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जानना जरूरी है: देवराज इंद्र ने किया भ्रूण-हत्या का प्रयास, संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी
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देवराज इंद्र ने किया भ्रूण-हत्या का प्रयास
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अमर उजाला
विस्तार
महर्षि कश्यप की अनेक पत्नियों में अदिति और दिति भी शामिल थीं। अदिति से देवताओं का और दिति से दैत्यों का जन्म हुआ था। पहले देवासुर संग्राम में दैत्यों की पराजय हुई, जिससे दिति बहुत दुखी थीं। वह देवताओं, विशेषकर, उनके अधिपति इंद से प्रतिशोध लेना चाहती थीं। एक दिन दिति ने कश्यप से कहा, मैं इंद्र का वध करने के लिए एक समृद्धशाली और तेजस्वी पुत्र की याचना करती हूं। कश्यप बोले, ‘मैं तुम्हें एक बलिष्ठ पुत्र प्रदान करूंगा। परंतु इस बीच तुम्हें सौ वर्ष तक इसी तपोवन में रहकर अपने गर्भ की रक्षा करनी होगी।’ इसी के साथ कश्यप ने गर्भवती दिति को कई निषिद्ध कर्म भी बताए।
वह बोले, ‘गर्भिणी को संध्या के समय भोजन नहीं करना चाहिए तथा वृक्ष की जड़ के पास नहीं जाना चाहिए। वह जल के भीतर न घुसे, सूने घर में प्रवेश न करे। बांबी पर खड़ी न हो। कभी मन में उद्वेग न लाए। सूने घर में बैठकर नख अथवा राख से भूमि पर रेखा न खींचे, न अलसा कर पड़ी रहे और न अधिक परिश्रम करे। उसे भूसी, कोयले, राख, हड्डी और खपड़े पर नहीं बैठना चाहिए। वह कलह न करे, अंगड़ाई न ले, बाल खोलकर खड़ी न हो और कभी अपवित्र न रहे। उत्तर की ओर अथवा नीचे सिर करके कभी न सोए। इसके अलावा, नग्नावस्था में, उद्वेग की स्थिति में और बिना पैर धोए शयन करना भी मना है। अमंगलयुक्त वचन मुंह से न निकाले, अधिक हंसी-मजाक न करे। गुरुजनों के साथ आदर का बर्ताव करे, मांगलिक कार्य करे, सर्वोषधियों से युक्त जल से ही स्नान करे। वाणी से सबका सत्कार करे और पति की निंदा न करे।' इतना कहकर कश्यप चले गए।
दिति विधिपूर्वक सब बातों का पालन करने लगीं। इस बात से इंद्र भयभीत हो गए। वह देवलोक छोड़कर दिति के पास आए और उनकी सेवा करने के बहाने वहां रहने लगे। दरअसल, इंद्र दिति के कार्यों में त्रुटि ढूंढ रहे थे। बाहर से तो वह प्रसन्न दिखते थे, पर भीतर से भय के मारे विकल थे।
आखिर जब सौ वर्ष की समाप्ति में तीन दिन शेष रह गए, तब दिति अत्यंत प्रसन्न थीं...उनका हृदय संतान-प्राप्ति के विचार से मुग्ध था। इसी अति-उत्साह में वह एक दिन पैर धोना भूल गईं और बाल खोलकर सो गईं। इतना ही नहीं, निद्रा के भार से दबी होने के कारण दिन में उनका सिर नीचे की ओर हो गया।
दिति की शुचिता में त्रुटि आई देखते ही अवसर पाकर इंद्र, दिति के गर्भ में प्रवेश कर गए और उन्होंने अपने वज्र के प्रहार से गर्भस्थ बालक के सात टुकड़े कर डाले। वे सातों टुकड़े, सूर्य के समान तेजस्वी सात कुमारों में परिणत हो गए और रोने लगे। उस समय इंद्र ने उन्हें रोने से मना किया, किंतु उनका रुदन बंद नहीं हुआ, तो इंद्र ने पुन: उन में से प्रत्येक के सात-सात टुकड़े कर दिए। अब वे सात कुमार, उनचास कुमारों में बदल चुके थे। वे सब मिलकर और जोर से रोने लगे। तब इंद्र ने ‘मा रुदध्वम्’ (मत रोओ) ऐसा कहकर उन्हें बारंबार रोने से रोका और उन्हें यह विचार आया कि ये बालक अवश्य ही धर्म के प्रभाव से पुनर्जीवित हुए हैं। इन्हें पुण्य-योग से जीवन मिला है। इसी कारण वज्र के प्रहार से भी इनका वध नहीं हो पाया। ये एक से अनेक हो गए, और फिर भी दिति के उदर की रक्षा हो रही है। इसमें संदेह नहीं कि ये अवध्य हैं, अत: इन्हें देवता माना जाना चाहिए। जब ये रो रहे थे, उस समय मैंने इन बालकों को ‘मा रुद:’ कहकर चुप कराने का प्रयास किया था, इसलिए ये ‘मरुत्’ नाम से प्रसिद्ध होंगे।’
ऐसा विचार कर इंद्र ने दिति से कहा-‘मां! मेरा अपराध क्षमा कर दीजिए। मैंने भय से प्रेरित होकर यह दुष्कर्म किया है।’ इस प्रकार इंद्र ने बार-बार दिति से क्षमा मांगी। इंद्र ने स्वयं मरुद्गणों को देवता की पदवी प्रदान करके अपने समकक्ष बना दिया।
इसके उपरांत इंद्र, दिति के उनचास मरुत पुत्रों को लेकर स्वर्ग चले गए। मरुद्गण यज्ञ-भाग के अधिकारी हुए। इसी के चलते उन्होंने असुरों से मेल नहीं किया, अपितु उनकी मैत्री देवताओं से हो गई।