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भीड़ रहे या जाए भाड़ में

Wed, 27 Nov 2013 06:31 PM IST
अशोक सण्ड
अशोक सण्ड Updated Wed, 27 Nov 2013 06:31 PM IST
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crowd should be or not, go to the hell

यह फिल्मों का कुसंस्कार है, जो उस दिन चुनावी रैली में वापस जाती भीड़ को महिला मुख्यमंत्री द्वारा आर्त कंठ से बुलाने पर मदर इंडिया वाला सीन याद आ गया। ओ जाने वालो जाओ न दर अपना छोड़ के...माता बुला रही है तुम्हें ‘हाथ’ जोड़ के।

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इन दिनों भाइयों और बहनों के आत्मीय संबोधन से मुग्ध आम आदमी जहां एक तरफ भीड़ का हिस्सा बनने के लिए तत्पर है, वहीं मोहभंग होने पर सभास्थल से खिसकना भी आता है उसे। भीड़ एक तंत्र है। भीड़ का एक चरित्र होता है। चुनावी भीड़ मतलब विशाल रैली अर्थात आम आदमियों का झुंड। मुफ्त खाने और फोकट की बस यात्रा का टेंपोररी पैकेज।
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हाइटेक हो रही है रैलियां। वन्स अपॉन अ टाइम नेताओं को सुनने के लिए खुद-ब-खुद खिंच आती थी भीड़, अब नेताओं की रैली विराट बनाने के लिए खींचतान होती है। सफलता का श्रेय लेने की होड़। ऐसे में जब भीड़ छंटती है, तब निरीह आयोजक का विनय स्वाभाविक है।
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एक समय था, जब ओजस्वी भाषण की लालसा में श्रोता धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते थे। नया दौर रैलियों का है। उत्तेजक भाषणों का है। रैलियों में उमड़ती भीड़ साबित कर रही है कि एक सौ बीस करोड़ की आबादी वाले इस देश में प्रचुर संख्या में लोग निठल्ले हैं। फुर्सत में हैं। ठलुआ हैं। लिहाजा पहुंच जाते हैं रैली में।

जब कोई और काम न हो, तो यही काम भला। रैली में अनुपस्थित ‘भाइयो और बहनो’ के लिए ‘मीडिया जी सदा सहाय’। कॉमेडी, ट्रेजेडी और नई लिखी जा रही आने वाले दो हजार चौदह के चुनाव की बुनियाद के लिए नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे घूम रहे है नए-पुराने मिस्त्री।

बुनियादी बातें हाशिये पर। सभ्यता, संस्कृति, संसदीय भाषा, इतिहास, बौद्धिकता लापता। चढ़ती आस्तीनें, पानी पी-पीकर गरजती आवाज, परस्पर छींटाकशी। बेलगाम जुबान, तरकश भरे शब्द बाण। खिंची हुई प्रत्यंचा। आरोप-प्रत्यारोप का अनूठा संगम। मर्यादा की सरस्वती लुप्त। कभी-कभी मेरे दिल में भी ख्याल आता है कि इस देश में राजनीति में धंसा हर शख्स विधायक या सांसद होकर ही क्यों देश सेवा करना चाहता है!


भला हो धरती के उस भगवान का, जिसकी कृपा से दो दिन अखबार और टीवी चैनलों ने स्वाद बदल दिया, अन्यथा चुनावी चाट से हाजमा बिगड़ चुका है भाइयों और बहनों का। मौसम फिलवक्त रैलियों, थैलियों और गालियों का है। नित नई रैली। नित नए खुलासे। उनको हर हाल में बोलना है। भीड़ रहे या जाए भाड़ में।

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