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दोहरी चुनौतियों के बीच

Harsha Tirumurthy हर्षा तिरुमूर्ति
Updated Sat, 18 Apr 2020 03:39 AM IST
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Coronavirus Case News In Hindi : India Between dual challenges
कोरोना वायरस का प्रकोप देश में बढ़ रहा है - फोटो : PTI

भारत में कोविड-19 के मामलों का अब जिस तेजी से प्रसार हो रहा है, उससे जन स्वास्थ्य को गंभीर खतरा है। भारत में महामारी के मॉडल के कुछ अनुमानों के मुताबिक, इस साल लगभग 40 करोड़ भारतीय इससे संक्रमित हो जाएंगे। अकेला यही आंकड़ा इस आशंका को बल देता है कि भारत में कोविड-19 संक्रमितों की संख्या इस महामारी से प्रभावित दुनिया के किसी भी अन्य हिस्से से ज्यादा हो सकती है।


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कोविड-19 के प्रसार को धीमा करने और गंभीर मामलों में बढ़ोतरी को रोकने के लिए बेहतर ढंग से तैयार स्वास्थ्य प्रणाली सुनिश्चित करना इस समय दो महत्वपूर्ण प्राथमिकताएं हैं, और दोनों ही भारत के लिए बड़ी चुनौतियां हैं। राष्ट्रीय तालाबंदी नए संक्रमणों के प्रसार और 'वक्र को कम' करने के लिए एक आवश्यक उपाय है। हालांकि लॉकडाउन को लागू करने के लिए राज्य के महत्वपूर्ण संसाधनों को प्राथमिकता के अनुसार इस्तेमाल करने की जरूरत है और घनी आबादी वाले देश के कई हिस्सों में इसे लागू करना मुश्किल है।

लॉकडाउन ने कई कठिनाइयों को भी जन्म दिया है, जिसकी शुरुआत लाखों प्रवासी श्रमिकों द्वारा अपने गांव लौटने से हुई। अनेक नागरिकों की आजीविका के लिए तत्काल खतरे भी इसमें शामिल हैं। लॉकडाउन को आगे बढ़ाया गया है, जो इन कठिनाइयों को और बढ़ाएगा।

भारत की पहले से खराब स्वास्थ्य प्रणाली को देखते हुए चुनौती बहुत बड़ी है। कोरोना से जंग के लिए व्यापक स्तर पर जांच और उपचार आवश्यक हैं और दोनों मामलों में कई कमियां हैं। इबोला और एचआईवी/एड्स के संक्रमण को रोकने में दुनिया के कई देशों की सफलताओं तथा कोविड-19 के खिलाफ पूर्वी एशियाई देशों के प्रयासों से भी सबक सीखे जा सकते हैं।

जांच व्यापक रूप से सुलभ होनी चाहिए, लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक संसाधनों का दूरदर्शिता से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मसलन, उन क्षेत्रों की शिनाख्त के लिए सजग निगरानी प्रणाली स्थापित की जा सकती है, जहां कोरोना वायरस के मामले हैं और इस प्रकार जांच में वृद्धि और रोकथाम के उपाय, दोनों एक समान जरूरी हैं।

इसी तरह संक्रमित लोगों से संपर्क का पता लगाने जैसी मौजूदा रणनीतियां जारी रखनी चाहिए, लेकिन अग्रिम पंक्ति में काम करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के जरिये नए इलाकों में संक्रमण की आशंका के बारे में पता लगाने के नए तरीके का भी इस्तेमाल होना चाहिए।

कोविड-19 के उपचार की अपनी चुनौतियां हैं। आशावादी परिदृश्य के बावजूद भारत में नए मामले जिस तरह बढ़ रहे हैं, उसे देखते हुए मरीजों को अस्पतालों में भर्ती करने की जरूरत मौजूदा क्षमता से अधिक होगी। अस्पताल में उपलब्ध बिस्तरों व वेंटिलेटरों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों की खरीद को तेज करना तत्काल जरूरी है।

