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नजरिया: भोजन का इतिहास बताता एक वैज्ञानिक, विलक्षण अनुसंधानकर्ता थे डॉ अचाया

Sun, 08 Oct 2023 07:22 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 08 Oct 2023 07:22 AM IST
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सार
डॉ. के.टी. अचाया एक विलक्षण खाद्य वैज्ञानिक थे। भारतीय भोजन के क्षेत्र में उनका वही योगदान है, जो महान सलीम अली का पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में रहा।
 
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contribution of scientist KT Achaya in the field of Indian food
KT Achaya - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

मेरे पहले संपादक रुकुन आडवाणी ने खुद को एक बार ‘भारतीय और आंग्ल-यूरोपीय का मिश्रण’ बताया था, जो खुद के भीतर इन अलग-अलग सांस्कृतिक प्रभावों को समेटने की कोशिश कर रहे थे, जिन्हें अंध राष्ट्रवादी विरोधाभाषों के तौर पर देख सकते थे। मुझे लगता है कि यह चीज मुझ पर लागू होती है। मेरे भीतर छिपी एक आंग्ल-यूरोपीय पहचान यह हो सकती है कि स्वदेशी जागरण मंच के सदस्यों के विपरीत मेरे पास सिर्फ चाचा-चाची, माता-पिता और दादा-दादी ही नहीं थे, गॉडफादर भी थे। यही वह शख्स हैं, जिनके बारे में यहां लिखना चाहता हूं, क्योंकि, उनकी जन्म शताब्दी भी इसी हफ्ते है और मेरा गॉडफादर होना तो उनकी विराट पहचान का एक अदना-सा बिंदु है।


केटी अचाया का जन्म 6 अक्तूबर, 1923 को हुआ था और उनके पिता कोल्लेगल में भारत सरकार द्वारा संचालित एक रेशम फर्म का संचालन करते थे। अचाया ने अपने जन्म स्थान के नाम को अपने पहले नाम के तौर पर अपनाया। लेकिन उन्हें हमेशा उनके मध्य नाम ‘थम्मू’ से जाना गया। वह मेरे पिता के सबसे पुराने मित्रों में से थे। इस तरह से मैं उनका ‘गॉडसन’ (धर्मपुत्र) हो गया। वह दोनों पहली बार मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज के विद्यार्थी के तौर पर मिले, जहां उन दोनों ने रसायन विज्ञान का अध्ययन किया। अपने साथ को बरकरार रखते हुए दोनों एमएससी की पढ़ाई के लिए भारतीय विज्ञान संस्थान चले गए। वहां प्रयोगशाला से जब भी मोहलत मिलती, दोनों मैसूर के गांवों में साइकिल चलाते हुए दिखते थे। मेरे पिता भारतीय विज्ञान संस्थान में पीएच.डी के लिए रुक गए, जबकि थम्मू अचाया ने लिवरपूल में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। जब वह भारत लौटे, तब उनकी दोस्ती फिर से शुरू हुई, जो फिर तब थमी, जब 2002 में थम्मू की मृत्यु हुई।


थम्मू एक खाद्य वैज्ञानिक होने के साथ तिलहन के विशेषज्ञ थे। उनकी और मेरे पिता की पृष्ठभूमि विज्ञान थी, और दोनों ने कॉलेज में बड़े सुखद दिन बिताए, लेकिन दोनों की शख्सियत बिल्कुल अलग थी। थम्मू आजीवन कुंवारे रहे, जबकि मेरे पिता ने खुशहाल शादीशुदा जीवन बिताया, जो करीब साठ साल चला। मेरे पिता ने पीएच.डी. के बाद के सभी शोध देहरादून में वन्य अनुसंधान संस्थान से किए, जबकि थम्मू ने लिवरपूल से आने के बाद हैदराबाद, बॉम्बे, मैसूर और हैदराबाद में बतौर वैज्ञानिक नौकरियां कीं। थम्मू की, मेरे पिता के विपरीत शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि थी। वह जैज और ब्लूज संगीत में भी रुचि रखते थे। मेरे पिता को भाषा से प्रेम था, साहित्य से नहीं। यही वजह थी कि देहरादून में हमारे घर में ज्यादातर किताबें शब्दकोश थीं। थम्मू कहानियों की कुछ किताबें और कुछ कविताएं भी पढ़ते थे। चूंकि मैं गुहा का बेटा था, वह मुझसे प्यार करते थे। लेकिन गुहा के विपरीत मैं संगीत को भी पसंद करता था, इसलिए वह मुझे ज्यादा दुलार करते थे।

लेकिन मैं उन्हें ज्यादा बेहतर ढंग से तब समझ पाया, जब मैं अपनी उम्र के तीसरे दशक में था, और, जब वह और मेरे माता-पिता स्थायी रूप से बंगलूरू आ गए। 1980 और 90 के दशक में, अक्सर मैं उनके इंदिरा नगर वाले अपार्टमेंट में उनसे मिलने जाता था, जहां वे अपनी किताबों, रिकॉर्ड्स और बिल्लियों के साथ रहते थे। उनका गॉडसन होने के नाते, मुझे लगता है कि वह अपने समय, भौतिक चीजों और उत्साह दिखाने को लेकर काफी उदारता बरतते थे। उन्होंने जो किताबें मुझे उपहार के तौर पर दीं, वे आज तक मेरे पास रखी हुई हैं। उनमें से एक थी एस गोपाल द्वारा लिखी गई उनके दार्शनिक पिता एस राधाकृष्णन की उत्कृष्ट जीवनी का हस्ताक्षरित पहला संस्करण।

