फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Delhi in the dark

धुंध में ढकी दिल्ली का सबक

Sun, 13 Nov 2016 02:20 PM IST
Updated Sun, 13 Nov 2016 02:20 PM IST
विज्ञापन
Delhi in the dark
पत्रलेखा चटर्जीं

दिल्ली की दमघोंटू हवा की खबरें पिछले दिनों अखबारों के पहले पन्ने पर थीं, लेकिन वास्तव में पूरे उत्तरी भारत का दम घुट रहा है। कुछ आपातकालीन उपायों की योजनाएं बनाई जा रही हैं। हमें पता नहीं कि उसका कितना असर पड़ेगा। लेकिन प्रदूषण का यह स्तर हमारे सीखने के लिए एक बड़ा सबक है।

विज्ञापन

 

उत्तर भारत में, खासकर दिल्ली के आसपास के इलाकों में जो हमने अनुभव किया, वह उसी का नतीजा है कि हम पर्यावरण संबंधी चिंताओं को उच्च वर्ग की बकवास मानकर खारिज करते हैं। लोग अज्ञानता या निहित स्वार्थों के चलते ऐसा करते हैं। पर्यावरणवादियों पर गलत तरीके से कई तरह के आरोप लगाए जाते हैं-अर्थव्यवस्था की सुस्त रफ्तार के लिए, देशहित को तवज्जो नहीं दिए जाने के लिए और यहां तक कि विदेशी संस्थानों में काम करने के लिए भी।

विज्ञापन


ऐसे लोग नहीं चाहते कि भारत अपनी असली क्षमता हासिल करे। अब अगर पर्यावरणवादियों को दुश्मन के रूप में चिह्नित किया जाता है, तो उनकी चिंताओं को भी खारिज किया जा सकता है। लेकिन पूरे उत्तर भारत की स्थिति दर्शाती है कि देश पर्यावरणीय खतरों को नजर अंदाज नहीं कर सकता।
विज्ञापन
विज्ञापन


जिस तरह से लाखों भारतीय हर दिन जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर हैं, वह बताता है कि सिर्फ उच्च वर्ग के लोगों को ही स्वच्छ हवा की चिंता नहीं है। मेरे घर के पास सड़क पर फूल बेचने वाला व्यक्ति, हमारे अपार्टमेंट का चौकीदार, अशंकालिक घरेलू कामगार, पड़ोस के बाजार की युवा सेल्सगर्ल आदि सभी इस जहरीली हवा के बारे में बातें करते हैं।

आंखों में आंसू आना, सांस लेने में तकलीफ होना, घर से बाहर कदम रखते ही हर बार लगातार खांसना-यह सब कुछ हम सभी व्यक्तिगत स्तर पर महसूस करते हैं। इसके चलते स्कूल बंद कर दिए गए और एयर प्यूरिफायर की तरह मास्क की बिक्री भी बढ़ गई। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने हफ्ते भर से जारी गंभीर वायु प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए कई आपातकालीन उपायों की घोषणा की है। वायु प्रदूषण के कारण बच्चों, बीमारों और आम लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है। इस मसले को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में सुनवाई हुई है और सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिका दायर
की गई है।

पिछले रविवार को केजरीवाल सरकार द्वारा जिन उपायों की घोषणा की गई, उनमें तीन दिनों के लिए बच्चों के स्कूलों को बंद करना, कोयले से चलने वाले बदरपुर ताप विद्युत संयंत्र को पांच दिन के लिए बंद करना, दस दिनों के लिए सभी निर्माण कार्य रोक देना, पीड्ब्लूडी की सड़कों पर पानी का छिड़काव और हर हफ्ते वैक्यूम क्लीनर से सफाई, पत्तों को जलाने पर रोक, डीजल जेनरेटरों पर दस दिनों के लिए प्रतिबंध और लोगों को घरों में रहने की सलाह शामिल हैं। जो अधिकारी धुआं छोड़ने वाले वाहनों और डीजल जेनरेटरों पर प्रतिबंध पर अमल नहीं करवाएंगे, उन पर जुर्माना लगाया जाएगा। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वॉयरन्मेंट ने बताया है कि इन आदेशों को लागू करना महत्वपूर्ण है और इससे भी ज्यादा कुछ करने की आवश्यकता है, जैसे डीजल से चलने वाले वाहनों पर रोक लगाना।

इन डीजल वाहनों का लोगों के आवासीय इलाकों के अत्यंत करीब के इलाकों में विषाक्त उत्सर्जन में बड़ा हाथ है, इसलिए प्रदूषण के खिलाफ जमीनी स्तर पर मुकाबला करने के लिए सांस की बीमारियों के लिए खतरे के रूप में उन्हें उजागर करना जरूरी है। लेकिन ऐसे वाहनों पर रोक लगाने के साथ ही सरकार को सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था सुधारनी होगी।

वायु प्रदूषण वर्षों से दिल्ली का स्थायी शत्रु है। यह सर्दियों की शुरुआत में अपना सिर उठाता है, जब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली धुंध से ढक जाती है, जिसके कारण दृश्यता कम हो जाती है और शारीरिक परेशानियां शुरू हो जाती हैं। दिल्ली की हवा तो पहले से ही जहरीली थी, लेकिन दिवाली में भारी मात्रा में पटाखे जलाने और पड़ोसी राज्यों में फसलों के अवशेष जलाने के कारण स्थिति और बदतर हुई। इसके कारण वातावरण में हवा की परत मोटी और स्थिर हो गई और प्रदूषण जमीन के करीब अटक गया।

लेकिन अगर हम सिर्फ हालात के बारे में आक्रोश जताते रहेंगे, तो इस समस्या का समाधान नहीं ढूंढ पाएंगे। दिल्ली और कानपुर के बीच ग्रैंड ट्रंक रोड और मुख्य रेल गलियारे के दोनों ओर का खंड दूसरा सबसे बड़ा प्रदूषित खंड है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक ताजा अध्ययन के मुताबिक, दुनिया के बीस सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से चार उत्तर प्रदेश के हैं। कानपुर, फिरोजाबाद, लखनऊ के अलावा इलाहाबाद भी दुनिया के बीस सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल हैं।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास 95 भारतीय शहरों की सूची है, जो लगातार प्रदूषण फैला रहे हैं और इस समस्या से निपटने में विफल रहे हैं। इन शहरों में रहने वाला हर व्यक्ति, खासकर महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग गंभीर खतरे में हैं। हमारे देश की मिट्टी एवं पानी भी हवा की तरह प्रदूषित हैं।


सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इस समस्या से निपटने के लिए कोई भी राजनीतिक पार्टी तब तक कोशिश नहीं करती, जब तक कि हालात आपातकाल जैसे नहीं हो जाते। बाकी समय में वे पर्यावरणविदों और पत्रकारों को पर्यावरण के मुद्दे पर लिखने के लिए बदनाम करने में लगे रहते हैं। स्पष्ट है कि पर्यावरण संबंधी चिंता जाहिर करने वालों को चुप कराने से समस्या का समाधान नहीं निकलने वाला है। उलटे इससे कुछ लोगों को प्रदूषण फैलाने की खुली छूट ही मिल जाएगी।

-सामाजिक एवं विकासात्मक मुद्दों पर लिखने वाली वरिष्ठ पत्रकार

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed