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जवाबी आक्रामकता समाधान नहीं
एवलिन एन फरकास
Updated Mon, 14 Aug 2017 11:03 AM IST
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उत्तर कोरिया
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दशकों से उत्तर कोरिया अमेरिकी 'साम्राज्यवादियों' और दक्षिण कोरिया को धमका रहा है और उसके पारंपरिक और परमाणु हथियार परियोजनाओं पर अंकुश लगाने की कोशिशों का बदला लेने की बात कर रहा है। उत्तर कोरिया के नेता अमेरिका द्वारा उसे परमाणु परियोजना से अलग करने की कोशिश के मद्देनजर जिस तरह शोर मचाते रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि छोटी नस्ल का कोई कुत्ता जर्मन नस्ल के बड़े रॉटविलर कुत्ते से परमाणु हड्डी छीनने के लिए लड़ रहा है।
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अमेरिकी सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व के मद्देनजर राष्ट्रपति ट्रंप ने उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया की बातों पर प्योंगयांग को गुस्से में ऐसा अनिर्दिष्ट हमला करने की धमकी दी है, जैसी दुनिया ने पहले कभी देखा न हो। चूंकि विश्व ने द्वितीय विश्वयुद्ध के अंत में अमेरिका द्वारा जापान पर किए गए परमाणु हमले की तबाही देखी है, इसलिए ऐसे बयान खतरनाक हैं। नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर कोरिया जो परमाणु हथियार बना रहा है, वे जापान में तबाही बरपा चुके परमाणु हथियारों की तुलना में बहुत बड़े हैं।
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दुर्भाग्य से हम राष्ट्रपति ट्रंप के शब्दों को सीधे खारिज नहीं कर सकते। उन्होंने 1999 में एनबीसी इंटरव्यू में कहा था कि दुनिया की सबसे बड़ी समस्या परमाणु प्रसार है, लेकिन फिर वह उत्तर कोरिया द्वारा परमाणु हथियार बना लेने से पहले ही उन पर सैन्य कार्रवाई करने का इरादा जताते दिखे। उन्होंने इंटरव्यू करने वाले टिम रसर्ट के उस विचार को खारिज कर दिया था कि खुद अमेरिकी सैन्य कमांडरों ने उ. कोरिया के खिलाफ ऐसी सैन्य कार्रवाई के खिलाफ चेतावनी दी है।
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इसलिए राष्ट्रपति के कैबिनेट को उत्तर कोरिया के परमाणु सुविधाओं और हथियारों को खत्म करने की मानवीय कीमत का अनुमान लगा लेना चाहिए। यह कीमत चौंकाने वाली होगी-संभवतः लाखों दक्षिण कोरियाई और हजारों अमेरिकियों की जान जाएगी। और चूंकि हमें अनुमान नहीं है कि कहां सारी परमाणु सुविधाएं, सामग्री, वैज्ञानिक और हथियार छिपाए गए हैं और फिर उत्तर कोरिया में मोबाइल ग्राउंड लांचर है, इसलिए बड़ी सैन्य कार्रवाई भी वहां सफल नहीं हो सकती।
ऐसे में बहुआयामी रणनीति ही एकमात्र उपाय है, जिसके जरिये उत्तर कोरिया की धमकियों पर अंकुश लगाया जा सकता है। उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन वर्ष 2011 के अंत में तीन प्रमुख उद्देश्यों के साथ सत्ता में आए-अपनी ताकत बढ़ाना, अपने शासन को उखाड़ फेंकने वाले अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को रोकना और क्रमिक आर्थिक सुधारों को पूरा करना, ताकि किम साम्राज्य लंबे समय तक सत्ता में बना रहे। इनमें