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सनातन धर्म का रचनात्मक आदर्श

Sun, 14 Apr 2013 11:14 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Sun, 14 Apr 2013 11:14 PM IST
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creative ideal of sanatana dharma

संसार के सभी धर्मों का एक ही मूल है कि सौहार्द बनाकर रखना चाहिए और एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। लेकिन कभी-कभी हम भौतिक सुख-सुविधा के वशीभूत होकर गलत तरीके से धनार्जन करने से भी संकोच नहीं करते।

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गीता-प्रेस के संस्थापक आध्यात्मिक विभूति भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार लोगों की भावना से खेलने वाले ऐसे व्यापारियों का पुरजोर विरोध करते थे।

उन दिनों वह कलकत्ता (अब कोलकाता) में क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थे। वहां एक कपड़ा मिल में काम करने वाले एक परिचित ने उन्हें बताया कि विदेशी तकनीक से बनने वाले कपड़े में मांड लगाने के लिए गाय-बैलों की चर्बी का प्रयोग होता है। यह सुनते ही उन्होंने विदेशी कपड़ों का प्रयोग न करने का संकल्प ले लिया।
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भाई जी की दादी रामकौर परम गौ-भक्त तथा धार्मिक महिला थीं। गाय की चर्बी के प्रयोग की बात सुनते ही उन्होंने अपने तमाम विदेशी कपड़े आग को भेंट कर डाले। भाई जी की पत्नी रामदेई ने भी अपनी तमाम कीमती साड़ियां अग्नि को समर्पित कर डालीं।
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गांवों के बुनकरों द्वारा हथकरघों पर बनाई खादी तथा खादी की साड़ियां मंगाई गईं तथा पूरे परिवार ने आजन्म स्वदेशी खादी पहनने का संकल्प ले लिया। मालवीय जी ने एक बार कहा था, हनुमान प्रसाद पोद्दार ने स्वदेशी के प्रयोग की पहल कर सनातन धर्म का रचनात्मक आदर्श प्रस्तुत किया है।

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