फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Dalit academy in aristocracy of Bengal

अभिजात वर्चस्व के बंगाल में दलित अकादमी

Sun, 01 Nov 2020 04:46 AM IST
श्यौराज सिंह बेचैन श्यौराज सिंह बेचैन  
श्यौराज सिंह बेचैन   Published by: श्यौराज सिंह बेचैन Updated Sun, 01 Nov 2020 04:46 AM IST
विज्ञापन
Dalit academy in aristocracy of Bengal
दलित साहित्य

यद्यपि देश भर में दलित साहित्य के लिए अनेक अकादमियां बनी हैं। सरकारी स्तर पर यह पहली घटना है, जब पश्चिम बंगाल सरकार ने विगत सितंबर में दलित साहित्य अकादमी की स्थापना की। यद्यपि बंगाल शुरू से ही वैचारिक क्रांतियों का केंद्र रहा है, पर अभिजात वर्चस्व वाले बंगाल के साहित्यिक और राजनीतिक इतिहास में दलित चिंतन को महत्व देने का यह पहला प्रयास है। खुद रवींद्रनाथ तक ने दलितों पर न लिखने को इस तरह अभिव्यक्त किया था, 'मैं उनके आंगन तक भी नहीं जा पाया, उनके घर और भीतर की बात कैसे लिखता? पर मैं आंखें खोले, कान लगाए उन्हीं झुग्गी-झोपड़ियों की ओर देख रहा हूं कि वहां से कोई आए और उनका भोगा हुआ सच बताए।’ 


loader

शायद पश्चिम बंगाल सरकार समझ चुकी है कि वे आ चुके हैं। इस संस्था का उद्देश्य दलित लेखकों को मंच देना, दलित साहित्य की विविध विधाओं की रचनाएं प्रकाशित-अनुदित करना, दलित लेखकों को प्रोत्साहित व सम्मानित करना आदि है। 14 सदस्यीय इस अकादमी में प्रो. विजय कुमार भारती हिंदी क्षेत्र से अकेले सदस्य हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने दलित अकादमी को पूरा बजट देने का भी वायदा किया है, जिससे कि देश की विभिन्न भाषाओं के रचनात्मक दलित साहित्य का अनुवाद हो सके। चर्चित लेखक मनोरंजन व्यापारी इस अकादमी के पहले अध्यक्ष चुने गए हैं। सचिव प्रो. विजय भारती का कहना है कि हमारी अकादमी की पहचान वैसे तो राष्ट्रीय होगी, पर अलग-अलग राज्य सरकारें दलित साहित्य अकादमियां गठित करेंगी, तो काम बंट जाएगा और अन्य सरकारों का भी अपना दायित्व अमल में आता हुआ नजर आएगा। यद्यपि वर्ष 1984 में बाबू जगजीवन राम द्वारा डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर की अध्यक्षता में दलित साहित्य अकादमी की स्थापना हुई थी, जिसकी तीन सौ से अधिक शाखाएं सक्रिय हैं। पर सरकारी स्तर पर दलित साहित्य अकादमी का बनना और दलित लेखक को अध्यक्ष बनाया जाना पहली घटना है।

मनोरंजन व्यापारी की जीवन कथा रोमांचित करने वाली है। वह रिक्शा चलाते थे। दिग्गज लेखिका और वर्तिका पत्रिका की संपादक महाश्वेता देवी एक दिन उनके रिक्शे पर बैठीं। उन्हें पत्र-पत्रिकाओं से लदी देख व्यापारी ने उनसे पूछा कि जिजीविषा शब्द का क्या अर्थ होता है। महाश्वेती देवी चौंक गईं। व्यापारी ने बताया कि वर्तिका पत्रिका उनके पास भी आती है, पर उन्हें इस शब्द का अर्थ मालूम नहीं। महाश्वेता जी ने उन्हें जिजीविषा का अर्थ बताया, साथ ही, उन्हें प्रस्ताव दिया कि आप हमारी पत्रिका के लिए लिखें। मनोरंजन तो लंबे समय से लिख-पढ़ रहे थे, पर प्रकाशित कराने को उनके पास कोई मंच नहीं था। इस तरह उनका लेखकीय जीवन शुरू हुआ। उनकी चर्चित आत्मकथा इतिवृत्त चांडाल जीवन का अंग्रेजी अनुवाद आ चुका है। यह श्रमजीवी लेखक रिक्शा चलाने से लेकर स्कूल में रसोइये का काम कर चुके हैं। नक्सलवादियों से नजदीकी के संदेह में जेल यात्रा भी कर चुके हैं। जेल ही में उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई। स्वाध्याय और निरंतर अभ्यास से उन्होंने अपनी रचनात्मक क्षमता विकसित की है। जेल से छूटने के बाद वह रिक्शा खींचकर जीवन-निर्वाह कर रहे थे।

