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बिना सोचे-समझे क्रोध करना अधर्म

Mon, 04 Nov 2013 05:45 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Mon, 04 Nov 2013 05:45 PM IST
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Control on anger

उत्तंक मुनि वन में रहकर एकांत साधना में लीन रहते थे। कौरव-पांडव, दोनों के प्रति वे वात्सल्य भावना रखते थे। वह प्रायः कहते थे कि प्रेम, करुणा और लोभ रहित व्यवहार से सभी का मन जीता जा सकता है।

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एक दिन मुनि की भेंट भगवान श्रीकृष्ण से हुई। श्रीकृष्ण ने मुनि को प्रणाम किया, मुनि ने भी श्रीकृष्ण को मन ही मन नमन किया। बातचीत के दौरान मुनि ने पूछा, केशव, कौरव-पांडव सकुशल तो हैं?
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श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया, दुर्योधन के दुराग्रह के कारण हाल ही में महाभारत युद्ध हुआ, जिसमें सभी कौरव मारे गए। मुनि ने यह सुना, तो हतप्रभ रह गए। उन्होंने क्रोध में भरकर कहा, कृष्ण, तुम्हारे रहते यह घोर अधर्म कैसे हो गया? निश्चय ही तुमने पांडवों से मिलकर छलपूर्वक कौरवों का विनाश किया होगा। मैं तुम्हें शाप दे सकता हूं।
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श्रीकृष्ण ने कहा, मुनिवर, शाप देने में जल्दबाजी करके आप अपनी तपस्या के पुण्यों को नष्ट न करें। पहले कौरवों के अन्यायपूर्ण कृत्यों को जान लें। श्रीकृष्ण ने उन्हें पूरी बात बताई कि कैसे अंत तक समझौते का प्रयास किया गया था, लेकिन दुर्योधन के अहंकार व दुष्प्रवृत्ति के कारण ऐसा संभव न हो सका। मुनि उतंक दुर्योधन के दुर्गुणों से परिचित थे। तमाम बातें सुनकर वह शांत हो गए और बोले, भगवान, बिना सोचे-समझे क्रोध करना भी अधर्म है। मुझे क्षणिक क्रोध के पाप से क्षमा करें।
श्रीकृष्ण ने उन्हें प्रणाम किया और लौट गए।

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