{"_id":"00e2a94e-5ce9-11e2-9941-d4ae52bc57c2","slug":"culprit-of-that-night","type":"story","status":"publish","title_hn":"उस रात के गुनहगार","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
उस रात के गुनहगार
तवलीन सिंह
Updated Sun, 13 Jan 2013 12:20 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
निर्भया के दोस्त का इंटरव्यू मैंने जी-टीवी पर जब देखा, तो जो मायूसी उस बच्ची की दर्दनाक मौत के बाद दिल में छाई रही, वह और गहरी हो गई। ऐसा लगा जैसे इस एक कहानी में देश की सारी प्रशासनिक नाकामियां चिल्ला-चिल्ला कर सामने आकर खड़ी हो गई हों। पहली नाकामी जो पेश आती है, वह है भारत की राजधानी में सार्वजनिक यातायात का सुरक्षित न होना।
विज्ञापन
किसी वीरान इलाके में नहीं, बीच शहर में जहां दिखते हैं चमकते माॅल, पांच सितारा होटल, आलीशान रिहायशी इमारतें और जहां सड़कों पर इतनी भीड़ रहती है अक्सर कि जो हुआ उस मनहूस रात काले शीशों वाली बस के अंदर कभी नहीं होना चाहिए था।
विज्ञापन
क्या मर गए थे हम सब उस रात? कहां थी पुलिस की वह गश्त करने वाली गाड़ियां? कहां थे सड़कों पर रोज चलने वाले बाकी लोग? क्या एक भी लाल बत्ती पर नहीं रोकना पड़ा था उस बस को? क्या किसी ने नहीं देखा कि बस का ड्राइवर नशे में था? अगर देश की राजधानी में इतना बड़ा अपराध हो सकता है ऐसी सड़कों पर जहां हर दो कदम पर लाल बत्तियां मिलती हैं, तो भारत के अन्य शहरों में क्या हाल होगा?
विज्ञापन
निर्भया के दोस्त बताते हैं कि सिनेमा से निकलने के बाद उनको अगर ऑटो मिल जाता, तो शायद वह आज जिंदा होती। कई ऑटो खड़े थे मॉल के बाहर, लेकिन मनमानी करते हैं ऑटोवाले रात को। यह बात हम सब जानते हैं, और हमसे अच्छा जानती होगी दिल्ली की मुख्यमंत्री, लेकिन कभी कुछ नहीं कर पाई हैं ऑटो वालों को काबू में लाने के लिए अपने लंबे शासनकाल में। क्यों?
न्यूयॉर्क और लंदन जैसे महानगरों में अगर कोई टैक्सी वाला सवारी लेने से इंकार करता है, तो आप फौरन फोन कर सकते हैं और शिकायत दर्ज कर सकते हैं। वहां नियम होता है कि तीन या चार शिकायतों के बाद लाइसेंस जब्त हो जाता है ड्राइवर का। क्या इतना मुश्किल है भारत की राजधानी में ऐसा नियम लागू करना? निर्भया के दोस्त आगे बताते हैं कि जब उन दरिंदों ने दोनों को अर्धनग्न हालत में सड़क पर फेंका था, तो 45 मिनटों तक किसी ने उनकी कोई मदद नहीं की।
मैं बार-बार सोचती हूं, क्यों हुआ, क्योंकि रोज घर जाते वक्त मुझे गुजरना होता है उस सड़क से और कभी भी, मगर देर रात को भी मैंने इस सड़क को सुनसान हाल में नहीं देखा। अगर कोई उन्हें कपड़े तक देने के लिए आगे नहीं बढ़ा, तो इसमें दोष आम आदमी का नहीं, समाज का है, लेकिन उसकी बातें करते हैं थोड़ी देर में, क्योंकि ज्यादा जरूरत है पहले पुलिस की नाकामियों पर बात करना।
पीसीआर वैन जब पहुंचीं (एक नहीं तीन) तो पीड़ितों की सहायता करने के बदले झगड़ा करने लग गए पुलिसवाले इस बात को लेकर कि किस थाने की जिम्मेदारी थी उनको अस्पताल पहुंचाने की। अभी तक इस कहानी में आपको बुनियादी इंसानियत की अगर थोड़ी-सी भी झलक दिखी है, तो आप धन्य हैं। और न ही बुनियादी इंसानियत दिखी अस्पताल पहुंचने के बाद।
सर्दी की रात थी, लेकिन किसी में इतनी भी इंसानियत नहीं थी कि अस्पताल में भर्ती की खानापूर्ति होने के दौरान निर्भया के दोस्त को ओढ़ने के लिए कंबल दे देता। अस्पताल और पुलिस के अधिकारी अब जोर से कहते फिर रहे हैं कि उनकी तरफ से कोई लापरवाही नहीं हुई, लेकिन हमने देखा है कई बार सरकारी अस्पतालों की कार्रवाइयों को, इसलिए उनकी बातों पर यकीन नहीं कर सकते।
निर्भया के दोस्त ने जब एफआईआर दर्ज करने की कोशिश की, तो वहां भी विलंब और लापरवाही। अपने भारत महान में अक्सर ऐसा ही होता है। बुनियादी इंसानियत की कमी अगर सिर्फ अधिकारियों और पुलिसवालों में न होती, तो इस कहानी में दर्द थोड़ा कम होता। निजी तौर पर मुझे निर्भया के दोस्त की कहानी सुनते हुए सबसे ज्यादा मायूसी उस समय हुई, जब उन्होंने बताया कि जब दोनों को बस से फेंका गया पुल के नीचे, तो एक गाड़ी नहीं रुकी उनकी मदद करने।
एक-दो रुक भी गई थी, लेकिन तमाशा देखने के लिए, मदद करने के लिए नहीं। न ही उन लोगों ने मदद की, जो उनके आसपास जमा हुए उनका हाल देखकर। इस बात पर अगर ध्यान देंगे, तो आप समझ जाएंगे कि बुनियादी इंसानियत का अभाव इस देश के आम आदमी में भी उतना ही है, जितना अधिकारियों में दिखता है। हम अपनी बेटियों को पैदा होने से पहले ही मार डालते हैं।
अगर पैदा हो जाती हैं, तो अफसोस करते हैं। उनके बचपन से उन्हें एहसास कराते हैं कि उनका घर कोई और है, कि उनके दहेज का बोझ कितना है। बोझ मानते हैं हमअपनी बेटियों को, तो किस आधार पर इंसानियत की उम्मीद रख सकते हैं किसी और से? निर्भया की कहानी ने अगर देश भर में लोगों के दिल को छुआ है, तो इसलिए कि हम जानते हैं कि उसके गुनहगार कहीं न कहीं हम भी हैं।