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अदालतों के भरोसे देश
कुमार प्रशांत
Updated Mon, 15 Jul 2013 06:05 PM IST
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जब अदालतें देश चलाने लगें, तब समझ लेना चाहिए कि संसदीय लोकतंत्र गंभीर रूप से बीमार है। ठीक वैसे ही, जैसे जब फौज देश चलाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि लोकतंत्र का अंत हो चुका है।
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अदालतें देश चलाए, तो इसके कई नतीजे बेशक अच्छे नहीं होते- देश चलाने के लिए जिस सामाजिक स्वीकृति और समर्थन की जरूरत होती है, वह अदालतों के पास नहीं होती; अपने फैसलों को लागू करवाने की दूसरी कोई ताकत अदालतों के पास नहीं होती, इसलिए वे पुलिस आदि पर निर्भर होती हैं।
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जहां पुलिस समाज चलाती है, वहां फौज ज्यादा दूर नहीं होती। इसका सबसे बुरा परिणाम यह होता है कि अदालतें जो करना चाहती हैं, वे नहीं कर पातीं।
आशाओं पर लगातार कुठाराघात समाज में कायरता भी पैदा करता है। हमारे समाज में यह सारा कुछ हो रहा है, इसलिए यह कदापि खुशी और संतोष का विषय नहीं है कि अदालतें देश चलाएं, लेकिन मैं एक अलग तरह से खुश हूं कि आज की अत्यंत नाजुक स्थिति में अदालतें देश चला रही हैं।
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यह हमारे लोकतंत्र को, हमारे संविधान की नायाब देन है। हमारे संविधान ने देश चलाने के जितने शक्ति-केंद्र बनाए, उनमें से किसी को भी स्वयंभू नहीं बनाया। न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका, तीनों ही अपने-अपने दायरे में सर्वोच्च हैं, लेकिन संविधान ने इन सबकी डोर कहीं आपस में बांध भी रखी है।
संविधान ने इन पर यह जिम्मेदारी भी डाल रखी है कि ये सावधानी से परिस्थिति का आकलन करते रहें; और जहां लगे कि कोई स्तंभ कमजोर पड़ रहा है, तो वहां दूसरा आगे बढ़कर उसकी जिम्मेदारी संभाल ले, और इस तरह संभाले कि कमजोर स्तंभ खुद को स्वस्थ बनाकर, जिम्मेदारी संभालने में समर्थ हो जाए।
हम आज जो होता देख रहे हैं, वह कुछ और नहीं, संविधान की इसी आपातस्थिति का अवलंबन है।
अदालतों ने दो-तीन बड़ी बातें की हैं- अपराधी-आरोपी सांसदों-विधायकों को तत्काल सदस्यता से बर्खास्त करने के रास्ते में संसद ने यह रोड़ा अटका रखा था कि उसे तीन महीने के भीतर अदालत में अपील की छूट रहेगी और जब तक अपील पर अदालत का फैसला नहीं हो जाता, तब तक उसकी सदस्यता चलती रहेगी।
अपने विशेषाधिकार का गलत इस्तेमाल करके सांसदों ने अपने लिए यह चोर दरवाजा बना लिया था। इसी की आड़ लेकर भारतीय संस्कृति के उन्नायकों ने, महात्मा गांधी की विरासत के दावेदारों ने और समाजवाद के पैरोकारों ने भी बाहुबलियों को गले लगाया और नवजात लोकतंत्र को सत्ता की भूख की अंधेरी गली में उतार दिया।
अदालत ने फैसला दिया है कि विधायिका को ऐसा विधान करने का अधिकार ही नहीं है। उसने हमारा ध्यान हमारे संसद की इस भयंकर पतित अवस्था की तरफ खींचा है, जिसमें एक आदमी सांसद बनकर कानून की पकड़ से बचता है और कानून बनाने की हैसियत लेकर संसद में जा बैठता है।
अदालत का निर्देश है कि अपराधी घोषित होते ही आरोपी सांसद, विधायक को तुरंत इस्तीफा देना होगा और उसे अपील करने के लिए तीन माह जैसी कोई मोहलत नहीं मिलेगी।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि जो पुलिस हिरासत में या जेल में है, वह वहां से चुनाव नहीं लड़ सकता। यानी अदालत का संविधान सम्मत निर्देश है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सामान्य स्वस्थ लोक ही हिस्सा ले सकता है।
दूसरी पहल इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने की है। उसने एक याचिका के संदर्भ में यह राय जाहिर की है कि राजनीतिक दलों द्वारा जातिगत रैलियों के आयोजन पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। अदालत कहती है कि ऐसी रैलियों से समाजों के बीच दुराव और तनाव भी बढ़ता है।
उसने राजनीतिक दलों से पूछा है कि ऐसे प्रतिबंध के बारे में उनकी क्या राय है। जातियां लंबे समय से भारतीय समाज के संचालन-संवर्द्धन का आधार रही हैं।
लेकिन जैसा कि कवि अज्ञेय अपनी एक कविता में कहते हैं- बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है, वैसा ही जाति-व्यवस्था के बारे में भी है। यह व्यवस्था घिस चुकी है और अब सड़ांध फैला रही है।
जाति की राजनीति करने वाली पार्टियां भी अब महूसस कर रही हैं कि यह ऐसी सूखी हड्डी है, जिसे कितना भी चूसो, कोई रस नहीं मिलता। इसलिए अपनी जातिगत पहचान से बाहर की जातियों को भी अपने साथ जोड़ने की होड़ होने लगी है।
कई लोगों को यह भ्रम होता है कि ऐसा होने से जातियों की जकड़ टूट रही है। यह बहुत ही खतरनाक भ्रम है। यह कसरत जातियों का दलाल पैदा कर रही है, जो जातियों की पहचान को मजबूत बनाकर उसका सौदा कर रहे हैं। सामाजिक समरसता को मुद्दा बनाए बगैर सामाजिक क्रांति की रणनीति कैसे बन सकती है?
सत्ता की अंधी पिपासा ने जैसे संसद और विधानसभाओं का स्तर गिरा दिया है, वैसे ही मानवीय मन की कमजोरियों को उभार कर सत्ता की पिपासा शांत करने की कोशिश ने समाज के सारे प्रगतिशील प्रवाहों को रुद्ध कर दिया है।
राजनीतिक दलों का कोई सामाजिक संदर्भ नहीं बचा और सामाजिक मंच पर सक्रिय शक्तियां चुकती जा रही हैं। ऐसे में यदि अदालत आगे नहीं आती हैं, तो वह अपनी सांविधानिक जिम्मेदारी से चूकती हैं।
हमें अदालतों का आभारी होना चाहिए कि वे कितनी ही आंतरिक कमजोरियों के बाद भी संविधान के प्रति ईमानदार बनी हुई हैं और प्रतिगामी ताकतों के गोलबंद होने पर भी रास्ता खोजने में लगी हैं।
विधायिका का जैसा पतन हुआ है, उसे रोकने के लिए जरूरी है कि चुनाव आयोग, न्यायपालिका और मीडिया की तिकड़ी मजबूत प्रतिबद्धता के साथ आगे आए और विधायिका व कार्यपालिका को सुधारने का काम करे।