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अलग-थलग पड़ने का खतरा

Tue, 29 Jul 2014 12:43 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Tue, 29 Jul 2014 12:43 PM IST
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Danger of being alone

ऐसा लगता है कि गरीबों के लिए खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम जारी रखने के लिए किसानों से कृषि उत्पादों की सार्वजनिक खरीद के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जान-बूझकर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) को चुनौती दे रहे हैं। घरेलू स्तर पर इस मुद्दे को राजनीतिक रंग देकर मोदी किसानों का मसीहा बनने की कोशिश में हैं। इस तरह वह एक सुनियोजित खतरा मोल ले रहे हैं।

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फिलहाल बफर स्टॉक के लिए सरकारें जिस मूल्य पर किसानों से अनाज खरीदती हैं, वह डब्ल्यूटीओ के नियमों के अनुरूप तय होता है। लेकिन डब्ल्यूटीओ के मंच पर 160 देशों के बीच अकेले पड़ जाने का जोखिम उठाते हुए भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार इस मुद्दे पर देश में राजनीतिक सर्वानुमति बनाने की कोशिश में है कि अपने किसानों से अनाज खरीदने का किसी संप्रभु देश का अधिकार क्या डब्ल्यूटीओ में चर्चा का विषय हो सकता है!
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आने वाले महीनों में कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर मोदी संभवतः इस मुद्दे को हवा देना चाहते हैं। वरना, जब तकरीबन सारे देशों ने जिनेवा में डब्ल्यूटीओ के व्यापार सुधार करार (टीएफए) पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, तब एनडीए सरकार के एकाएक इससे पीछे हटने के फैसले की कोई वजह नहीं बनती।
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इससे भारत अलग-थलग पड़ गया है, क्योंकि चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे अमूमन सहयोगी माने जाने वाले देशों ने भी इस मुद्दे पर भारत से किनारा कर लिया है। इन सभी देशों ने पिछली दिसंबर में बाली में हुए नए व्यापार सुधार करार की दिशा में आगे बढ़ने पर सहमति जताई है। बाली में भारत भी वैश्विक व्यापार सुधार करार (कॉमन कस्टम्स गवर्नेंस मैकेनिज्म) का हिस्सा बनने को तैयार हो गया था। मगर उसकी शर्त यह थी कि डब्ल्यूटीओ के उन अन्यायपूर्ण नियमों में, जो हमारे किसानों से फसल के खरीद मूल्य निर्धारण में बाधा पैदा करते हैं, जब तक स्थायी सुधार नहीं होता, तब तक इस मुद्दे पर विकसित देशों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

भारत का कहना था कि खरीद मूल्यों को किसी सीमा में नहीं बांधा जा सकता, और किसानों को उनकी फसल की जो ऊंची कीमत दी जाती है, उसमें वार्षिक मुद्रास्फीति दिखनी ही चाहिए। डब्ल्यूटीओ का एक प्रावधान भी कहता है कि मुद्रास्फीति के दौरान किसानों से अनाज खरीदते हुए उन्हें जायज भत्ता देना चाहिए और वैसी स्थिति में कृषि उत्पादों का खरीद मूल्य अधिक होगा ही।

बाली में यही तर्क देकर भारत ने जी-33 देशों का समर्थन हासिल किया था। इतना ही नहीं, अमेरिका और यूरोपीय संघ ने चार वर्ष के भीतर डब्ल्यूटीओ की आगामी मंत्रिस्तरीय बैठक से पहले इसका स्थायी समाधान ढूंढने पर सहमति भी जताई थी। तत्कालीन यूपीए सरकार ने इसकी जानकारी संसद के सामने भी रखी थी। तब भाजपा भी सहमत थी कि अगर भारत को अपना खाद्य खरीद कार्यक्रम जारी रखने दिया जाता है, तो जब तक इस मुद्दे का स्थायी समाधान नहीं निकलता, भारत को इस व्यापार सुधार करार पर दस्तखत कर देना चाहिए।

मगर अब एनडीए सरकार कह रही है कि इस करार पर भारत तभी हस्ताक्षर करेगा, जब खाद्यान्नों की खरीद के मुद्दे के स्थायी समाधान की दिशा में साथ-साथ्ा आगे बढ़ा जाए। भारत की इस नई शर्त को देखते हुए चीन, इंडोनेशिया और अफ्रीका ने हमसे किनारा कर लिया है। दरअसल, मोदी सरकार यह संकेत देती प्रतीत हो रही है कि भारत चार वर्ष तक इंतजार नहीं कर सकता, और उसे तुरंत ठोस आश्वासन चाहिए। इससे बाकी दुनिया में भारत की छवि एक अड़ंगा लगाने वाले देश की बन सकती है।

डब्ल्यूटीओ में सरकार द्वारा सख्त रुख अपनाने की एक वजह यह है कि नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों को उनकी कुल लागत के अलावा मुनाफे में 50 फीसदी देने का वायदा किया था। राजनीतिक तौर पर मोदी ठीक हो सकते हैं, मगर जिस ढंग से भारत अपना पक्ष रख रहा है, वह गैर-जिम्मेदाराना है, क्योंकि इससे पूरा समझौता ही संकट में पड़ गया है। अफसोस की बात है कि खाद्य सुरक्षा और व्यापार सुधार करार को आपस में जोड़ दिया गया है, जबकि ये दोनों अलग हैं। इसके लिए अमेरिका और यूरोपीय संघ भी एक हद तक जिम्मेदार हैं, क्योंकि इसका एजेंडा उन्होंने ही तय किया था।

गौरतलब है कि डब्ल्यूटीओ के वर्तमान नियमों के तहत किसानों के लिए अलग से नकद सहायता और सब्सिडी की व्यवस्था है, जिसका खाद्य उत्पादन से कोई संबंध नहीं। मसलन, डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते में ग्रीन बॉक्स सब्सिडी का प्रावधान है, और यह सभी सदस्य देशों को उपलब्ध है। यह सब्सिडी किसानों को कृषि से जुड़ी बुनियादी व्यवस्था तैयार करने, शोध करने और दूसरे काम के लिए नकद भुगतान के तौर पर दी जा सकती है, ताकि किसानों की मदद हो सके।

डब्ल्यूटीओ के नियम दरअसल वैसी सब्सिडी को रोकते हैं, जो वैश्विक व्यापार पर नकारात्मक असर डालती है। जैसे, किसानों को उसकी फसल की कीमत बाजार मूल्य से अधिक देना। किसानों की लागत कम करने और उनका मुनाफा बढ़ाने के और भी तरीके हैं, जिन पर मोदी सरकार ध्यान दे सकती है और इनसे डब्ल्यूटीओ के नियमों पर भी आंच नहीं आएगी।


आखिर पाकिस्तान में भी बड़े पैमाने पर अनाज की खरीद होती है, मगर वहां किसानों को दी जाने वाली प्रत्यक्ष नकद सहायता बाजार मूल्य को प्रभावित नहीं करती। ऐसे में मोदी सरकार के सामने बड़ा सवाल है कि क्या एक उदीयमान आर्थिक ताकत इतने महत्वपूर्ण वैश्विक आर्थिक समझौते का हिस्सा न बन पाने से होने वाला नुकसान झेल सकती है।

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