भारत कोविड-19 के भीषण परिणाम से बचने में कामयाब होता है या नहीं, पर इसका आर्थिक नतीजा भीषण होगा और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों तथा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली बड़ी आबादी के स्वास्थ्य पर इसके चौंकाने वाले असर होंगे। इसलिए अब तक घोषित किए गए अल्पकालिक उपायों के बजाय बड़ी और सतत नीतिगत प्रतिक्रिया की आवश्यकता है।

लॉकडाउन शुरू होने के तुरंत बाद विभिन्न राहत उपायों की जिस तरह घोषणा की गई, उसका श्रेय केंद्र समेत कई राज्य सरकारों को देना ही होगा। केंद्र सरकार ने  22.6 अरब डॉलर की एक व्यय योजना बनाई है, जिसमें तीन महीने तक 20 करोड़ लाभार्थियों को 500 रुपये का मासिक भुगतान शामिल है, साथ ही उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को तीन महीने तक मुफ्त एलपीजी और राशन देने का प्रावधान है। अब रिजर्व बैंक ने भी फिर एक बार राहत की घोषणा की है। हालांकि दी जा रही नकद हस्तांतरण की राशि से अनेक लाभार्थियों और उनके परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक असर की भरपाई होने की संभावना नहीं है।

अगर कोविड-19 का आर्थिक प्रभाव जीडीपी पर दीर्घकालिक असर डालता है, तो तीन महीने लंबी यह प्रोत्साहन राशि पर्याप्त नहीं है। रिजर्व बैंक ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अपने पूर्वानुमानों को पहले ही काफी बदल दिया है, जो लॉकडाउन के प्रभावों और वैश्विक आर्थिक मंदी को ध्यान में रखते हुए आने वाले वर्ष में अपरिहार्य लगता है। यदि इस वर्ष के लिए 1.9 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि के अनुमान सटीक साबित होते हैं, तो भारत में गरीबी, स्वास्थ्य और कल्याण के क्षेत्र में भीषण नतीजे होंगे, जो कोविड-19 के प्रत्यक्ष स्वास्थ्य प्रभावों से कहीं अधिक हैं।

आगामी आर्थिक संकट से निपटने के लिए कई अतिरिक्त नीतिगत कार्रवाई की आवश्यकता है। लोगों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने के लिए व्यापक और दीर्घकालिक प्रोत्साहन की आवश्यकता है। छोटे उद्यमों को मदद देने के साथ नकद हस्तांतरण के आकार और अवधि को बढ़ाने और योग्य लाभार्थियों को जरूरी वस्तुएं उच्च सब्सिडी पर उपलब्ध कराने के कदम उठाने चाहिए।

इसके बाद जब कोरोना वायरस के संक्रमण का खतरा कम हो जाए या जिन क्षेत्रों में शारीरिक दूरी कम जरूरी हो, वहां मनरेगा जैसे कार्यक्रमों का विस्तार किया जा सकता  है।  भारत में कोविड-19 के बड़े प्रभावों से निपटने के लिए अकेले आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं होगी। अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ने के दौर में पोषक आहार प्रदान करने के लिए बड़े पैमाने पर कार्यक्रम चलाए गए, फिर भी भारत में कुपोषण दर दुनिया में सबसे अधिक है।

कोविड-19 के चलते आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं के वितरण में व्यवधान, स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ और आर्थिक सुस्ती से कुपोषण दर पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। दुनिया भर में कोरोना के खिलाफ जंग जारी है और सभी देश स्वास्थ्य एवं आर्थिक कल्याण से संबंधित जोखिमों का सामना कर रहे हैं। भारत के आकार, जनसंख्या घनत्व के साथ-साथ स्वास्थ्य एवं आर्थिक संकेतकों के कारण भारत के लिए यह जोखिम बहुत बड़ा है। इसलिए यह एक बड़ी और दीर्घकालीन खर्च योजना तैयार करने तथा स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार करने का वक्त है। (लेखक अर्थशास्त्री और यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया में स्वास्थ्य नीति के प्रोफेसर हैं।)

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