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सशस्त्र बलों की लोकतांत्रिक विजय
राजीव चंद्रशेखर
Updated Wed, 25 Jan 2017 07:34 PM IST
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राजीव चंद्रशेखर
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आज हम अड़सठवां गणतंत्र दिवस मना रहे हैं, क्योंकि 1950 में आज के ही दिन हमारा संविधान अमल में आया था। उसके बाद से दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव होते आए हैं। संविधान देश के सभी वयस्क नागरिकों को वोट के अधिकार की गारंटी देता है। चुनाव आयोग वर्षों से कठिन परिश्रम कर यह सुनिश्चित करता आया है कि देश के दूरस्थ क्षेत्रों में भी लोग निडर होकर अपने मताधिकार का उपयोग कर सकें।
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वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल 13,65,625 सर्विस वोटरों के नाम मतदाता सूची में थे। सर्विस वोटर्स में तीनों सेनाओं में कार्यरत कार्मिक, अर्द्ध सैनिक बल, बीएसएफ, आरएसी के राज्य से बाहर तैनात कार्मिकों, विदेशों में तैनात राजदूत और उच्चायुक्त इनके कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारी शामिल होते हैं। इन वोटरों में से अनेक ने अपने सेवाकाल में पहली बार सामान्य मतदाता के रूप में मतदान किया था। मगर यह हक सभी सर्विस वोटरों को नहीं मिल सका था। इसके लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है। यह कम लोग जानते हैं कि दशकों तक सशस्त्र बलों के 14 लाख, अर्द्ध सैनिक बलों के नौ लाख कर्मचारियों और उनके परिजन अपने मताधिकार से वंचित रह जाते थे। इसके पीछे कई नौकरशाही से जुड़े अड़ंगे रहे हैं।
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मगर पांच राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों में सशस्त्र बलों के लिए मताधिकार का उपयोग हकीकत बनने जा रहा है। इन राज्यों के चुनाव में 3,64,136 सर्विस वोटर पहली बार ई पोस्टल बैलेट के जरिये मताधिकार का उपयोग कर सकेंगे। इसका श्रेय संसद की रक्षा मामलों की स्थायी समिति को दिया जाना चाहिए जिसने चुनाव आयोग से तेजी से इसे सुनिश्चित करने का आग्रह किया था।
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वर्ष 2013 में पहली बार जब मैंने सशस्त्र बलों के मताधिकार का मुद्दा उठाया था, तब बहुत लोग यह जानकर हैरत में पड़ गए थे कि बड़ी संख्या में भारतीय सशस्त्र बलों के कर्मचारियों ने अपने सेवाकाल में कभी मताधिकार का उपयोग ही नहीं कर सके। तत्कालीन यूपीए सरकार को मैंने पत्र भी लिखा। इसके बाद मैंने एक जनहित याचिका दायर की। मेरी याचिका पर 23 मार्च, 2014 को सर्वोच्च अदालत ने अपने अंतरिम आदेश में शांतिपूर्ण क्षेत्रों में तैनात सर्विस वोटरों को आम चुनाव में सामान्य मतदाता के रूप में पंजीबद्ध होने की मंजूरी दी थी। इसी मामले में सर्वोच्च अदालत के निर्देशों के अनुरूप सरकार ने 21, अक्टूबर 2016 को सर्विस वोटर से संबंधित चुनाव नियम में संशोधन कर सशस्त्र बलों के कर्मचारियों को चुनावों में ई पोस्टल बैलेट के जरिये मतदान का अधिकार दिया।
ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्राजील, कनाडा, फ्रांस, नीदरलैंड, ब्रिटेन और वेनेजुएला जैसे देशों में सैन्य कर्मचारियों के लिए ई वोटिंग या इंटरनेट वोटिंग की व्यवस्था है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के तहत भारत में सर्विस वोटरों के लिए प्रॉक्सी वोटिंग या डाक मतदान की व्यवस्था रही है, लेकिन यह कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं थी। दूरस्थ क्षेत्रों में पदस्थ सैन्य कर्मचारी डाक मतपत्र विलंब से मिलने या नहीं पहुंचने के कारण मताधिकार से वंचित रह जाते थे।
सैनिकों और उनके परिजनों को मताधिकार का उपयोग करने के लिए प्रेरित किए जाने की जरूरत है, क्योंकि लंबे समय तक वे लोकतांत्रिक अधिकार के उपयोग से वंचित रहे हैं। इस गणतंत्र दिवस को उनकी इस जीत के रूप में भी मनाने की जरूरत है।
- लेखक, राज्यसभा सदस्य और एनडीए, केरल के उपाध्यक्ष हैं