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सेंधमारी से सुरक्षित नहीं डाटा की पूंजी

Mon, 26 Oct 2020 07:33 AM IST
Sachin Shrivastava सचिन श्रीवास्तव
Updated Mon, 26 Oct 2020 07:33 AM IST
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Data asset is not safe from burglary, there are many ways to steal data
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

हाल ही में चीनी कंपनी झेन्हुआ का डाटा चोरी हुआ है। इसमें जिन हस्तियों की जानकारी सामने आई है, उनमें ब्रिटिश प्रधानमंत्री, आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री, इन दोनों के परिवार तथा शीर्ष स्तर के अनेक लोग शामिल हैं। कुछ जाने-माने भारतीयों की जानकारी भी इस डाटा लीक में शामिल हैं। कुछ दिन पहले हमारे राष्ट्रीय सूचना केंद्र (एनआईसी) पर भी साइबर हमले की खबर आई थी, जिसमें डिजिटल सेंधमारी के जरिये प्रधानमंत्री समेत अन्य महत्वपूर्ण हस्तियों को निशाना बनाया गया था।


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इन दिनों दुनिया की बड़ी आबादी की जानकारी सार्वजनिक प्लेटफार्म पर उपलब्ध है और इनमें से किसी भी जानकारी के जरिये विभिन्न देश अपने दुश्मन देश को निशाना बना सकते हैं। चीन, रूस और अमेरिका पर चुनावों में हस्तक्षेप से लेकर कई देशों के संवेदनशील क्षेत्रों और संस्थाओं की जानकारी चोरी करने के आरोप हैं। भारतीय चुनाव में कैंब्रिज
एनालिटिका ने फेसबुक के जरिये हस्तक्षेप किया था, तो पेगासस ने वॉट्सएप के जरिये यह काम किया था। डाटा चोरी के जमाने में हाइब्रिड वारफेयर शब्द तेजी से चलन में आ रहा है। असैन्य तरीकों से किसी देश पर प्रभुत्व हासिल करना या उसे नुकसान पहुंचाना हाइब्रिड वारफेयर है और डाटा लीक इसी से जुड़ा है।


डाटा चोरी के कई तरीके हैं। पहला तरीका है, सीधी चोरी यानी फिशिंग। किसी एप, इंटरनेट लिंक या मैसेज आदि से आपसे जानकारी मांगी जाती है। इन दिनों एप, इंटरनेट लिंक या ई-मेल से मालवेयर भेजकर डाटा चोरी भी आम है। दूसरे स्तर पर थोक में डाटा चोरी होती है। इसमें चोर कंपनियों के डाटा को निशाना बनाते हैं। इसके लिए वायरस के जरिये कंपनी के सुरक्षा-तंत्र को निशाना बनाया जाता है। फिर आता है, डाटा बिक्री का मामला। कई एप और कंपनियां सार्वजनिक जानकारी इकट्ठा करती हैं और उसे अन्य कंपनियों को बेचती हैं।

संवेदनशील डाटा के साथ छेड़छाड़ भारत समेत कई देशों में अपराध है। अपने यहां पब्लिक रिकॉर्ड्स ऐक्ट और ऑफिशियल सीक्रेट्स ऐक्ट जैसे कानून हैं, पर वे चोरी के बाद ही कारगर हो सकते हैं। डाटा चोरी से बचने के लिए बैंकिंग एप का चयन सावधानी से करना चाहिए। नेट बैंकिंग सिर्फ एक ही कंप्यूटर पर करना चाहिए, और सार्वजनिक वाईफाई पर इससे बचना चाहिए। बैंक उपयोग के पासवर्ड बदलते रहना चाहिए तथा मैसेज में आए ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) के ऑटो फिल आप्शन को बंद रखना चाहिए। ओटीपी हमेशा खुद पंच करके डालना चाहिए।

डाटा चोरी में स्मार्टफोन एक अहम कड़ी है। जो एप हम डाउनलोड करते हैं, उससे होने वाले डाटा नुकसान की जिम्मेदारी स्मार्टफोन निर्माता कंपनी नहीं लेती। कंपनी सिर्फ फोन के साथ जुड़े ऑपरेटिंग सिस्टम, पहले से लोड एप और ब्राउजर से होने वाले साइबर हमले के लिए जिम्मेदार है। हर साल देश में करीब 20 करोड़ स्मार्टफोन बिकते हैं। इस तरह ज्यादा से ज्यादा लोग डाटा चोरों के निशाने पर आते जा रहे हैं।

स्मार्टफोन में कांटेक्ट लिस्ट, लोकेशन डाटा, मैसेज, वीडियो और फोटो के जरिये संवेदनशील डाटा लीक होता है। एप के जरिये डाटा चोरी बेहद आम है। एप से मालवेयर भेजकर यह चोरी की जाती है। डाटा चोरी में दो तरह से अटैक होता है। एक मास अटैक होता है, जिसमें टारगेट पहले से तय नहीं होता। जो इसमें फंस जाता है, उसकी जानकारी या पैसा चुरा लिया जाता है। दूसरा तरीका है टारगेट तय करके अटैक करना। इस तरह के अटैक बड़ी कंपनियों और सरकारी एजेंसियों पर किए जाते हैं।

मोबाइल में एप डाउनलोड करना और फिर उसे अनुमति देना हमारी मजबूरी बन जाता है। कई मामलों में बिना अनुमति ये एप्स नहीं चलते। जैसे ओला आदि एप के लिए लोकेशन की अनुमति देनी होती है। पर अधिकांश एप वे सारी अनुमति भी ले लेते हैं, जिन्हें उनकी जरूरत नहीं। जैसे कोई म्यूजिक एप या वीडियो स्ट्रीमिंग एप आपके मैसेज, फोनबुक, गैलरी, आदि की परमिशन ले। इससे न सिर्फ आपकी निजता, बल्कि सुरक्षा भी खतरे में है। इससे बचने के लिए एप डाउनलोड करने के बाद मोबाइल डाटा बंद करें और सेंटिंग्स में जाकर परमिशन्स हटा दें। शॉपिंग वेबसाइट्स पर आपकी कार्ड डिटेल सेव हो जाती है। सेटिंग्स में जाकर ये डिटेल्स भी हटाई जा सकती हैं। 

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