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ईश्वर के बगीचे के आम

Dayashankar shukla दयाशंकर शुक्ल सागर
Updated Mon, 06 Jul 2020 08:45 AM IST
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Dayashankar shukla sagar editorial, Mangoes of god garden
आम के पौधे - फोटो : pixabay

वह सावन के रिमझिम की एक खुशनुमा दोपहर थी। आसमान पर काले बादल छाए थे। मां और पापा, दोनों घर की क्यारी में पिछले दो घंटे से व्यस्त थे। पापा उस किचन गार्डन की मिट्टी में दबी तमाम पुरानी ईंटों को बाहर निकाल रहे थे। मैं यूनिवर्सिटी के लिए निकल रहा था। उस छोटे-से करीब दस बाई चार फीट के किचन गार्डन में आम का एक पौधा लगाने का 'यज्ञ' चल रहा था। पूछने पर पता चला कि यह आम्रपाली की कोई कलम थी, जो हमारे मामा किसी नर्सरी से खरीद कर लाए थे।


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मैंने बड़ी बेपरवाही से पूछा था कि यह आम्रपाली क्या बला है? पापा ने बताया कि यह दशहरी और नीलम के क्रॉस से बनी संकर प्रजाति है। पांच-छह साल में यह मीठे फल देने लगता है। पापा ने वह पौधा मां के हाथों से लगवाया, यह कहते हुए कि 'तुम्हारी मां के हाथ के लगे पौधे जी जाते हैं।' अगले दिन देखा, तो पापा सड़क से सटे उस किचन गार्डन में लोहे की जाली लगवा रहे थे। शाम को यूनिवर्सिटी से लौटते वक्त मैं रोजाना देखता कि मां रबर के पाइप से उस क्यारी में पानी दे रही होतीं। दिन, महीने और साल बीतते गए।

वह आम का पेड़ मेरी स्मृतियों से कभी अलग नहीं हो पाया। घर में जब भी अनुष्ठान होता, तो घर के ही आम के पेड़ की सूखी लकड़ियां और पल्लव पूजा-हवन के काम आते। लखनऊ जैसे ठेठ शहर की कॉलोनी के घर में आम का 'अपना' पेड़ होना मां और पापा को कितनी खुशी का एहसास देता होगा, इसका अंदाजा मैं अब इस उम्र में आकर लगा सकता हूं। अब हमारे घर आने वाले हर वसंत का स्वागत आम का यही पेड़ करता है। जब आम का सीजन आता, तो लगता कि किसी ने पेड़ पर हरे बल्ब की झालर टांग दी हो।

इसके बाद एक लंबा सिलसिला शुरू होता आमों की रखवाली का। भरी दोपहरी मां पेड़ पर पत्थर फेंकने वालों लड़कों को डपटतीं। कभी-कभी प्यार से बुलाकर टूटे हुए आम उन्हें बांट देतीं। और फिर एक दिन मां नहीं रहीं। जब वह घर से अंतिम यात्रा के लिए निकल रही थीं, तो मैंने महसूस किया कि उस दिन हम सबको बिलखता देख वह पेड़ भी रोया था। उस साल इस आम्रपाली पर एक भी बौर नहीं आया। अब उस घर में कोई नहीं रहता। मैं अपनी दुनिया में हूं, भाई और बहन अपने-अपने जहान में।

और हम तीनों की दुनिया के बीच कहीं हमारे पापा हैं, जो एक अदृश्य और अंतरंग कड़ी बनकर हम तीनों से कहीं गहरे जुड़े हुए हैं। लेकिन हमारा वह घर वहीं है, आम का वह पेड़ वहीं है। हर साल जब भी गर्मियां आती हैं, उस आम्रपाली पर हजारों आम लद जाते हैं। ज्यादातर आम तो पकने से पहले ही लड़के तोड़ ले जाते हैं। लेकिन हमारे पड़ोसी और पुराने मित्र और उनकी पत्नी उन आमों की भरसक रखवाली करते हैं। हर साल चार-पांच पेटी आम दूसरे शहरों में बसे हम भाई-बहनों के घर पहुंच जाते हैं।

हालांकि इन आमों को पहुंचाने का खर्च इनकी कीमत से कहीं ज्यादा बैठ जाता है। लेकिन हमारे अंतस की अतल गहराइयों से जुड़े ये आम इतने स्वादिष्ट और दिव्य हैं कि हम तक पहुंचते-पहुंचते ये बेशकीमती हो जाते हैं। हर साल हम बहुत बेसब्री से अपने घर के आमों का इंतजार करते हैं। लखनऊ दशहरी और तमाम तरह के नवाबी आमों का गढ़ है, लेकिन मेरे भांजे को इस पेड़ के सिवा कोई और आम अच्छा ही नहीं लगता।

उसे इन आमों में 'नानी की खुशबू ' महसूस होती है, क्योंकि उसकी नानी उसके लिए पके आम हमेशा सबसे अलग छिपाकर रखती थीं। दिल्ली में अपने दादू के साथ रह रही मेरी प्यारी भतीजी सारे सीजन सिर्फ 'अपने घर' के आम का इंतजार करती है। और इन आमों के शिमला पहुंचते ही मेरी शरारती बेटी को ताराहाल कॉन्वेंट की अपनी क्लास की दोस्तों को जलाने का मौका मिल जाता है।

शिमला की हर लड़की के पास अपने गांव के सेब बागान के किस्से हैं। उसके जवाब में वह दादी के इस पेड़ और इसके मीठे आमों का बखान करते नहीं थकती। वह इतराते हुए कहती है, तुम्हें क्या पता, मेरी ग्रैंड मां हर साल हमें 'ईडन ऑफ गार्डन' से ये मीठे आम भेजती हैं।' अब तो मुझे भी लगने लगा है कि ये दिव्य आम हमारे किचन गार्डन के नहीं, वाकई ईडन ऑफ गार्डन यानी ईश्वर के बगीचे से ही आते होंगे।

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