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भौतिक विज्ञान के साथ ज्ञान-दर्शन का समन्वय, कोरोना काल में भारत ने दुनिया को प्रभावित किया

Sun, 25 Oct 2020 07:16 AM IST
अनिल प्रकाश जोशी अनिल प्रकाश जोशी
अनिल प्रकाश जोशी Published by: अनिल प्रकाश जोशी Updated Sun, 25 Oct 2020 07:16 AM IST
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Coordination of philosophy of knowledge with physics, India influenced the world in the Corona period
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

भारत को दुनिया में कभी विश्व गुरु का दर्जा प्राप्त था, जिसके पीछे इस देश के ज्ञान-विज्ञान का महत्व था। इसी ने विश्व को आध्यात्मिक जीवन व विज्ञान के गुर सिखाए। लेकिन आज इस देश ने व्यापक तौर पर अपनी यह पहचान खोई है। हमने पश्चिमी सभ्यता को विकास का मूल मंत्र माना और यही कारण है कि आज हमारे भोजन, वेश-भूषा, यहां तक कि विज्ञान में भी पश्चिम की झलक दिखाई देती है। पाश्चात्य विज्ञान हमें भोगवादी सभ्यता की तरफ ले जाता है, जबकि भारतीय ज्ञान शाश्वत प्रगति का रास्ता दिखाता है।


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कोरोना काल में भारत के भोजन व जीवन शैली ने दुनिया को प्रभावित किया है। हमने अपने जिस आयुर्वेद और चरक विज्ञान को उपेक्षित किया, वे आज दुनिया में चर्चा का विषय हैं। जैसी कि प्रवृत्ति है, अब पश्चिम का ठप्पा लगने के बाद ही हम अपने विज्ञान व कौशल को नए सिरे से देखने की कोशिश करते हैं। पर तब तक हमारा मूल मंत्र पश्चिम वालों का हो जाता है।


अपने ज्ञान-विज्ञान के प्रति आत्मविश्वास की कमी हमें डुबो रही है। आज वैश्विक स्तर पर हम कई बड़े कदम उठा चुके हैं, चाहे वह आर्थिक शक्ति का मामला हो या अपने अध्यात्म से उत्पन्न योग विज्ञान। इनसे दुनिया नए सिरे से हमारा लोहा मान रही है। इन सबके बावजूद भोगवादी बनाते पश्चिमी विज्ञान से हमारा पीछा नहीं छूट रहा। इनसे दो ही प्रवृत्तियों को बल मिलता है, एक बटोरने की प्रवृत्ति, दूसरी आत्मकेंद्रित हो जाने की प्रवृत्ति।  यही कारण है कि पिछले तीन सौ साल से, चाहे वह औद्योगिक क्रांति रही हो या भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाने की ललक, हमने विज्ञान की दिशा उसी तरफ तय की, जिससे भौतिक सुख प्राथमिकता बने और बटोरना उसका माध्यम। इसके दुष्परिणाम प्रकृति को ही झेलने पड़े हैं। इस तरह के विकास के साथ लूटपाट और अराजकता भी स्थान बना लेती है। फिर इससे वैभव और सुरक्षा के नाम पर सैन्य व हथियारी शक्तियों की खोज के लिए हम विज्ञान को झोंक देते हैं, जिससे अंततः विनाश ही पल्ले पड़ता है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अपने देश की परंपरा और ज्ञान-विज्ञान शुरुआती दौर से सातत्य, समरसता और समानता के पक्ष में रहा है और इसने प्रकृति के उस नियम का पालन व अनुसरण किया है, जिसके अनुसार जो लेना है, उसे देना भी है। आज के विज्ञान से जोड़ने के बजाय दोहन की प्रवृत्ति बढ़ी है। अपने देश का विज्ञान  उन तमाम परिस्थितियों के बीच जन्मा है, जिनमें कई तरह की विविधता रही। यहां विभिन्न जलवायु, संस्कृति व सांस्कृतिक विविधताओं ने अपनी-अपनी परिस्थितियों में उसी तरह की जीवन शैली व तकनीक को जन्म दिया। यहां विभिन्न तरह के भौगौलिक स्थितियां व प्राकृतिक संसाधनों में रहते हुए उसी के अनुरूप स्थानीय विज्ञान व तकनीकी का अविष्कार हुआ।

आज रख-रखाव, खान-पान और वेशभूषा के साथ पाश्चात्य प्रवृति का भी शिक्षा पर बहुत बड़ा असर पड़ा है। वर्तमान शिक्षा शैली ने पिछले 200 वर्षों से हमें भारतीय परंपराओं से भी काफी हद तक विमुख कर दिया। आज के परिपेक्ष्य में यह तब ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, जब एक तरफ हम अपनी नदियों, कुओं और तालाबों को खोते जा रहे हैं और मिट्टी जहरीली बन चुकी है, तो दूसरी तरफ हम भौतिक विकास की दौड़ में नए आयामों को छूने के लिए तत्पर दिखते हैं। इसी का दुष्परिणाम है कि आज इस सभ्यता ने एक अलग तरह का भटकाव पैदा कर दिया है और असमानता को जन्म दिया है। जब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसे संकट देश-दुनिया के सामने हों, ऐसे में, भारत का विज्ञान फिर नए सिरे से देश-दुनिया का नेतृत्व कर सकता है। हमारे शोध की दिशा नए खोजों के प्रति ज्यादा आतुरता रखती है, न कि उस अविष्कार के प्रति, जो पहले से ही हम सबके बीच में विद्यमान रही और जिसने इस देश को विश्व गुरु का दर्जा दिया था।

अब भी समय है कि हम भारतीय ज्ञान को समझें और अपनी शिक्षा में इसका समन्वय बनाते हुए यह भी बताने की कोशिश करें कि आखिर क्यों हम दुनिया में सर्वोपरि थे। यहां प्रकृति, मनुष्य और अन्य जीव एक पारस्परिक समझौते में जीते रहे। आज इस ज्ञान का महत्व दुनिया के लिए आवश्यक बन चुका है। नए विज्ञान के साथ यह भी आवश्यक हो जाता कि हम एक रणनीति के तहत कार्य करें कि वैज्ञानिक भौतिकता के साथ भारत ज्ञान दर्शन का भी हिस्सा बन सके, अपने वेद-विज्ञान को किस तरह से लोगों के बीच नए सिरे से रखें और मंथन के लिए प्रेरित कर सकें। हम ऐसे विकल्पों पर भी काम करें, जो प्रकृति के साथ समन्वय कर सकें।

देश में पहली बार शिक्षा मंत्रालय ने ऐतिहासिक पहल करते हुए मंत्रालय में एक भारतीय ज्ञान प्रकोष्ठ की स्थापना की है, और जिसका नेतृत्व करने की स्वयं शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने कमर कसी है। इसमें देश के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार और अन्य जाने-माने वैज्ञानिक, प्रबंधकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जोड़ा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय ज्ञान के वैज्ञानिक पहलुओं का अध्ययन कर उनकी प्रामाणिकता जुटानी है। एक हाई पावर कमेटी का गठन कर मंत्रालय ने पहली बार भारतीय परंपराओं के प्रति गंभीरता दिखाई है। शायद यही समय है, जब हम अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन अपने भारतीय ज्ञान से करें, ताकि एक बार फिर शीर्ष की तरफ अग्रसर हों सकें।

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