इन पंक्तियों के लेखक का व्यापारी से करीब दस साल से संपर्क संवाद है। गत वर्ष जयपुर साहित्य सम्मेलन के ‘दलित बचपन’ सत्र में उनके साथ मंच साझा करने का संयोग बना था। वहां उनसे मैंने कई सवाल पूछे थे। जैसे कि वह बार-बार एक ही कहानी क्यों कहते रहे, महाश्वेता देवी ने आत्मकथा के अलावा उनका और कुछ क्यों नहीं छापा या उन्होंने और कुछ नहीं लिखा? इस पर उन्होंने दिलचस्प तथ्य उद्घाटित किया। उनका कहना था कि मैंने कहानियां, उपन्यास और वैचारिक लेख लिखे हैं, पर जब मैं आत्मकथा के अलावा कुछ भी छपने को देता था, तो महाश्वेता जी छापने से इनकार कर देती थीं। वह कहती थीं, ‘तुम अपनी कहानी कहो।’ व्यापारी दोबारा जेल जाना चाहते थे, क्योंकि जेल में समय पर नाश्ता और खाना मिलता था, वहां पढ़ने-लिखने को किताबें-कॉपियां थीं और पढ़ाने वाले भी थे। व्यापारी की शिकायत है कि हिंदी में अभी तक उनकी केवल एक ही कहानी अनुदित हो पाई है। पर अब उनका संपूर्ण साहित्य हिंदी-उर्दू-मराठी-पंजाबी में अनुदित हो सकेगा।

आजादी के बाद पश्चिम बंगाल में अनेक साहित्यिक संगठन बने, पर वामपंथी सरकारों ने दलित साहित्य संगठन तो दूर, एक दलित लेखक तक नहीं उभरने दिया। वहां अनेक दलित लेखक हुए, पर वे अपनी स्वतंत्र पहचान नहीं बना पाए। वामपंथी लेखक-राजनीतिक दलित लेखन को पहचानते हैं, पर वे उन्हें अपने अधीन अपना कैडर बनाकर उनके लेखन की जाति विषयक धार भोथरी कर देते हैं। प्रगतिशील लेखक संघ यानी प्रलेस की बात करें, तो इसने सांप्रदायिक सद्भाव के पक्ष में और गैर बराबरी के खिलाफ सराहनीय कार्य किया, पर जातिगत घृणा, निचली जातियों को गांव से बाहर बसाने और अस्पृश्यता पर चुप्पी साधे रखी। हिंदी क्षेत्र में स्वामी अछूतानंद और उनके आदि हिंदू आंदोलन के सैकड़ों दलित लेखक लेखन कर रहे थे। पर उनके साहित्य को आगे नहीं आने दिया गया। यह संयोग नहीं है कि हिंदी के एक भी दलित लेखक को साहित्य अकादेमी पुरस्कार नहीं दिया गया है। चूंकि केंद्र की साहित्य अकादममियां दैहिक छुआछूत का पड़ाव पार कर चुकी हैं, ऐसे में, दलितों के लिए स्वतंत्र अकादमी बनाने की मांग उठ रही है। इस पृष्ठभूमि में पश्चिम बंगाल की पहल उम्मीद जगाती है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed