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पड़ताल : संघीय मूल्यों की खातिर टालने होंगे टकराव के हालात, जरूरी है असहमति को सुनना और असंतोष का शमन
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केंद्र सरकार (सांकेतिक तस्वीर)
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विस्तार
वर्ष 2019 के बाद जब से नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापस लौटी है, केंद्र सरकार और गैर-भाजपा शासित राज्यों के बीच टकराव बढ़ गए हैं। विशेष रूप से तीन राज्य इस संघर्ष के केंद्र में रहे हैं-पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल। सभी मामलों में केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से पक्षपातपूर्ण ढंग से काम करते प्रतीत होते हैं। इन राज्यों का दावा है कि केंद्र ने उन्हें उनके राज्य का पैसा देने से इनकार कर दिया है, उनके राज्य की सांस्कृतिक विरासत की उपेक्षा की है आदि।
हाल के महीनों में दो अन्य राज्य असहमतों के इस क्लब में शामिल हो गए हैं। ये हैं- पंजाब और कर्नाटक, जहां क्रमशः आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की सरकार है। पंजाब के राज्यपाल वहां के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के साथ भिड़ गए। जहां तक कर्नाटक की बात है, पिछले मई में जब से कांग्रेस सत्ता में लौटी है, उसकी सरकार का केंद्र से कई बार टकराव हो चुका है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मोदी सरकार पर राजस्व के संबंध में कर्नाटक के खिलाफ भेदभाव करने और सूखे से प्रभावित किसानों की दुर्दशा के प्रति उदासीन रहने का आरोप लगाया है। हाल ही में सिद्धारमैया और शिवकुमार ने नई दिल्ली में जंतर मंतर पर एक विरोध बैठक आयोजित कर अपना मामला राष्ट्रीय राजधानी में उठाया। कुछ दिनों बाद केरल के मुख्यमंत्री ने अपने राज्य कीओर से इसी तरह के विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया।
केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और पंजाब में कुल मिलाकर 30 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। वे भारत की आबादी के पांचवें हिस्से से अधिक हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य एवं लैंगिक समानता के मामले में केरल और तमिलनाडु देश के सबसे प्रगतिशील राज्यों में से हैं। तमिलनाडु एक औद्योगिक ऊर्जा केंद्र भी है। कर्नाटक लंबे समय से वैज्ञानिक शोध के मामले में अग्रणी रहा है और हाल के दशकों में सूचना प्रौद्योगिकी एवं जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में भी। जब हमारे ऊपर अंग्रेजों का शासन था, तब बंगाल के कुछ सबसे बहादुर लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। आजादी के बाद से इस राज्य ने हमें कुछ बेहतरीन संगीतकार, फिल्म निर्माता और विद्वान दिए हैं। पंजाब के सिखों ने हमारी खाद्य सुरक्षा और हमारे सशस्त्र बलों में आनुपातिक रूप से भारत के किसी भी अन्य समुदाय की तुलना में कहीं अधिक योगदान किया है।
पांच राज्य, जिनमें से प्रत्येक का हमारे देश के अतीत एवं वर्तमान में विविध और विशिष्ट योगदान है तथा प्रत्येक राज्य में भाजपा से भिन्न पार्टियों की सरकारें हैं, क्या राज्यों एवं संघ के बीच चल रहा मौजूदा विवाद वास्तव में हमारे देश के हित में है?
इससे पहले कि मैं उस प्रश्न का उत्तर दूं, हाल ही में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की कुछ टिप्पणियों पर ध्यान दें, जिनमें उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को संसद में लगातार तीसरी बार बहुमत न मिले। फरवरी की शुरुआत में अपने राज्य के अंतरिम बजट के दौरान रेड्डी ने कहा कि अगर केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी अपने अस्तित्व के लिए दूसरों दलों पर निर्भर रहती है तो आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा दिए जाने की लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करने की बेहतर संभावना होगी। ममता बनर्जी, एमके स्टालिन या पिनरई विजयन के विपरीत आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कभी भी नरेंद्र मोदी, भाजपा या केंद्र सरकार के प्रति टकराव का रुख नहीं अपनाया। लेकिन अब वह भी गैर-भाजपा शासित राज्य सरकारों के प्रति मोदी सरकार के अहंकारी, दबंग और वास्तव में सत्तावादी रवैये को लेकर चिंतित दिख रहे हैं।
हालांकि यह कहना मुश्किल है कि क्या जगन रेड्डी की धीरे-धीरे आलोचनात्मक मुद्रा और अधिक उग्र विरोध में तब्दील हो जाएगी या क्या तेलंगाना के नए कांग्रेसी मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, कर्नाटक में अपने पार्टी सहयोगियों के साथ मिलकर केंद्र से अधिक कर राजस्व और निष्पक्ष व्यवहार की मांग करेंगे। भले ही ये दोनों मुख्यमंत्री अलग रहें, लेकिन भाजपा के प्रभुत्व वाली केंद्र सरकार और गैर-भाजपा शासित राज्यों- पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और पंजाब के बीच चल रहा टकराव बेहद चिंताजनक है, जो मुझे पहले पूछे गए प्रश्न पर वापस लाता है।
इन टकरावों के कहां तक जाने की संभावना है? प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री के कथनी और करनी को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा किसी भी आधार पर इन राज्यों की मांगों को स्वीकार नहीं करना चाहती। इनके तीन तरीके हैं, जिनसे यह अन्य दलों द्वारा शासित राज्यों के हितों और इच्छाओं के खिलाफ खुद को और भी मजबूती से स्थापित करना चाहती है।
पहला है, अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगाना, और विपक्ष द्वारा नियंत्रित राज्यों को संसाधनों से वंचित करने और उनके स्वायत्त कामकाज पर और अधिक अंकुश लगाने के लिए उन शक्तियों का उपयोग करना, जिन्हें केंद्र ने कोविड महामारी के बाद से हड़प लिया था। दूसरा, नागरिकों से अगले विधानसभा चुनाव में अन्य पार्टियों के बजाय भाजपा को वोट देने के लिए कहना, इन राज्यों के निवासियों से वादा करना कि यदि वे ‘डबल इंजन सरकार’ चुनते हैं तो उनके साथ अधिक अनुकूल व्यवहार किया जाएगा। तीसरा है, सीबीआई और ईडी का दुरुपयोग करके अन्य दलों के विधायकों को भाजपा में शामिल होने के लिए प्रेरित करना।
ये तीनों तरीके अक्सर एक साथ काम करते हैं। भाजपा दो या दो से अधिक विपक्षी गठबंधन वाली राज्य सरकार को तोड़ने में सक्षम रही है, जैसा 2019 में कर्नाटक में, 2022 में महाराष्ट्र में, हाल ही में उसने बिहार में किया है। लेकिन जहां गैर-भाजपा पार्टी बहुमत में है, जैसे कि पश्चिम बंगाल, केरल या तमिलनाडु, वह सरकारगिराने में विफल रही है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल की वैध रूप से निर्वाचित सरकारों के खिलाफ केंद्र की स्पष्ट शत्रुता के परिणामस्वरूप कई बंगालियों, तमिलों और मलयाली लोगों में गहरी (और मेरे विचार से काफी हद तक उचित) नाराजगी है। गोदी मीडिया में भारत की संघीय व्यवस्था पर तनाव की कभी चर्चा नहीं होती। फिर भी विचारशील भारतीयों को पार्टी संबद्धता की परवाह किए बिना ऐसे मामलों पर अधिक ध्यान देना चाहिए, जो हमारे गणतंत्र के भविष्य के लिए कोई शुभ संकेत नहीं है।