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पर्यटन से बिगड़ती पारिस्थितिकी : इस साल अब तक 28 लाख लोग पहाड़ पर पहुंच चुके हैं
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
पहाड़ों को टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में बनाने की कवायद हमेशा ही रही है। कुछ हद तक शायद यह पहाड़ों की आवश्यकता भी रही है, जहां रोजगार के ज्यादा साधन नहीं हैं। उत्तराखंड के केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री में लाखों श्रद्धालु हर साल धार्मिक पर्यटक के रूप में आते हैं। लेकिन कुछ समय से एक नई प्रवृत्ति शुरू हुई है। जैसे ही मैदानी इलाकों में गर्मी जोर पकड़ती है, लोग पहाडों का रुख कर लेते हैं। इस साल अब तक 28 लाख लोग पहाड़ पर पहुंच चुके हैं। पर पहाड़ों में इस बार दोनों ही तरफ बड़ी चोट पहुंची है, जो अप्रत्याशित भीड़ के रूप में हमारे बीच में आई। जैसे ही इस बार की गर्मी ने मैदानों को तिलमिलाया, दो-चार दिन के लिए सबने पहाडों का रुख कर लिया।
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पहाड़ों को टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में बनाने की कवायद हमेशा ही रही है। कुछ हद तक शायद यह पहाड़ों की आवश्यकता भी रही है, जहां रोजगार के ज्यादा साधन नहीं हैं। उत्तराखंड के केदारनाथ, बदरीनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री में लाखों श्रद्धालु हर साल धार्मिक पर्यटक के रूप में आते हैं। लेकिन कुछ समय से एक नई प्रवृत्ति शुरू हुई है। जैसे ही मैदानी इलाकों में गर्मी जोर पकड़ती है, लोग पहाडों का रुख कर लेते हैं। इस साल अब तक 28 लाख लोग पहाड़ पर पहुंच चुके हैं। पर पहाड़ों में इस बार दोनों ही तरफ बड़ी चोट पहुंची है, जो अप्रत्याशित भीड़ के रूप में हमारे बीच में आई। जैसे ही इस बार की गर्मी ने मैदानों को तिलमिलाया, दो-चार दिन के लिए सबने पहाडों का रुख कर लिया।
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश का शासन-प्रशासन इस बात के लिए कतई तैयार नहीं था और न ही यह कल्पना की गई थी कि पहाड़ में पर्यटकों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी। दूसरी तरफ जो लोग उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश को देखने और आनंद लेने की अपेक्षाओं से आए थे, उन्हें असुविधा हुई, क्योंकि कई किलोमीटर लंबे घंटों के जाम के साथ तमाम तरह की अव्यवस्थाओं व असुविधाओं ने उन पर गलत तरह की छाप निश्चित रूप से छोड़ दी और शायद अगली बार वे सोच-समझ कर ही पहाड़ का रुख करेंगे।
रोजगार के रूप में पर्यटन की समीक्षा करने का समय आज आ चुका है। ढेर सारी संख्या में पर्यटकों के आवागमन, रहने-खाने और अन्य व्यवस्थाओं को कहीं-कहीं हल्के में लिया जाता रहा है। हमने केदारनाथ की घटना के बाद भी नहीं सीखा कि हमें रेगूलेटेड टूरिज्म यानी विनियमित पर्यटन पर ध्यान देना चाहिए। पहाड़ों पर लोग पहले भी आते रहे हैं, लेकिन गाड़ियों की संख्या अब ज्यादा है।
