{"_id":"5b38d38d4f1c1bb51e8b8c3b","slug":"democracy-and-vip","type":"story","status":"publish","title_hn":"लोकतंत्र में वीआईपी","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
लोकतंत्र में वीआईपी
तवलीन सिंह
Updated Sun, 01 Jul 2018 06:43 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
तवलीन सिंह
पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मेरी गली में आए थे। मेरे घर के सामने से निकल कर उनका काफिला दौड़ता हुआ एक सभाग्रह की ओर गया, जहां उन्हें एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को संबोधित करना था। पूरा कार्यक्रम शायद एक घंटे का रहा होगा, लेकिन इसकी तैयारी तीन दिन से चली थी।
पहले आए मुंबई पुलिस के दस्ते, जो मरीन ड्राइव के हर नुक्कड़ पर प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठे दिखे। फिर आए नगर पालिका के सफाई कर्मचारी, जिन्होंने दिल लगाकर सफाई की। उसके बाद नगर पालिका के अन्य कर्मचारी आए, जिन्होंने मोर्चे लगाए और कनातें खड़ी कीं, ताकि प्रधानमंत्री के काफिले के पास कोई आम आदमी न भटक सके। जिस दिन प्रधानमंत्री को आना था, उस दिन आम नागरिकों का आना-जाना, टहलना आदि सब बंद कर दिया गया। हमें अपने गेट तक पहुंचने के लिए खास पास बनवाने पड़े।
प्रधानमंत्री वीवीआईपी श्रेणी में आते हैं, तो उनके लिए इतना सब कुछ सहने के लिए हम तैयार हैं, लेकिन क्या अब इस वीआईपी कल्चर पर सवाल उठाने का समय नहीं आ गया है? मैं कुछ आंकड़े रखना चाहूंगी, जो मुझे एक दोस्त ने भेजे हैं। ब्रिटेन में 84 वीआईपी हैं, फ्रांस में 109, जापान में 125, जर्मनी में 142, अमेरिका में 252, रूस में 312, चीन में 435 वीआईपी हैं, जबकि हमारे भारत महान में वीआईपी लोगों की संख्या 5,79,092 है। नरेंद्र मोदी ने अपने आपको देश का प्रधान सेवक तो मान लिया है और सरकारी वाहनों की छतों से लाल बत्तियां भी उतरवा दी हैं, लेकिन ऐसा करने से हमारे देश के वीआईपी कल्चर को कोई फर्क नहीं पड़ा है।
पिछले सप्ताह जिस दिन प्रधानमंत्री मुंबई में थे, उसी दिन मैंने मेरे बगल के एक पांच सितारा होटल में यह नजारा देखा। मैं सीढ़ियों से ऊपर जा रही थी कि सुरक्षाकर्मियों के एक बड़े-से दस्ते ने मुझे और सीढ़ी चढ़ने वाले दूसरे लोगों को भगाया, क्योंकि एक केंद्रीय मंत्री सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे। उनके तेवर, उनकी शान, उनकी सुरक्षा पुराने जमाने के किसी राजा-महाराजा से कम नहीं थी। मेरी नजरों में वह जनता के सेवक नहीं, बल्कि मालिक थे। ऐसे में कहां से आएगा सुशासन? कब आएगा वह दिन, जब जनता के प्रतिनिधि खुद को जनता का सेवक मानकर काम करने लगेंगे?