से आखिरी बिंदु की अक्सर अनदेखी की जाती है। युवा किम की शिक्षा-दीक्षा स्विट्जरलैंड में हुई और लंबे समय से कोरिया के विश्लेषकों का कहना है कि वह उत्तर कोरियाई लोगों को आर्थिक रूप से कमतर बनाकर नहीं रख सकते और न ही दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में अपने नागरिकों की दयनीय स्थिति की अनदेखी कर सकते हैं। लेकिन उन्हें देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में समय लगेगा। उत्तर कोरिया की मिसाइल प्रक्षेपण की नई क्षमता का उद्देश्य वाशिंगटन के राजनीतिक या सैन्य हस्तक्षेप को रोकना है। ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि किम परिवार अमेरिका के खिलाफ परमाणु हथियारों का उपयोग केवल तभी कर सकता है, जब उसे लगेगा कि हमला आसन्न है। इसलिए अवरोध, दबाव, कूटनीति और प्रोत्साहन का इस्तेमाल करना और अतीत की सफलता एवं विफलता से सबक लेना सबसे अच्छी नीति है। हमें अपनी मिसाइल सुरक्षा को आगे बढ़ाना चाहिए, दक्षिण कोरियाई और जापानी सहयोगियों के साथ सैन्य अभ्यास करना चाहिए, अमेरिकी परमाणु सुरक्षा की व्यवहार्यता को रेखांकित करना चाहिए। यदि जरूरी हो, तो संयुक्त राष्ट्र के नए प्रतिबंधों को मजबूती से लागू कर, उसे लगातार सख्त बनाकर दबाव बढ़ाया जा सकता है।
उत्तर कोरियाई लोगों को कूटनीति समझानी होगी (साथ ही चीन एवं रूस की सरकारों को भी, जो प्योंगयांग की तरह सत्ता परिवर्तन का विरोध करते हैं) कि हमारा उद्देश्य किम को सत्ता से हटाना या उत्तर कोरिया को खत्म करना नहीं है, बल्कि उसके परमाणु हथियारों से उत्पन्न खतरे को दूर करना है। चीन के सहयोग से वाशिंगटन उत्तर कोरिया के समक्ष प्रथम चरण के बाजार सुधार और निजीकरण को जारी रखने की दिशा में प्रोत्साहन का प्रस्ताव दे सकता है।
जहां तक अपनी गलतियों से सीखने की बात है, तो मैंने कैपिटल हिल और वर्ष 2008 में प्योंगयांग और योंगबायन के अपने दौरे (जहां उत्तर कोरिया का बड़ा परमाणु प्रतिष्ठान है) में पाया कि 1994 में दस्तखत किए गए सहमति पत्र ने तब तक काम किया, जब तक उत्तर कोरिया ने धोखा नहीं दिया और वाशिंगटन उन्हें कूटनीति, दबाव और प्रोत्साहन के जरिये वार्ता की मेज पर लाने में विफल रहा। और प्रतिबंधों ने 2000 के प्रारंभिक दिनों तक काम किया, जब तक अमेरिका ने उन्हें बिना किसी निर्णायक सौदे के खारिज नहीं कर दिया। अमेरिका भरोसे का निर्माण कर सकता है और जिसे उत्तर कोरिया मानवीय मुद्दा कहता है, उस दिशा में आगे बढ़ सकता है-प्योंगयांग द्वारा बंधक बनाए गए अमेरिकी और जापानी बंधकों की रिहाई, उत्तर और दक्षिण कोरियाई परिवारों के पुनर्मिलन की अनुमति और कोरियाई युद्ध के अमेरिकी सैनिकों के अवशेष को स्वदेश भेजना।
न केवल उत्तर कोरियाई खतरे पर अंकुश लगाने के लिए, बल्कि वहां आर्थिक सुधार और वहां के लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप के पास रणनीति के चारों पहलुओं-अवरोध, दबाव, कूटनीति और प्रोत्साहन-को एक साथ लागू करने अवसर है। न केवल अपने सहयोगियों के साथ, बल्कि रूस एवं चीन जैसे प्रतिस्पर्धी और विरोधी देशों के साथ काम करना कुछ ऐसा है, जिसे सिर्फ एक महाशक्ति देश ही कर सकता है।
-लेखिका अमेरिकी रक्षा विभाग में उप सहायक सचिव रही हैं