धूप आने दो: सहदेव और अग्निदेव में क्यों हुआ युद्ध, संस्कृति के पन्ने बताएंगे कहानी
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विस्तार
हस्तिनापुर का विभाजन हुआ, तो पांडवों के हिस्से में इंद्रप्रस्थ का राज्य आया। उन्होंने राजसूय यज्ञ करने से पहले दिग्विजय यात्रा संपन्न करने का निश्चय किया। युधिष्ठिर को छोड़कर शेष चारों भाई अलग-अलग दिशाओं में विजय-यात्रा पर निकल गए। माद्री-नंदन सहदेव को दक्षिण दिशा में भेजा गया। यात्रा के बीच में माहिष्मतीपुरी के राजा नील ने सहदेव के सामने समर्पण करने से मना कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप दोनों में युद्ध छिड़ गया।
सहदेव ने अचानक देखा कि उसकी पूरी सेना आग की लपटों से घिर चुकी थी। सहदेव को इसका कारण समझ में नहीं आया, तो उसने अग्निदेव का आह्वान करके उनसे पूछा, ‘हे अग्निदेव, मैं विजय-यात्रा पर निकला हूं। आप मेरी सेना को घेरकर मेरा विरोध क्यों कर रहे हैं?’ अग्निदेव बोले, ‘प्रिय सहदेव, मेरा तुमसे वैर नहीं है। परंतु राजा नील की पुत्री, सुदर्शना मेरी पत्नी है और मैं केवल अपने वचन का पालन कर रहा हूं।’ सहदेव चौंका। ‘कैसा वचन? माहिष्मतीपुरी की राजकुमारी आपकी पत्नी कैसे हुई?’ उसने प्रश्न किया।
अग्निदेव ने रहस्य खोला, ‘राजा नील के महल में एक अग्निहोत्र-कक्ष है, जहां वह अपनी पुत्री सुदर्शना के साथ प्रतिदिन यज्ञ करते हैं। एक दिन यज्ञ के दौरान मैंने सुदर्शना को देखा, तो मैं उसके सौंदर्य पर मुग्ध हो गया। मेरी एकाग्रता भंग हुई, तो कुंड की अग्नि भी बुझ गई। नील द्वारा प्रयास करने पर भी अग्नि प्रज्वलित नहीं हो सकी। फिर सुदर्शना ने हवन-कुंड में फूंक मारकर अग्नि को पुन: जागृत किया। मुझे सुदर्शना की फूंक से इतना सुख मिला कि मुझे उससे प्रेम हो गया। फिर प्रतिदिन यही होने लगा। सुदर्शना की फूंक के बिना मैं कुंड में अग्नि प्रज्वलित नहीं होने देता था! आरंभ में नील को लगा, यह मात्र संयोग है, किंतु फिर वे जान गए कि मैं सुदर्शना से प्रेम करता हूं। राजा ने सुदर्शना से मेरा विवाह कर दिया, परंतु इसके बदले नील ने मुझसे वचन ले लिया कि मैं सदैव उनके राज्य की रक्षा करूंगा। इसलिए माहिष्मतीपुरी पर जो भी आक्रमण करता है, मैं उसकी सेना को घेरकर नील के राज्य की रक्षा करता हूं। मैंने तुम्हारे साथ भी यही किया, क्योंकि मैं नील को दिए वचन से बंधा हूं।’
यह सुनकर सहदेव निराश हो गया। उसने कहा, ‘यह बड़ी समस्या हो गई। आप नील के राज्य की रक्षा के प्रति वचन से बंधे हैं और मैं विजय-यात्रा संपन्न करने के संकल्प से बंधा हूं। परंतु आपके रहते मेरा संकल्प पूरा नहीं हो सकता। दोनों में से एक को अपना वचन भंग करना ही पड़ेगा। मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि मुझे विजयी होने का आशीर्वाद दें, अन्यथा मैं यहीं प्राण त्याग दूंगा।’ यह कहकर सहदेव ने अग्निदेव के सामने कुशासन बिछाया और वहीं जमकर बैठ गया।
सेना का विनाश करने में अग्निदेव सक्षम थे, परंतु वह धर्मसंकट में फंस गए। एक ओर, माहिष्मतीपुरी की रक्षा करने का वचन था। दूसरी तरफ, अग्निदेव को पता था कि सहदेव को कुछ हुआ, तो पांडवों के कोप से राजा नील को कोई नहीं बचा पाएगा। अग्निदेव ने सहदेव की सेना को क्षति नहीं पहुंचाई। उन्होंने सहदेव को इस गतिरोध को दूर करने का आश्वासन भी दे दिया। परंतु माहिष्मतीपुरी पर विजय प्राप्त किए बिना सहदेव लौट नहीं सकता था, तो वहीं राजा नील के समर्पण करने का कोई सवाल नहीं उठता था।
कुछ देर सोचकर अग्निदेव, नील के पास गए और उसे समझाया, ‘महाराज, आप पांडवों की सेना को चक्रवात मानिए। उनसे देवता भी युद्ध में जीत नहीं सकते। उनके मार्ग में जो आएगा, वे उसे ध्वस्त कर देंगे। फिलहाल, सहदेव अकेले हैं। यदि इन्हें कुछ हुआ और सब पांडव यहां आ गए, तो आप माहिष्मतीपुरी का अस्तित्व मिटा ही समझिए। आप मेरे श्वसुर हैं, पिता-तुल्य हैं, इसलिए मैं आपको सुझाव देता हूं कि सहदेव को विजयी मानकर अपनी प्रतिष्ठा और राज्य, दोनों की रक्षा कीजिए।’ तब नील ने सहदेव को विजयी मान लिया। माहिष्मतीपुरी पर विजय प्राप्त करके सहदेव अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गया और अग्निदेव की चतुराई से सहदेव और नील, दोनों के आत्म-सम्मान की रक्षा हो गई।