जन प्रतिनिधियों का घमंड, उनकी अकड़ तभी कम होगी, जब अन्य लोकतांत्रिक देशों की तरह हम भी उनसे उनकी सारी विशेष सुविधाएं समाप्त करने की मांग करेंगे। उनकी आलीशान कोठियों पर, उनको सस्ती बिजली-पानी उपलब्ध कराने में, उनकी हवाई और रेल यात्राओं पर देश की गरीब जनता के पैसे बर्बाद किए जाते हैं। देश के वीआईपी कल्चर को हम सुरक्षा के बहाने कायम रखते हैं, लेकिन सुरक्षा सिर्फ बहाना है। यथार्थ यह है कि जब सुरक्षाकर्मी किसी व्यक्ति के आसपास मंडराते दिखते हैं, तो आम आदमी को ऐसा लगता है कि वास्तव में यह व्यक्ति खास होगा, तभी उसको सुरक्षित रखने के लिए इतने लोगों की जरूरत पड़ती है।
सो जब किसी होटल या किसी कार्यक्रम में ये जनप्रतिनिधि पहुंचते हैं, तो बड़े से बड़े लोग उन्हें झुककर नमस्ते करते हैं। इससे नेताजी का घमंड तीस गुना बढ़ जाता है और अगले चुनाव तक वह आसानी से भूल जाता है कि उसकी शक्ति और शान आती है जनता से। फिर जब दोबारा जनता जनार्दन से वोट मांगने का समय आता है, तब उसके पांव धरती पर उतर आते हैं। ऐसे समय वह राजा-महाराजा से दोबारा सामान्य आदमी बन जाता है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
पहले आए मुंबई पुलिस के दस्ते, जो मरीन ड्राइव के हर नुक्कड़ पर प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठे दिखे। फिर आए नगर पालिका के सफाई कर्मचारी, जिन्होंने दिल लगाकर सफाई की। उसके बाद नगर पालिका के अन्य कर्मचारी आए, जिन्होंने मोर्चे लगाए और कनातें खड़ी कीं, ताकि प्रधानमंत्री के काफिले के पास कोई आम आदमी न भटक सके। जिस दिन प्रधानमंत्री को आना था, उस दिन आम नागरिकों का आना-जाना, टहलना आदि सब बंद कर दिया गया। हमें अपने गेट तक पहुंचने के लिए खास पास बनवाने पड़े।
प्रधानमंत्री वीवीआईपी श्रेणी में आते हैं, तो उनके लिए इतना सब कुछ सहने के लिए हम तैयार हैं, लेकिन क्या अब इस वीआईपी कल्चर पर सवाल उठाने का समय नहीं आ गया है? मैं कुछ आंकड़े रखना चाहूंगी, जो मुझे एक दोस्त ने भेजे हैं। ब्रिटेन में 84 वीआईपी हैं, फ्रांस में 109, जापान में 125, जर्मनी में 142, अमेरिका में 252, रूस में 312, चीन में 435 वीआईपी हैं, जबकि हमारे भारत महान में वीआईपी लोगों की संख्या 5,79,092 है। नरेंद्र मोदी ने अपने आपको देश का प्रधान सेवक तो मान लिया है और सरकारी वाहनों की छतों से लाल बत्तियां भी उतरवा दी हैं, लेकिन ऐसा करने से हमारे देश के वीआईपी कल्चर को कोई फर्क नहीं पड़ा है।
पिछले सप्ताह जिस दिन प्रधानमंत्री मुंबई में थे, उसी दिन मैंने मेरे बगल के एक पांच सितारा होटल में यह नजारा देखा। मैं सीढ़ियों से ऊपर जा रही थी कि सुरक्षाकर्मियों के एक बड़े-से दस्ते ने मुझे और सीढ़ी चढ़ने वाले दूसरे लोगों को भगाया, क्योंकि एक केंद्रीय मंत्री सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे। उनके तेवर, उनकी शान, उनकी सुरक्षा पुराने जमाने के किसी राजा-महाराजा से कम नहीं थी। मेरी नजरों में वह जनता के सेवक नहीं, बल्कि मालिक थे। ऐसे में कहां से आएगा सुशासन? कब आएगा वह दिन, जब जनता के प्रतिनिधि खुद को जनता का सेवक मानकर काम करने लगेंगे?
जन प्रतिनिधियों का घमंड, उनकी अकड़ तभी कम होगी, जब अन्य लोकतांत्रिक देशों की तरह हम भी उनसे उनकी सारी विशेष सुविधाएं समाप्त करने की मांग करेंगे। उनकी आलीशान कोठियों पर, उनको सस्ती बिजली-पानी उपलब्ध कराने में, उनकी हवाई और रेल यात्राओं पर देश की गरीब जनता के पैसे बर्बाद किए जाते हैं। देश के वीआईपी कल्चर को हम सुरक्षा के बहाने कायम रखते हैं, लेकिन सुरक्षा सिर्फ बहाना है। यथार्थ यह है कि जब सुरक्षाकर्मी किसी व्यक्ति के आसपास मंडराते दिखते हैं, तो आम आदमी को ऐसा लगता है कि वास्तव में यह व्यक्ति खास होगा, तभी उसको सुरक्षित रखने के लिए इतने लोगों की जरूरत पड़ती है।
सो जब किसी होटल या किसी कार्यक्रम में ये जनप्रतिनिधि पहुंचते हैं, तो बड़े से बड़े लोग उन्हें झुककर नमस्ते करते हैं। इससे नेताजी का घमंड तीस गुना बढ़ जाता है और अगले चुनाव तक वह आसानी से भूल जाता है कि उसकी शक्ति और शान आती है जनता से। फिर जब दोबारा जनता जनार्दन से वोट मांगने का समय आता है, तब उसके पांव धरती पर उतर आते हैं। ऐसे समय वह राजा-महाराजा से दोबारा सामान्य आदमी बन जाता है।