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अब तो संभले बांग्लादेश
नीलांजन मुखोपाध्याय
Updated Sun, 03 Jul 2016 08:03 PM IST
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नीलांजन मुखोपाध्याय
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ढाका के पॉश गुलशन इलाके के एक कैफे में आतंकवादी हमला सिर्फ बांग्लादेश के लिए नहीं, भारत के लिए भी चिंताजनक है। आतंकवादियों ने जिस तरह कैफे को निशाना बनाया, उससे मुंबई के कोलाबा में हुए कैफे पर हमले की याद ताजा होती है। मुंबई की तरह ढाका में भी ज्यादातर विदेशी ग्राहकों को मारा गया।
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लेकिन भारत की वित्तीय राजधानी में 2008 में हुए हमले से ढाका हमले में हत्या के तरीके में अंतर है। मुंबई में जहां लोगों को गोली मारी गई थी, वहीं इस हमले में आतंकवादियों ने मध्ययुगीन तरीका अपनाते हुए पीड़ितों का गला रेतने वाले हथियार का इस्तेमाल किया। बर्बर हत्या के विभिन्न रूपों की तुलना नहीं की जा सकती, न ही यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कौन-सा तरीका ज्यादा बर्बर है, लेकिन इस ताजा हमले में जिस तरीके का इस्तेमाल किया गया, वह वैश्विक दृष्टि से एक संकेत है। इस मामले में साफ है कि आतंकवादी कबायली मानसिकता के हैं, जैसा कि उनके हथियारों की पसंद से पता चलता है।
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बांग्लादेश में हाल के वर्षों में जेहादी आतंकवाद बढ़ा है, हालांकि अवामी लीग सरकार ने एक दशक पहले के कट्टर आतंकवाद की मजबूत पकड़ को कुछ हद तक कमजोर करने में सफलता पाई है। पर पिछले दो वर्षों से एक बार फिर कट्टरपंथी हिंसा बढ़ी है, हालांकि इनमें भी खास व्यक्तियों को निशाना बनाया गया, जिनमें बांस काटने के लिए इस्तेमाल होने वाले दाव, कुल्हाड़ी और चाकू का इस्तेमाल किया गया। ऐसे हमलों में कभी सामूहिक हत्या नहीं की गई। लेकिन इसके विपरीत शुक्रवार रात के हमले से एक सुनियोजित हमले का पता चलता है। बांग्लादेश के सुरक्षा बलों ने निस्संदेह आतंकवादियों के विदेशी और बांग्लादेशी नागरिकों से संपर्क की जांच की होगी, लेकिन जैसा कि ऐसी जांचों में अक्सर होता है, पूरी जानकारी राज्य एवं सुरक्षा कारणों से सार्वजनिक नहीं की जाती।
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भारत इस मौके का इस्तेमाल कर आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर ज्यादा समन्वित अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया के लिए दबाव बना सकता है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने फिर सरकार का रुख दोहराया है कि लंबे समय से रुकी वैश्विक आतंकवाद पर व्यापक संधि (सीसीआईटी) को शीघ्र संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया जाना चाहिए। वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने पहले संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए ठोस अंतरराष्ट्रीय प्रयास की बात की थी। उन्होंने वैश्विक नेताओं से कहा था कि वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ व्यापक संधि को अपनाने से पहले उन्हें अपने विचारों को राजनीति, विभाजन, भेदभाव और अच्छे व बुरे आतंकवादियों के बीच अंतर नहीं करना चाहिए।
गौरतलब है कि दो दशक पहले 1996 में भारत ने सीसीआईटी का मसौदा तैयार किया था, पर तब कम ही देश भारत के इस तर्क से सहमत थे कि 21वीं सदी में आतंकवाद का नया संकट पैदा होने वाला है। भारत के इस नजरिये को मान्यता तब मिली, जब 9/11 का हमला हुआ। यह दर्शाता है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक चिंता और रणनीति अंतरराष्ट्रीय नजरिये से नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी नजरिये से तैयार होती है। सीसीआईटी अपनाने के लिए दबाव बनाते हुए भारत को द्विपक्षीय स्तर पर यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि आतंकवाद से मुकाबला करने में बांग्लादेश के कदम लड़खड़ाए नहीं।
होली आर्टिसन बेकरी पर सुनियोजित हमले के अलावा भारत के लिए चिंता की बात है कि बांग्लादेश में निरंतर हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं। यहां तक कि शनिवार को भी ढाका में एक हिंदू पुजारी की हत्या कर दी गई। उससे एक दिन पहले भी इसी तरह का हमला हुआ था, दोनों मामलों में कातिल भाग गए। हालांकि जिले के अधिकारियों ने बताया कि दोनों हत्याओं की प्रकृति स्थानीय आतंकियों द्वारा की गई ऐसी ही हत्याओं से मिलती है। भारत को शेख हसीना सरकार पर निश्चित रूप से इस बात के लिए दबाव डालना चाहिए कि इन हत्याओं की पूरी जांच हो और आरोपियों को सजा मिले।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर यदि ऐसे हमले होते रहे और उनका डर दूर नहीं किया गया, तो भारी संख्या में हिदुओं का भारत के सीमाई इलाकों में पलायन होगा। असम सरकार ने खुलेआम घोषणा की है कि वह बांग्लादेश से आने वाले हिंदुओं को शरणार्थी मानेगा, और मुस्लिम प्रवासियों को अवैध प्रवासी। भारी संख्या में बांग्लादेशी हिंदुओं के भारत में प्रवास से भारत के मुसलमानों एवं अन्य अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ेगी। यह भारत के पहले से संवेदनशील धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए विनाशकारी साबित होगा।
ढाका में आतंकवादियों को शांत करने और जीवित बंधकों को मुक्त कराने के कुछ घंटों बाद टीवी पर शेख हसीना के संबोधन के तमाम सकारात्मक संकेतों के बावजूद बांग्लादेश के सुरक्षा बलों ने जिस तरह से इस हमले से निपटा, वह भी चिंता का विषय है।
आतंकवादियों ने रात नौ बजे से पहले ही हमला किया था, पर सुरक्षा बलों को इस पर काबू करने में काफी समय लग गया, जबकि तथ्य यह है कि घटनास्थल पॉश इलाके में है, जहां पुलिस एवं अन्य जवान रहते हैं। दो मौतों के बाद भी सुरक्षा बलों ने सुबह से पहले आतंकवादियों को बाहर निकालने की कोशिश नहीं की।
साफ है कि बांग्लादेश के सुरक्षा बलों में रात में लड़ने की क्षमता नहीं है। अगर सुरक्षा बल इतना समय नहीं लगाते, तो कई बंधकों को बचाया जा सकता था। इसके अलावा सुबह में सुरक्षा बलों द्वारा जब रेस्तरां पर धावा बोला गया, तो वह भी बख्तरबंद गाड़ियों से, जो चाहरदीवारी से होकर आगे बढ़ा। यह रणनीति बंद कमरे में मुकाबला करने की अक्षमता दर्शाती है, जो भारत के लिए चिंताजनक है। यदि बांग्लादेश पाकिस्तान की तरह धीरे-धीरे आतंकवाद के सामने घुटने टेक रहा है, तो यह भारत के लिए एक बड़ी समस्या होगी।
वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदीः द मैन द टाइम्स के लेखक