औसतन एक जाम अगर चार घंटे का भी हुआ और उसमें 1,000 गाड़ियां फंसीं, तो इसमें तेल डीजल/पेट्रोल की खपत लगभग खड़े-खड़े ही 16,000 लीटर होगी। यही नहीं, ये गाड़ियां 2.5 किलोग्राम के हिसाब से 32,000 किलो कार्बन डाई ऑक्साइड उगल देगी। इसमें एक तरफ जहां आर्थिक नुकसान जुड़ा है, वहीं दूसरी तरफ प्रदूषण की मार भी पड़ती है और समय की बर्बादी इससे अलग। ऐसी स्थिति में पर्यटकों की आस्था और आनंद हवा हो जाएंगे।
उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश का शासन-प्रशासन इस बात के लिए कतई तैयार नहीं था और न ही यह कल्पना की गई थी कि पहाड़ में पर्यटकों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी। दूसरी तरफ जो लोग उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश को देखने और आनंद लेने की अपेक्षाओं से आए थे, उन्हें असुविधा हुई, क्योंकि कई किलोमीटर लंबे घंटों के जाम के साथ तमाम तरह की अव्यवस्थाओं व असुविधाओं ने उन पर गलत तरह की छाप निश्चित रूप से छोड़ दी और शायद अगली बार वे सोच-समझ कर ही पहाड़ का रुख करेंगे।
रोजगार के रूप में पर्यटन की समीक्षा करने का समय आज आ चुका है। ढेर सारी संख्या में पर्यटकों के आवागमन, रहने-खाने और अन्य व्यवस्थाओं को कहीं-कहीं हल्के में लिया जाता रहा है। हमने केदारनाथ की घटना के बाद भी नहीं सीखा कि हमें रेगूलेटेड टूरिज्म यानी विनियमित पर्यटन पर ध्यान देना चाहिए। पहाड़ों पर लोग पहले भी आते रहे हैं, लेकिन गाड़ियों की संख्या अब ज्यादा है।
औसतन एक जाम अगर चार घंटे का भी हुआ और उसमें 1,000 गाड़ियां फंसीं, तो इसमें तेल डीजल/पेट्रोल की खपत लगभग खड़े-खड़े ही 16,000 लीटर होगी। यही नहीं, ये गाड़ियां 2.5 किलोग्राम के हिसाब से 32,000 किलो कार्बन डाई ऑक्साइड उगल देगी। इसमें एक तरफ जहां आर्थिक नुकसान जुड़ा है, वहीं दूसरी तरफ प्रदूषण की मार भी पड़ती है और समय की बर्बादी इससे अलग। ऐसी स्थिति में पर्यटकों की आस्था और आनंद हवा हो जाएंगे।
चूंकि आज सब अपनी गाड़ी से पहाड़ों की ओर दौड़ पड़ते हैं, ऐसे में, टूरिस्ट सर्किट बनाना जरूरी है। दुनिया भर में पर्यटन 17 फीसदी रोजगार का कारण है, इसलिए इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। ऐसे में, पर्यटकों की बढ़ती भीड़ को पहाड़ के चंद पड़ावों की ही तरफ न झोंककर अन्य स्थानों को भी विकसित किया जा सकता है, जो पर्यटकों की अपेक्षाओं पर खरा उतर सके। ऐसे ही पहाड़ी पर्यटन स्थलों पर कूड़ा एक बड़ी समस्या है। यात्री कूड़ा-कचरा लेकर आते हैं और पहाड़ों पर कूड़े का एक बड़ा पहाड़ खड़ा कर देते हैं। इसके निस्तारण की व्यवस्था का अभाव निश्चित रूप से हिमालय को एक नये खतरे की तरफ धकेल देगा।
इस स्थिति में खासतौर से दो तीन बातों को ध्यान में रखना होगा। एक यह कि जब भी पर्यटक मैदानों से पहाड़ों की तरफ रवाना हों, वहां पर एक मैकेनिज्म हो, जिससे इस तरह के कूड़े पर नियंत्रण कर दिया जाए। उदाहरण के लिए, लाखों की संख्या में पर्यटक बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करते हैं और पानी पीने के बाद वे बोतल गंगा-यमुना और छोटे-छोटे गड्ढे-गदेरों में, सड़क के किनारे, जंगल में कचरे के रूप में जमा हो जाते हैं। खाने-पीने के बाद फेंके जाने वाले प्लास्टिक भी पहाड़ के लिए संकट का कारण बन गया है।
