और हिम्मत ने जीत लिया करोड़ों लोगों का दिल। वो सो गयी, लेकिन जगा गयी सोए हुए समाज को। इस घृणित अपराध, अपराधी और पीड़ित के प्रति समाज का नजरिया बदल गयी। निर्भया,..तुम्हें हमने नहीं देखा...लेकिन अब अपने-आप में हम रोज तुम्हें देखते हैं।