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स्वास्थ्य-आपातकाल या आपदा, डॉ. आर. कुमार से जानिए क्या खोया क्या पाया
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कोरोना वायरस
- फोटो : PTI
कोरोना महामारी और उसके कारण लगाए गए लॉकडाउन के दौरान मानवाधिकारों का उल्लंघन एक नया कायदा बन गया था, जैसे मनमाना रोकटोक, लाठीचार्ज, प्रतिबंध, भेदभाव और अस्पतालों द्वारा भर्ती करने से इन्कार, उपेक्षा और उदासीनता।
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लोगों की स्वतंत्र आवाजाही पर प्रतिबंध 'सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा' के अनुसार मानवाधिकार का उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि किसी के साथ यातना और अपमानजनक व्यवहार नहीं होगा। यदि जरूरी हो, तो प्रतिबंध वैज्ञानिक साक्ष्य के आधार पर लगाया जाना चाहिए, जो न तो मनमाना हो और न ही भेदभावकारी।
मानवीय गरिमा का सम्मान करते हुए उसे एक निर्धारित अवधि तक ही लागू किया जा सकता है। लेकिन संक्रमण रोकने के लिए नागरिकों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने कमान संभाली, तो इस तरह का संतुलन अप्रासंगिक हो गया। हमेशा की तरह इसकी मार गरीबों पर ज्यादा पड़ी। सोशल डिस्टेंसिंग के चलते गरीबों और प्रवासी श्रमिकों को मजदूरी, भोजन और पानी से वंचित होना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के उच्चायुक्त ने चेतावनी दी कि महामारी के दौरान आपातकालीन शक्तियों और लॉकडाउन का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कहा कि महामारी के संक्रमण को धीमा करने के लिए स्टे-एट-होम उपाय को मानवाधिकार की कीमत पर लागू नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह उनकी दक्षता को कम करता है। जो लोग संक्रमित हुए, उन्हें समाज से बाहर कर दिया गया और कलंकित माना गया। जेलों में एक ही सेल में कई कैदियों की नजरबंदी ने शारीरिक दूरी को असंभव बना दिया। कोविड मरीजों की देखभाल करने वाले कुछ स्वास्थ्यकर्मियों ने कलंकित होने के डर से मानसिक स्वास्थ्य कठिनाइयों का अनुभव किया।
वायरस के कारण होने वाली बीमारी का कोई ज्ञात उपचार या टीका न होने से चिकित्साकर्मी भी डर गए। इस निराशाजनक स्थिति में देश के कई हिस्सों में विषाक्त और अप्रमाणित दवाओं के इस्तेमाल की खबरें भी आईं। कुछ निजी अस्पतालों ने इसे पीड़ितों के शोषण का जरिया बना लिया। एक तरफ गैर-कोविड मरीजों के लिए सभी अस्पताल बंद हैं, दूसरी तरफ सामुदायिक स्वास्थ्य गाइड के बजाय सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों को लागू करने के लिए पुलिस को प्रभार सौंप दिया गया, जिससे स्थिति और खराब हो गई।
क्या मौजूदा अस्पतालों को विशेष कोविड अस्पताल में तब्दील करना बुद्धिमानी थी? देश भर से अस्पतालों में भर्ती मरीजों की उपेक्षा और उदासीनता की खबरें सामने आईं। सैकड़ों डॉक्टर लंबे समय तक मरीजों के संपर्क में रहने के कारण संक्रमित हुए और उन्हें दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ा।
इसका एक आसान उपाय था कि मौजूदा अस्पतालों को बिना परेशान किए फ्लू जैसी बीमारी और गंभीर मरीजों के लिए खेल के स्टेडियम में अस्थायी अस्पताल बनाए जाते। जो मरीज गंभीर नहीं थे, उन्हें क्वारंटीन करने घरेलू देखभाल के लिए घर सबसे अच्छी जगह है। रिपोर्टें बताती हैं कि 2.7 फीसदी रोगियों को ऑक्सीजन की जरूरत होती है, और पांच फीसदी रोगियों को अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता होती है।
मृत्यु दर 1.85 फीसदी होती है। वेंटिलेटर पर रखे गए 88 फीसदी मरीज जीवित नहीं रहे, जो इस कवायद की निरर्थकता को बताता है। इस स्थिति में सबसे बड़ी जरूरत सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा की थी, लेकिन स्वास्थ्यकर्मियों के बीच भी गलत सूचना व्याप्त थी। सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे को एक भयावह और क्रूर आपदा प्रबंधन के कालीन के नीचे दबा दिया गया।
ज्यादातर मरीजों के कानूनी व मानवाधिकार अधिकारों की अनदेखी की गई। कोविड से पहले ओपीडी मरीजों से भरे हुए थे, जो अब खाली हैं। उपचार नहीं होने और टीका लगवाने की सुविधा नहीं होने से टीबी, मलेरिया, हेपेटाइटिस, हैजा, डेंगू, टॉयफाइड, चेचक, निमोनिया, डायरिया, एड्स और बिना देखभाल के प्रसव से लाखों लोगों की मौत हो सकती है।
मधुमेह, उच्च रक्तचाप, न्यूरोलॉजिकल और गुर्दे की समस्या, दमा और श्वसन की बीमारी, अवसाद और चिंता, गैस और सिरदर्द, अल्सर और कई अन्य पुरानी बीमारियों में उछाल आने की आशंका है। क्या इससे स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा नहीं जाएगी?