यह कितनी बड़ी विडंबना है कि पर्यटक हिमालय में पानी की बोतलें लेकर आते हैं। जो हिमालय गंगा, यमुना ब्रह्मपुत्र और तमाम नदियों को पानी पिलाता है, वहां पर्यटकों को पानी की बोतल लेकर क्यों चढ़ना पड़ता है? हम हर सौ मीटर पर अपने ही पानी को फिल्टर करके पर्यटकों को पानी क्यों नहीं पिला सकते। पानी के इस व्यापार को हम अपने हिस्से में क्यों नहीं रख सकते? उससे दो बड़े फायदे होंगे।
एक तो बड़े रोजगार के रूप में पानी हमारे बीच में होगा। और दूसरा यह कि बोतलों के कचरे से हम मुक्त हो जाएंगे। बेहतर होगा कि पहाड़ जो तमाम तरह के फलों व अनाज के उत्पादक भी हैं, उन्हीं के उत्पाद पर्यटकों को उपलब्ध कराए जाएं। इससे हमारा रोजगार बढ़ेगा और हमारे संसाधनों के रास्ते खड़े होंगे और साथ में इस कुड़े-कचरे से भी हम मुक्त हो जाएंगे।
इस अव्यवस्था का एक बड़ा कारण यह भी है कि हमने आज तक पर्यटन कौशल घर गांव के बीच में विकसित नहीं किया। हम एक टास्क फोर्स बना सकते हैं, जिससे स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग से रोजगार के लिए भटक रहे युवाओं के रोजगार का यह एक माध्यम बने।
इस स्थिति में खासतौर से दो तीन बातों को ध्यान में रखना होगा। एक यह कि जब भी पर्यटक मैदानों से पहाड़ों की तरफ रवाना हों, वहां पर एक मैकेनिज्म हो, जिससे इस तरह के कूड़े पर नियंत्रण कर दिया जाए। उदाहरण के लिए, लाखों की संख्या में पर्यटक बोतलबंद पानी का इस्तेमाल करते हैं और पानी पीने के बाद वे बोतल गंगा-यमुना और छोटे-छोटे गड्ढे-गदेरों में, सड़क के किनारे, जंगल में कचरे के रूप में जमा हो जाते हैं। खाने-पीने के बाद फेंके जाने वाले प्लास्टिक भी पहाड़ के लिए संकट का कारण बन गया है।
यह कितनी बड़ी विडंबना है कि पर्यटक हिमालय में पानी की बोतलें लेकर आते हैं। जो हिमालय गंगा, यमुना ब्रह्मपुत्र और तमाम नदियों को पानी पिलाता है, वहां पर्यटकों को पानी की बोतल लेकर क्यों चढ़ना पड़ता है? हम हर सौ मीटर पर अपने ही पानी को फिल्टर करके पर्यटकों को पानी क्यों नहीं पिला सकते। पानी के इस व्यापार को हम अपने हिस्से में क्यों नहीं रख सकते? उससे दो बड़े फायदे होंगे।
एक तो बड़े रोजगार के रूप में पानी हमारे बीच में होगा। और दूसरा यह कि बोतलों के कचरे से हम मुक्त हो जाएंगे। बेहतर होगा कि पहाड़ जो तमाम तरह के फलों व अनाज के उत्पादक भी हैं, उन्हीं के उत्पाद पर्यटकों को उपलब्ध कराए जाएं। इससे हमारा रोजगार बढ़ेगा और हमारे संसाधनों के रास्ते खड़े होंगे और साथ में इस कुड़े-कचरे से भी हम मुक्त हो जाएंगे।
इस अव्यवस्था का एक बड़ा कारण यह भी है कि हमने आज तक पर्यटन कौशल घर गांव के बीच में विकसित नहीं किया। हम एक टास्क फोर्स बना सकते हैं, जिससे स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग से रोजगार के लिए भटक रहे युवाओं के रोजगार का यह एक माध्यम बने।