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पहाड़ के सूने होते गांव

Fri, 28 Oct 2016 05:43 PM IST
शेखर पाठक
शेखर पाठक Updated Fri, 28 Oct 2016 05:43 PM IST
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deserted village of Uttarakhand
शेखर पाठक

हिमालय के कई क्षेत्रों से अनेक कारणों से पलायन होता रहा है, पर नेपाल तथा उत्तराखंड दो ऐसे क्षेत्र हैं, जहां से पलायन की गति कम नहीं हो रही है। यद्यपि एक हिमालयी देश की, दूसरे हिमालयी प्रांत से तुलना वाजिब नहीं कही जा सकती है, पर इनकी प्रवृत्तियां एक-सी हैं। प्राकृतिक संपदा संपन्न दोनों क्षेत्र पलायन के कारण लगभग एक सदी तक मनीऑर्डरी अर्थव्यवस्था रचते रहे। फिर सकुटुम्ब बाहर जा बसने की स्थितियां विकसित हुईं और आज हिमालय का यह हिस्सा पलायन का सर्वाधिक शिकार है। हालांकि पलायन ने आर्थिक संपन्नता और ‘डायस्पोरा’ (प्रवासी प्रतिभा) में बढ़ोतरी की है।

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उत्तराखंड में इधर के वर्षों में, विशेष रूप से 2011 की जनगणना में पौड़ी तथा अल्मोड़ा जिलों की जनसंख्या में कमी से, पलायन संबंधी चिंता बढ़ी है। प्रांत से बाहर और कुछ भीतर के प्रवासी इस मामले में न सिर्फ ज्यादा चिंतित हैं, बल्कि वे कुछ कस्बों की यात्राओं में भी निकलते रहे हैं। इन अभियानों ने राजनीतिज्ञों को धिक्कारा है और ‘सही’ उम्मीदवार चुनने का सुझाव दिया है, पर पलायन के असली कारणों की पड़ताल अभी होनी है। उत्तराखंड में क्षेत्र के भीतर प्रवास की प्रक्रिया 1825 के आसपास शुरू हो गई थी। 1857 के बाद क्षेत्र से बाहर जाने के मौके बने। फौज, सर्वे तथा अन्य विभागों में नौजवानों का जाना शुरू हुआ। शिक्षा के साथ चपरासी, बाबू, अफसर बनने का सिलसिला चला और बढ़ा। अगली आधी सदी में आम नौजवान की मनःस्थिति यह बन गई कि वह ‘ह्वाइट कॉलर जॉब’ के लिए पैदा हुआ है और सरकारी नौकरी उसका पैदायशी हक है। यह मनोविज्ञान नए राज्य में भी बना रहा। इसलिए डीजीबीआर से मनरेगा तक का श्रम कार्य बाहर से आए मजदूर करते रहे। सब्जी विक्रेता, मकान निर्माता, बगीचों के प्रबंधक सभी बाहर से आ रहे हैं।
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आज उत्तराखंड की जनसंख्या एक करोड़ आठ लाख के करीब है। उत्तराखंडी मूल के 40-45 लाख लोग उत्तराखंड से बाहर देश-विदेश में हैं और वे अन्य युवाओं को वहां जाने की प्रेरणा-प्रोत्साहन देते हैं। प्रांत के भीतर पलायन गांव से कस्बे को, सड़क से दूर की बसाहट से सड़क किनारे की बस्ती को और पहाड़ों से तराई-भाबर-दून को पलायन हो रहा है। अभी 88 प्रतिशत पर्वतीय उत्तराखंड में 47 प्रतिशत जनसंख्या रहती है और 12 प्रतिशत तराई-भाबर दून में लगभग 53 प्रतिशत। उत्तराखंड से बाहर लगभग डेढ़ सदी में गई या वहां फली-फूली जनसंख्या है। नए राज्य में शिक्षा प्रणाली, संसाधनों की लूट, मुफ्तखोरी तथा भ्रष्टाचार ने इसे गति दी।
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पलायन के पीछे सबसे बड़ा कारण स्कूलों, अस्पतालों की दुर्दशा है। बच्चों के लिए ‘पब्लिक स्कूल’ की खोज में लोग गांव से उखड़ रहे हैं। जंगली जानवरों से खेती और गुलदार से पालतू जानवरों, ग्रामीणों को सतत खतरे से भी गांव खाली हो रहे हैं। विकास योजनाओं और प्राकृतिक आपदाओं ने अनेक घाटियों में पलायन को गति दी है, क्योंकि सरकारें विस्थापितों को बसाने में कामयाब नहीं रही।

