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घाटे का घेरा: राज्यों के लिए खतरे की घंटी है राजकोषीय घाटे का तय सीमा पार करना
सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 28 में से 18 राज्यों का राजकोषीय घाटा अपनी तय सीमा, यानी सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के तीन फीसदी से ऊपर चला गया है, जो चिंताजनक होने के साथ ही राज्यों को वित्तीय अनुशासन बनाए रखने की चेतावनी भी देता है।
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सीएजी की चिंताजनक रिपोर्ट
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अमर उजाला प्रिंट
भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 28 में से 18 राज्यों का राजकोषीय घाटा अपनी तय सीमा, यानी सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के तीन फीसदी से ऊपर चला गया है, जो चिंताजनक तो है ही, राज्यों के लिए वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के लिहाज से चेतावनी भी है। असल में, देश के आधे से अधिक राज्य अपने राजस्व व्यय को पूरा करने के लिए भी कर्ज ले रहे हैं, जो कोविड महामारी के दौरान देखे गए वित्तीय दबाव की याद दिलाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में 15 राज्य राजस्व घाटे में रहे, जबकि 13 राज्य राजस्व अधिशेष में थे। सबसे चिंताजनक बात यह है कि कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र और ओडिशा समेत 14 राज्यों में पिछले वित्त वर्ष की तुलना में वित्त वर्ष 2025 के दौरान राजकोषीय घाटे में 25 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। दूसरी चिंता की बात यह है कि राजस्व अधिशेष वाले राज्यों की संख्या वित्त वर्ष 2024 में 16 थी, जो वित्त वर्ष 2025 में घटकर 13 रह गई है। राजस्व अधिशेष का लक्ष्य रखने वाले 18 राज्यों में से नौ ने इसे हासिल किया, जबकि कर्नाटक और तेलंगाना समेत बाकी राज्य राजस्व घाटे में रहे। सात राज्यों ने शून्य राजस्व घाटे का लक्ष्य रखा था, जिनमें से गोवा, झारखंड, त्रिपुरा और उत्तर प्रदेश ने राजस्व अधिशेष हासिल किया, जबकि पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु वर्ष के अंत में राजस्व घाटे में रहे। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दशक में राज्यों की कुल देनदारियां बढ़ी हैं, जो वित्त वर्ष 2016 के 24.19 प्रतिशत से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में जीएसडीपी का 27.89 फीसदी हो गईं। ओडिशा की देनदारियां जीएसडीपी का 15.79 फीसदी थीं, जबकि अरुणाचल प्रदेश के लिए यह आंकड़ा 52.84 प्रतिशत था। गौरतलब है कि बीते दशक में राज्यों का सार्वजनिक ऋण तेजी से बढ़ा है, जो औसतन उनकी राजस्व प्राप्तियों का लगभग 150 फीसदी तक पहुंच गया है। वास्तव में, राज्यों के बजट का एक बड़ा हिस्सा प्रतिबद्ध व्यय (सब्सिडी, वेतन और पेंशन) पर खर्च हो जाने से विकास कार्यों (पूंजीगत व्यय) के लिए बहुत कम पैसा बचता है। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक, कई राज्यों में हजारों करोड़ रुपये की वसूली बकाया होती है, पर उसका सटीक हिसाब-किताब या रिकॉर्ड गायब होता है, जो विभागों में कार्यप्रणाली की कमियों को दर्शाता है। विकास कार्यों के लिए धन की कमी होने से इसका सीधा असर राज्य के बुनियादी ढांचे (सड़क, स्कूल, अस्पताल निर्माण) पर पड़ता है। ऐसे में, लाजिमी है कि राज्य सरकारें अपनी आमदनी (टैक्स बेस) बढ़ाने, कर चोरी रोकने, और कर्ज लेने की सीमा को नियंत्रित करने की तत्काल कोशिश करें, अन्यथा अत्यधिक कर्ज व लगातार बढ़ते घाटे के कारण राज्यों के समक्ष भविष्य में गंभीर आर्थिक संकट पैदा हो सकता है।
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