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बंद कमरे का लोकतंत्र

Mon, 18 Mar 2013 11:02 AM IST
देवप्रिय अवस्थी
देवप्रिय अवस्थी Updated Mon, 18 Mar 2013 11:02 AM IST
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democracy limits

हाल के दिनों में भारतीय राजनीति की दो बड़ी घटनाओं ने हमारे लोकतंत्र की सीमाओं को एक बार फिर उजागर कर दिया है। पहली घटना है कांग्रेस उपाध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी की ताजपोशी और दूसरी है राजनाथ सिंह का भाजपा का अध्यक्ष बनना। ये दोनों नियुक्तियां या चुनाव जिस तरीके से हुए, वह हमारे लोकतंत्र के साथ भद्दा मजाक है।

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देश की दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों के इन फैसलों में उनके आम कार्यकर्ताओं और जमीनी इकाइयों की किंचित भी भूमिका नहीं थी। दोनों फैसले उन गिरोहों या कॉकस ने किए, जो लंबे समय से दोनों पार्टियों के स्वयंभू नियंता बने हुए हैं और हमेशा बंद कमरों में बैठकर फैसले लेने में विश्वास रखते हैं।
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वंशवाद की मारी कांग्रेस की जिस कार्यसमिति ने राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया, उसका हरेक सदस्य पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा मनोनीत है। ये कार्यसमिति सदस्य इतने बेचारे हैं कि सोनिया-राहुल की विफलताओं का ठीकरा फोड़ने के लिए अपना सिर आगे कर देते हैं और अपनी सफलताओं का श्रेय सोनिया-राहुल को देने की फितरत करते हैं।
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उनमें से कोई भी सोनिया-राहुल के नाम पर होने वाले किसी फैसले पर उफ तक नहीं करता। दीगर है कि सोनिया-राहुल की वाहवाही लूटने के लिए विपक्षी पार्टियों और उनके नेताओं के खिलाफ अभद्र और अनर्गल टिप्पणियां करने में भी उन्हें शर्म नहीं आती। कांग्रेस का हर छोटा-बड़ा नेता दिन-रात सोनिया-राहुल अलाप करता है। पिछले कुछ दिनों से उनका राहुल अलाप लगातार कर्कश होता जा रहा था। इस अलाप में राहुल गांधी को बड़ी जिम्मेदारी सौंपे जाने की मांग इस अंदाज में की जाती रही कि ऐसा होने भर से कांग्रेस का, कांग्रेसियों का और इस देश का भी उद्धार हो जाएगा।

सही बात तो यह है कि राहुल गांधी महासचिव रहते हुए भी कांग्रेस में नंबर दो थे और अब उपाध्यक्ष बनकर भी नंबर दो ही हैं। सवा सौ साल से भी ज्यादा पुरानी कांग्रेस के संविधान में नंबर दो जैसे किसी पद का कोई प्रावधान नहीं है, मगर नेतृत्व की सुविधा के लिए जब-तब यह पद गढ़ लिया जाता है। याद करें कि इंदिरा गांधी के दौर में पहले कमलापति त्रिपाठी के लिए कार्यकारी अध्यक्ष और जनता पार्टी से कांग्रेस में लौटने पर हेमवती नंदन बहुगुणा के लिए सेक्रेटरी जनरल पद गढ़े गए थे।

फिर राजीव गांधी के दौर में अर्जुन सिंह के लिए उपाध्यक्ष पद बनाया गया था। यह राहुल गांधी की करनी और कथनी में अंतर का भी प्रमाण है कि वह खुद तो अग्रणी संगठनों के पदाधिकारी चुनाव के जरिये चुने जाने पर जोर देते हैं और खुद बगैर चुनाव के पहले महासचिव और अब उपाध्यक्ष पद स्वीकार करने में नहीं हिचकते।

मुख्य विपक्षी पार्टी का भी यही हाल है। कांग्रेस अगर वंशवादी गिरोहतंत्र की मारी है, तो भाजपा संघवादी गिरोहतंत्र की। नितिन गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने की तैयारियों के बीच संघवादी गिरोह ने जिस हैरतअंगेज अंदाज में राजनाथ सिंह की राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर ताजपोशी की, वह पार्टी पर इस गिरोह की अजगरी जकड़ का प्रतीक है।

शायद ही किसी ने सोचा हो कि तमाम मंचों से नितिन गडकरी को पाक-साफ होने का प्रमाण पत्र देने वाला यह गिरोह उनसे अचानक मुंह फेर लेगा। वह भी तब, जब नागपुर का वरदहस्त गडकरी के सिर पर हो। लेकिन पूर्ति समूह के गड़बड़झाले और गडकरी पर आयकर विभाग के कसते फंदे ने संघवादी गिरोह को नागपुर को भी साधने का मौका दे दिया।

बिना किसी ठोस जमीन वाले इस गिरोह के लिए राजनाथ सिंह एक सुरक्षित मोहरा हैं, क्योंकि उनके पास भी खुद की कोई ठोस जमीन नहीं है। इस गिरोह का असली मकसद येन-केन प्रकारेण नरेंद्र मोदी सरीखे जमीनी पकड़ वाले नेता के रास्ते में कांटें बिछाना है।

फिलहाल वह अपने मकसद में सफल होता लग रहा है। दरअसल नरेंद्र मोदी को गुजरात में ही रोके रखने के लिए संघवादी गिरोह किसी भी हद तक जा सकता है। इसकी वजह इस गिरोह में व्याप्त यह खौफ है कि मोदी के राष्ट्रीय राजनीति में आने पर गिरोह के सदस्यों की दुकानें उठ जाएंगी। दीगर है कि गुजरात जाकर मोदी का गुणगान करना गिरोह के सदस्यों की मजबूरी है।

हमारी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों पर गिरोहतंत्र की पकड़ मजबूत होने के कारण उनमें जमीनी नेतृत्व के पनपने के अवसर बहुत सीमित हैं। इन दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों में आगे बढ़ने के लिए जमीन पर काम करने के बजाय पार्टी चलाने वाले गिरोह के सदस्यों की नजरों में चढ़ने के जतन करना ज्यादा मुफीद माना जाता है। ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियों में या तो परिवारवाद का बोलबाला है या फिर वे व्यक्ति विशेष पर टिकी हैं। आमजन की भागीदारी का दावा करने वाली तथाकथित पार्टियों के दरवाजे भी नवागतों के लिए खुले नहीं हैं। नतीजतन, लोकतंत्र के नाम पर गिरोहतंत्र दिन-ब-दिन मजबूत होता जा रहा है।


हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का कितना भी ढिंढोरा क्यों न पीटें, लेकिन असल में हम गिरोहतंत्र में ही जी रहे हैं। ऐसे में हमारे सामने यक्ष प्रश्न यह है कि क्या हमारा लोकतंत्र, जिसे दुनिया में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, गिरोहतंत्र की इस अजगरी जकड़ से कभी भी छुटकारा पा सकेगा या फिर हम लोकतंत्र के नाम पर आगे भी इसी तरह के गिरोहतंत्र को ढोने के लिए अभिशप्त रहेंगे।

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