खेती, बागवानी, सिंचाई, पेयजल व्यवस्था आदि ग्रामीण जीवन को अर्थपूर्ण और आत्मनिर्भर बनाने वाले विषयों पर कोई नया और प्रभावी काम नहीं हुआ है। ठेकेदारों की दखल राजनीति में होने और कतिपय नेताओं और अधिकारियों के जमीन, खनिज, जंगल, नदी, जड़ी-बूटी की लूट में शामिल होने से निराशा और गुस्सा, दोनों बढ़ा है। पलायन एक तरह का नकारात्मक प्रतिरोध है। पर इसे सुन और समझ सकने वाले लोग यहां कम हैं। वर्तमान शिक्षा से पलायन होता रहेगा, पर जो आत्मनिर्भर समाज पलायन कर रहा है, उसने सामान्य सुविधाओं के गांव तक न पहुंचने का सत्य उजागर किया है। वे लोग चाह कर भी शहर-कस्बे में जगह नहीं पा सकते हैं, क्योंकि वहां नव धनाढ्यों और 15 साल से राज्य की लूट में शामिल लोगों के कारण जमीन और मकान महंगे हो गए हैं।

पलायन की गति पर नियंत्रण के लिए गांवों की पुनर्व्यवस्था करनी होगी। सतत विफल ग्रामीण योजनाओं और खेती की जमीन तथा जंगल की पड़ताल करनी होगी। जंगलात बंदोबस्त 100 साल से और जमीन का बंदोबस्त 50 साल से नहीं हुआ है। इस प्रांत को अपनी जमीन के वास्तविक आंकड़े पता नहीं हैं। पिछले 50 साल में कितनी खेती तथा बागवानी की (और यही व्यक्तिगत मिल्कियत की जमीन है) और कितनी पनघट, गोचर या वन पंचायतों की जमीन लील ली गई, यह जानना नई शुरूआत के लिए जरूरी है। जलविद्युत परियोजनाओं और सड़क बनाने की निर्मम विधि, नदियों को लूटने और आपदा को बढ़ाने वाला खनन रोकना होगा। जलवायु बदलाव को समझना होगा। युवाओं को उद्यमिता के रास्ते खुद बनाने होंगे। सरकारी योजनाएं उन्हें बहुत आगे नहीं ले जा सकती हैं। ग्रामीण आत्मनिर्भरता के प्रयोग न करने वाला समाज सिर्फ दूसरे नरक को भागता है। पलायन करती जनता के नेता तो पहले ही पहाड़ों से पलायन कर चुके हैं। कई ग्राम प्रधान तक राजधानी या नगरों में रहते हैं।


अनेक चिंतित दरअसल भागे हुए लोग हैं। पहाड़ से पलायन वहां कायम नए रास्तों का अन्वेषी युवा, महिला या प्रौढ़ वर्ग ही रोक सकता है। संसाधनों की कमी नहीं है, पर लूट और बर्बादी के बदले नियोजित और क्रमबद्ध इस्तेमाल की जरूरत है। इसे 20 लाख के आसपास बेरोजगार युवा कर सकते हैं। उनका आदर्श रेता-बजरी-लकड़ी तथा नशे के कारोबार में फंसे युवा नहीं होने चाहिए। उत्तराखंड के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय दलों का कोई स्थानीय या क्षेत्रीय दर्शन नहीं है। वे उत्तर प्रदेश से भी निर्मम तरीके से पहाड़ों को रौंद रहे हैं। क्षेत्रीय शक्तियां या तो पथभ्रष्ट होती गईं और या अभी उन्हें विकसित होना है। अन्तर्विरोधों के बावजूद सामाजिक आंदोलन अभी मुखर नहीं हो पा रहे हैं। ऐसे कठिन समय में गहन सामाजिक आंदोलन की जरूरत है, जो समाज और राजनीति, दोनों को बदल सके।

-लेखक हिमालय के अध्ययनकर्ता और पहाड़ के संपादक हैं

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