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विश्लेषण: दुनिया के सामने बेनकाब पाकिस्तान, शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर ठीक नहीं है सख्ती
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बलोच मार्च
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अमर उजाला
विस्तार
बलूचिस्तान हमेशा गलत कारणों से सुर्खियों में रहता है। पाकिस्तान का सबसे बड़ा, लेकिन सबसे कम आबादी वाला यह प्रांत कभी भी इस्लामाबाद या प्रधानमंत्री कार्यालय के निशाने पर नहीं रहा था। दशकों पहले यह पहली बार तब खबरों में आया, जब पाकिस्तान ने चगाई के पहाड़ों में एक परमाणु उपकरण का परीक्षण किया, जिससे इस खूबसूरत इलाके का पर्यावरण नष्ट हो गया। खनिज संपदा के मामले में यह प्रांत उम्मीद से ज्यादा समृद्ध है और तांबा एवं सोना जैसे कई खनिजों की अभी खुदाई भी नहीं हो पाई है। सुई के छोटे से इलाके में खोजी गई सुई गैस पूरे पाकिस्तान में रसोई बनाने एवं घर को गर्म रखने के लिए पाइपों द्वारा आपूर्ति की जाती है, लेकिन दुखद बात है कि बलूचिस्तान के कई इलाके इससे वंचित हैं।
इन दिनों दुनिया भर की निगाहें, मीडिया और सिटिजन जर्नलिस्टों के कैमरे इस्लामाबाद नेशनल प्रेस क्लब पर टिके हुए हैं। खुली जगहों पर हर जगह तंबू लगे हुए हैं, जिनमें बलूचिस्तान के लोग भरे हुए हैं। उनमें से अधिकांश महिलाएं, बच्चे और बूढ़ी औरतें हैं।
सुबह वे अपने प्रियजनों की तस्वीरें लेकर शांति से बैठते हैं, जिसके बारे में किसी शब्द की जरूरत नहीं है। ये युवा और बुजुर्ग उन महिलाओं और बच्चों के रिश्तेदार हैं, जिनमें से अधिकांश दशकों से लापता हैं। उनके परिजनों को कुछ पता नहीं है कि वे जीवित हैं या मृत। इन महिलाओं के लिए इससे अधिक पीड़ादायक कुछ नहीं हो सकता, विशेषकर अपने पोते-पोतियों से घिरी दादियों के लिए, जब वे उन सुंदर युवाओं के पोट्रेट और बैनर हाथ में पकड़ती हैं, जो गायब हैं या जैसा कि अब उन्हें 'जबरन गुमशुदा' के रूप में जाना जाता है। इस भीड़ में वे महिलाएं भी शामिल हैं, जो अपने पुरुष परिजनों की न्यायेतर हत्याओं के बाद बच गई हैं। वे मानवाधिकार उल्लंघन का भी विरोध कर रही हैं।
ये बलूची नागरिक बलूचिस्तान से पैदल चलकर इस्लामाबाद पहुंचे हैं, जिन्हें वे 'बलूचिस्तान टू इस्लामाबाद लांग मार्च' या 'बलूच लांग मार्च' कहते हैं। इस्लामाबाद की ओर बढ़ते हुए यह मार्च शांतिपूर्ण था, लोगों ने उनका स्वागत किया, उनके खाने और रात में रहने की व्यवस्था की। अन्य इलाकों में भी गुलाब की पंखुरियां फेंककर और माला पहनाकर नायकों की तरह उनका स्वागत किया गया। सुरक्षाकर्मी न तो चिंतित दिखे और न ही उन्हें शहरों व कस्बों में रोका। लेकिन जैसे ही बलूच लॉन्ग मार्च इस्लामाबाद के करीब पहुंचा, एकाएक सब कुछ बदल गया।
अनवारुल हक काकर की कार्यवाहक सरकार ने अपना आपा खो दिया और मार्च में शामिल सैकड़ों थके हुए लोगों, विशेषकर बच्चों को राजधानी इस्लामाबाद के मुख्य इलाके में प्रवेश करने से रोकने की कोशिश की, जिससे सारी शांति भंग हो गई। मार्च करने वालों को इस्लामाबाद में विभिन्न जगहों पर ले जाया गया, जहां वे न केवल जनता से, बल्कि अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए बाजार से भी पूरी तरह कट जाते।
