कर्जमाफी समाधान नहीं, बोझ
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किसानों के कर्ज पर इस देश में जबर्दस्त राजनीति हो रही है। मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ और राजस्थान में नई सरकार बनते ही किसानों का कर्ज माफ करने की द्रुतगामी घोषणाएं हुईं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ऐसा जहर है, जो भारत की फलती-फूलती अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर सकता है। यह सच भी है, क्योंकि पूरे देश में किसानों को कर्ज मिला है और उसकी कुल राशि लाखों करोड़ों में है। हाल के आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ तीन राज्यों-राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ही किसानों के कर्ज के रूप में लगभग 60 हजार करोड़ रुपये बकाया हैं। मुख्यमंत्रियों ने घोषणाएं तो कर दी हैं, पर सवाल है कि क्या उनके पास अब उतना धन बचा है क्या? हालत यह है कि राज्यों को बाजार से धन उगाहना पड़ेगा और उन्हें फरवरी-मार्च में आने वाले बजट का इंतजार करना पड़ेगा।
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देश में कर्ज माफी का मुद्दा कोई नया नहीं है, लेकिन समय के साथ-साथ यहां फंसी राशि अरबों रुपये से भी ज्यादा होती चली गई है और इसके साथ ही किसानों के सब्र का बांध भी टूटने लगा है। उधर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश वगैरह राज्यों में हालात बहुत बिगड़ गए और किसान कर्ज चुकाने में असमर्थ हो गए। सैकड़ों किसानों ने आत्महत्या कर ली और यह सिलसिला जारी है। इसने आंदोलनों को जन्म दिया। यह मामला धीरे-धीरे राजनीतिक बनता चला गया और अब पूरे देश में किसानों का कर्ज माफ करने की मांग होने लगी है।
कृषि रोजगार देने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है और आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा आज भी इस पर आश्रित है। जीडीपी में इसका योगदान लगभग 18 प्रतिशत है। अनाज उत्पादन के मामले में हम दुनिया में दूसरे नंबर पर हैं और हमारी इसी उपलब्धि ने कर्ज संकट को जन्म भी दिया। दरअसल अनाजों के जबर्दस्त उत्पादन से बाजार में बहुलता की स्थिति पैदा हुई और किसानों को उनकी उपज का मूल्य मिलना तो दूर बिक्री होना भी भारी पड़ने लगा। मध्य प्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां बेहतर सुविधाओं, सिंचाई में बढ़ोतरी और बिजली की उपलब्धता से कृषि उपज में भारी बढ़ोतरी हुई। इसने वहां के आर्थिक समीकरण को बदल दिया। आंकड़ों के मुताबिक, वहां कृषि उपज में बढ़ोतरी की सालाना दर 14.2 प्रतिशत रही। 2005 में वहां कुल 60 लाख टन अनाज का उत्पादन हुआ, जो 2014-15 तक बढ़कर 1 करोड़ 71 लाख टन हो गया। इस बढ़ोतरी ने राज्य सरकार को प्रतिष्ठा तो दी, लेकिन अतिउपज के कारण किसानों को उचित मूल्य तो मिलना दूर, अनाजों की बिक्री होना भी भारी पड़ गया। आज कृषि संकट का एक बड़ा कारण यह भी है। कई राज्यों में अतिवृष्टि या अनावृष्टि से भी फसलें मारी गईं, जिससे किसानों को भारी आर्थिक संकट से गुजरना पड़ा। यही है किसान आंदोलनों की जड़। उत्तर प्रदेश, असम, पंजाब वगैरह कई राज्यों ने भी किसानों के कर्ज माफ किए हैं और हजारों करोड़ रुपये खर्च किए।
कृषि विशेषज्ञ स्वामीनाथन का भी कहना है कि कर्जमाफी समाधान नहीं है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के साथ ही कई अन्य अर्थशास्त्रियों ने चेताया कि कृषि कर्जमाफी एक दुश्चक्र है और इसे खत्म कर दिया जाए। कर्जमाफी के बजाय कर्ज पर लगे ब्याज को माफ करने के बारे में सोचा जा सकता है। किसान कृषि बीमा को और भी व्यावहारिक बनाना होगा। कर्जमाफी का पैसा टैक्स देने वालों की जेब से ही जाता है। छोटे किसान जिनकी तादाद लाखों ही नहीं करोड़ों में है, इसकी जद में नहीं आते और तकलीफ झेलते रहते हैं। राजनीतिक दल वोट की राजनीति के तहत ऐसा कर तो रहे हैं, लेकिन यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है और इसके बुरे परिणाम जल्द ही दिखने लगेंगे। लेकिन फिलहाल इस पर ही ज्यादा जोर है जो लोकतंत्र के लिए भी ठीक नहीं है।