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किराया बढ़ाने की खतरनाक नजीर
कुमार प्रशांत
Updated Mon, 14 Jan 2013 11:27 AM IST
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पता नहीं, मनमोहन सिंह ने अपनी इस सरकार के जन्म के वक्त ग्रह-शांति करवाई थी या नहीं! घटनाएं बताती हैं कि या तो उन्होंने ऐसा नहीं करवाया था या फिर यह कि ऐसे टोटके किसी काम के नहीं होते! सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर लगातार एक के बाद दूसरा ऐसा कारनामा होता जा रहा है, जिसे समझना भी कठिन है और समझाना भी।
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समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया बहुत तीखा, लेकिन एकदम जगह पर चिपक जाए, ऐसी राजनीतिक भाषा बोलते थे। उन्होंने कभी निरुपाय होकर, खीज में अपने वक्त की केंद्र सरकार को राष्ट्रीय शर्म की सरकार कहा था। आज भी सरकार के संदर्भ में वैसी ही निरुपायता है। इस सरकार का दिल और दिमाग, दोनों ही ठिकाने पर नहीं है।
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अगर होता, तो दिल्ली में हुई बलात्कार की वारदात के बाद सरकार एक के बाद दूसरे ऐसे कदम उठाती, जिससे वह लोगों के करीब पहुंच सकती। लेकिन सरकार की एकमात्र कोशिश यही रही कि कैसे इस सवाल को कानून-व्यवस्था का सवाल बनाकर पुलिसिया दमन से दबा दिया जाए!
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पिछले दिनों एक ऐसी चीज हुई है, जिसका पूरा श्रेय केंद्र सरकार ले सकती है। शायद यह पहली बार ही हुआ है कि न रेल बजट बना, न संसद में पेश हुआ, न उस पर देश ने विचार किया, न संसद ने उसे पारित किया, लेकिन रेल बजट घोषित कर दिया गया! रेल मंत्री से इस सरकार ने वह करवाया है, जो अनैतिक भी है और असांविधानिक भी। सवाल रेल किराया बढ़ाने का उतना नहीं है, जितना इसका है कि वह कैसे बढ़ाया गया है।
भारतीय रेल देश के सबसे भ्रष्ट और निकम्मे महकमे में से एक है। पिछले कई वर्षों से खिचड़ी सरकार की स्वार्थी जरूरत के तहत रेलवे को लगातार सौदे में देनेवाला विभाग बनाकर इसका बंटाधार किया गया है। बहुत घूमता-फिरता अब यह विभाग जिनके जिम्मे आया है, सांसद के रूप में उनकी कोई विशिष्ट पहचान नहीं है और मंत्री के रूप में भी उनके प्रशासनिक अनुभव की बात किसी से छिपी नहीं है। ऐसे मंत्री से संसद को धोखा देकर संसद से बाहर किराया बढ़ाने की इकतरफा घोषणा करवाई गई।
सारे बड़े आर्थिक फैसले अगर सरकार संसद के बाहर करती है, तो वह संसद के अधिकार का हनन ही नहीं करती, संविधान का भी असम्मान करती है। हम लगातार ऐसी प्रवृत्ति देख रहे हैं, जिसमें सरकारें संसद से बचने में लगी रहती हैं।
अगर संसद की गरिमा गिरी है, उसके सदस्यों का स्तर गिरा है, उसमें होने वाली बहसें चौक-चौराहों की बहसों से भी नीचे के स्तर की होने लगी हैं, वहां समर्थन व विरोध के सौदे होने लगे हैं, तो इन सबके लिए वे ही दोषी हैं, जो संसद बनाते हैं। देश को आप इसकी सजा कैसे दे सकते हैं?
पिछले करीब एक दशक से रेल किराया बढ़ाया नहीं जा सका था, क्योंकि प्रधानमंत्री का रेल मंत्रालय पर नियंत्रण नहीं था। लेकिन इसमें देश का क्या अपराध कि अब उसे एक साथ 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी का बोझ उठाने को अभिशप्त होना पड़ रहा है?
यह बात भी एकदम अनैतिक और अपने एकाधिकार का शर्मनाक दुरुपयोग है कि आप जिस तारीख से किराया बढ़ाने की घोषणा करते हैं, उससे पहले जिसने टिकट खरीद रखा है, उससे भी बढ़ा किराया वसूलते हैं! एक बार जो सामान आपने उस वक्त की कीमत पर बेच दिया, उसकी बढ़ी कीमत आप किस आधार पर वसूल सकते हैं?
दरअसल सरकार इसका फायदा उठा रही है कि संसद में, और देश में भी विपक्ष जैसा कुछ बचा नहीं है। बहुत मौसमी और रस्मी विरोध के बाद सब अपने-अपने धंधे में लग जाएंगे, यह सरकार भी भली-भांति जानती है। प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा जरूर चौकन्नी है कि कैसे भी हो, ऐसे सारे अवसरों पर बनने वाला शून्य वह भरे, ताकि जनता इस सरकार की खाली होने वाली जगह पर उसे भरे।
लेकिन भाजपा की विश्वसनीयता इस कदर टूटी हुई है कि उसे फिर से खड़ा करने के लिए किसी नए अटल बिहारी वाजपेयी से कम कुछ चलेगा नहीं! कैसी विडंबना है कि अटल बिहारी वाजपेयी का शून्य यह पार्टी नरेंद्र मोदी से भरना चाहती है। विपक्ष के इस शून्य में रेल किराया बढ़ने का गुस्सा अगर अनसुना रह जाए, तो क्या आश्चर्य!