पुलिस ने, जैसा कि वे दक्षिण एशियाई देशों में करने के लिए जानी जाती हैं, सख्ती दिखाई और भीड़ को संभालने के बजाय, जिनमें अधिकांश महिलाएं एवं बच्चे थे, निहत्थे एवं शांतिपूर्ण नागरिकों पर सख्त बल प्रयोग किया। भीषण लाठीचार्ज, रबड़ की गोलियां और आंसू गैस भी जब मार्च को नहीं रोक सकीं, तो उन्होंने अंतिम उपाय के रूप में सर्दी के मौसम में पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। उचित न्यायिक प्रक्रिया के बिना पुरुष एवं महिलाओं को उठाकर वैन में डाल दिया गया और उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। जेल में बंद लोगों का कई हफ्तों तक कोई अता-पता नहीं था। व्यापक मीडिया अभियान के बाद अंततः उन सभी मार्च करने वालों को रिहा कर दिया गया।
महरंग बलूच नामक एक महिला डॉक्टर इस मार्च की नायिका बनकर उभरी हैं, जिन्होंने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। वह पूरे दिन इंटरव्यू देती रहती हैं और रात में भी मीडिया उनसे दिन भर के घटनाक्रमों के बारे में पूछता रहता है। महरंग बलूच एक महिला मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, जो बलूचिस्तान में अधिकारियों द्वारा गैर-कानूनी ढंग से लोगों को गायब करने और न्यायेतर हत्या जैसे उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष करती हैं। इस्लामाबाद में लोग उनसे पहली बार मिले और उन मुद्दों को सुना, जो उन्होंने इससे पहले कराची एवं क्वेटा में उठाए थे, जहां उन्होंने विरोध प्रदर्शन किया था।
उनके इस्लामाबाद आने से न केवल अंतरराष्ट्रीय मीडिया, बल्कि राजनयिक समुदाय ने भी पहली बार देखा कि पाकिस्तान की हुकूमत किस तरह निहत्थे एवं शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों का उत्पीड़न करती है। महरंग बलूच और उनके समर्थकों को जबर्दस्त मीडिया कवरेज मिला, हालांकि सरकार ने इस्लामाबाद पुलिस और सादी वर्दी में अन्य लोगों द्वारा प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न से संबंधित तस्वीरों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की। इस पर नॉर्वे के राजदूत और यूरोपीय संघ के राजदूत की तत्काल प्रतिक्रिया देखी गई, जिन्होंने सावधानी बरतने की सलाह दी। विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने तुरंत शर्मिंदा होकर प्रतिक्रिया व्यक्त की और वरिष्ठ राजनयिकों से पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने को कहा।
12 दिसंबर, 2009 को महरंग बलूच के पिता को पाकिस्तानी सुरक्षा बल ने तब जबरन अपहृत कर लिया था, जब वह कराची स्थित अस्पताल जा रहे थे। तब वह मात्र 16 साल की थीं। पाकिस्तान के रूढ़िवादी समाज में रहने के बावजूद उन्होंने तुरंत अपने पिता के अपहरण का विरोध किया और छात्र प्रतिरोध आंदोलन में पहचानी जाने लगीं। दुख की बात है कि वर्ष 2011 में उनके पिता मृत पाए गए, जिनके शरीर पर उत्पीड़न के निशान थे। लेकिन महरंग का दुख यहीं खत्म नहीं हुआ, क्योंकि दिसंबर, 2017 में उनके भाई का अपहरण कर लिया गया, और तीन महीनों से ज्यादा समय तक हिरासत में रखा गया।
महरंग बलूच ने बताया, सत्ता प्रतिष्ठान ने शुरू से ही हमारी मांगों के प्रति आधी-अधूरी और बेमन से चिंता दिखाई है। दुखद है कि दुनिया लगातार सत्ता प्रतिष्ठान की गैर-जवाबदेही और हठधर्मिता देख रही है, जहां शांतिपूर्ण आंदोलन करने पर प्रदर्शनकारियों को यातनाएं और गिरफ्तारी झेलने के साथ मीडिया ट्रायल का भी सामना करना पड़ता है।