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कोरोना संकट : आजकल गालिब बहुत याद आते हैं !

Fri, 03 Apr 2020 12:41 AM IST
Bhanu Bharti भानु भारती
Updated Fri, 03 Apr 2020 12:41 AM IST
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Coronavirus outbreak, Ghalib misses a lot these days
गालिब - फोटो : social media

इंसान का सबसे मजबूत पक्ष संकट काल में ही उभरकर आता है। इतिहास गवाह है कि जब भी मनुष्य के ऊपर कोई मुसीबत पड़ी है, उसने हिम्मत और जज्बे के साथ मुकाबला किया है। हर संकट हमें अपने भीतर की ऊर्जा और रचनात्मकता से जोड़ता है। जब भी हम किसी मुश्किल का सामना करते हैं, तो उससे लड़ने के लिए साहस की तलाश भी अपने भीतर ही करते हैं। कोरोना के प्रसार से उपजा संकट हमें अपने भीतर झांकने का मौका देता है। लोग घरों में बंद हैं। यह आत्मचिंतन की अवधि है, जो हमें मानवीय स्थितियों पर गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित करती है। हम किस दुनिया में रह रहे हैं? यह दुनिया क्यों ऐसी होती जा रही है? हमने क्या गलती की है? हमने ऐसा क्या किया है कि इस तरह का संकट पैदा हो रहा है? अपने कर्मों से हम यहां विनाश के बीज क्यों बो रहे हैं? इन सभी सवालों का जवाब हमें ही ढूंढना होगा।


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आज कोविड-19 का आतंक है, कुछ साल पहले स्वाइन फ्लू का था। उससे पहले सॉर्स का था। आखिर ये सभी बीमारियां कहां से आ रही हैं! वजह चाहे जो भी हो, उत्तरदायी तो हम ही हुए न, क्योंकि इस दुनिया को अपनी सुविधा के अनुसार चला तो हम ही रहे हैं। हमसे पहले की पीढ़ी ने प्लेग और चेचक जैसी महामारी झेली थी। हम कोरोना और स्वाइन फ्लू जैसी बीमारियां झेल रहे हैं। धरती पर बड़ी संख्या में मानवीय उपस्थिति के कई गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं। जनसंख्या का दवाब इतना बढ़ गया है कि किसी दूसरी प्रजाति के लिए कोई जगह ही नहीं है। हम सब एक बड़ी दिलचस्प आपाधापी में हैं।

भागदौड़ इतनी हो गई है कि हमारे पास वक्त ही नहीं है। हमें अपने पड़ोसी का नाम तक पता नहीं होता। यह कोई सुखद स्थिति नहीं है। हम मानवीयता के सरोकारों पर लंबे भाषण दे सकते हैं, लेकिन खुद मानवीय होने की कोशिश तक नहीं करते। यह वक्त ठिठककर कुछ सोचने का है। कुछ-कुछ 'खाली है अभी जाम, मैं कुछ सोच रहा हूं' की तर्ज पर। यह खुद के अंदर झांकने का भी वक्त है। इससे हमें एक समझ हासिल होगी, जो भागदौड़ की जिंदगी में मुमकिन नहीं। चलिए, अधिक दूर न जाकर मैं अपनी ही बात करता हूं। जो किताबें मैंने अपनी युवावस्था में पढ़ी थीं, उनकी बरबस याद आ रही है। उनको दोबारा से पढ़ने का खूब मन हो रहा है। गालिब भी बहुत याद आ रहे हैं।

60 के दशक में पढ़ी हुई अर्नेस्ट हेमिंग्वे की किताब द ओल्ड मैन एंड द सी को फिर से पढ़ा है। यकीन मानिए, इसे पढ़कर मुझे बहुत आत्मबल मिला है। आप भी फुरसत के इन पलों में क्लासिक्स की तरफ लौट आइए। इस बात को याद करिए कि क्या कुछ बेहतरीन पढ़ा था, जो जिंदगी के गुबार तले दबता चला गया। पुराने और बेहतरीन उपन्यासों और महाकाव्यों को अपनी अलमारी के सेल्फ से बाहर निकालिए और उनकी मधुरता में बह जाइए।

यह भी जीवन का एक सुख ही है, जो शायद दोबारा नसीब न हो। इन किताबों से हमें बड़ी ऊर्जा मिलेगी। यह वक्त है लॉन या खिड़की के किनारे बैठकर चिड़ियों को देखने का, पेड़-पौधों को निहारने का। याद करिए कि बचपन के बाद पेड़ों पर गिलहरियों को फुदकते हुए कब देखा था? - भानु भारती (मशहूर रंगकर्मी)

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