जब मैंने पहली बार प्रेस में आक्रामक लेख लिखने शुरू किए, तो मेरे मध्यवर्गीय, अराजनीतिक माता-पिता चिंतित हुए, लेकिन, थम्मू ने मुझे यह कहते हुए शांत किया कि, ‘निडर रहो’। थम्मू के व्यक्तित्व में भारतीय और पश्चिमी संस्कृति, रुकुन आडवाणी या मुझसे कहीं उच्च स्तर पर सहजता से संयोजित थी। उन्हें स्वाद की बेहतरीन समझ थी। उन्होंने खाना पकाने का जुनून विकसित किया। वह भारत और दुनिया के तमाम हिस्सों में रहे और विभिन्न व्यंजनों के साथ उन्होंने तमाम प्रयोग किए। इससे उनकी रुचि भोजन के इतिहास से जुड़े विषयों में हुई, मसलन, उपमहाद्वीप में मिर्च कैसे आई, इडली की उत्पत्ति कैसे हुई या फिर, मुगल सम्राट भी आखिर क्यों गंगाजल पीना पसंद करते थे इत्यादि। वर्ष 1988 में एक बार जब मैं उनके फ्लैट में बैठा था, तब उन्होंने जेरॉक्स का एक पुलिंदा निकाला, यह 18 लेखों की एक सीरीज थी, जो उन्होंने भारतीय भोजन के इतिहास पर लिखी थी।

इसे एक उत्कृष्ट, लेकिन दुखद रूप से भुला दिए गए पत्रकार सुरेंद्र झा द्वारा संपादित और बॉम्बे में नेहरू सेंटर द्वारा प्रकाशित किया गया था। गॉड फादर की अनुमति से मैं इस संग्रह को अपने घर ले आया और फिर निबंधों को दिलचस्प पाकर उनकी ही अनुमति से अपने मित्र ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (ओयूपी) के रुकुन आडवाणी से उसे किताब के रूप में प्रकाशित करने की संभावना पर बात की। रुकुन डॉ. अचाया से मिले और जेरॉक्स लेकर दिल्ली आ गए। जल्द ही ‘इंडियन फूड : ए हिस्टोरिकल कम्पेनियन’ नाम से पुस्तक प्रकाशित हुई। इसके बाद भारतीय भोजन पर उनकी दो अन्य पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं। वह खुद कन्नड़, तमिल, अंग्रेजी, कोडवा और हिंदी में पारंगत थे। संस्कृत, उर्दू और तेलुगु भी थोड़ी-बहुत जानते थे।

मेरे थम्मू मामा की मृत्यु 2002 में हुई, लेकिन उनकी बौद्धिक विरासत अभी जीवित है। मैंने हाल ही में नंदिता हक्सर की पुस्तक ‘द फ्लेवर्स ऑफ नेशनलिज्म : रेसिपीज फॉर लव, हेट एंड फ्रैंडशिप’ पढ़ी। उनके शोध के अनुसार प्राचीन भारतीय खाद्य बाजारों में गाय समेत कई पशुओं का मांस बिकता था। हक्सर टिप्पणी करती हैं, ‘शुक्र है भगवान का कि केटी अचाया मर चुके हैं, वरना उन्हें हिंदू चरमपंथी राष्ट्र विरोधी कहकर मार डालते।’ उनकी मृत्यु की वर्षगांठ पर एक ब्लॉग पोस्ट में दिल्ली की एक लेखिका मरियम रेशी लिखती हैं, ‘भारत में पक्षी विज्ञान के विकास के लिए जो महान काम सलीम अली ने किया, भारतीय पाककला इतिहास में वही योगदान केटी अचाया का है।’

ख्याल खाद्य इतिहासकार और लेखक विक्रम डॉक्टर कहते हैं, ‘डॉ. अचाया का काम इतना व्यापक है कि भोजन पर अगर आप कुछ लिख रहे हों, तो संदर्भों की खोज के लिए उनके लिखे को खंगालना एकदम डिफॉल्ट बात है।’ अपनी इस श्रद्धांजलि को मैं उस व्यक्ति के अपने पर ऋण के रूप में स्वीकारते हुए अंत करता हूं, जिसकी वजह से मैं थम्मू मामा से मिल सका। धार्मिक व जातिगत पूर्वाग्रहों की उपेक्षा को लेकर मैं अपने पिता का हमेशा से सम्मान करता था, लेकिन थम्मू मामा की मृत्यु के बाद ही मैं व्यक्तिगत यौन पसंद के मामले में उनके कट्टर प्रगतिवादी सोच की सराहना करने लगा। डॉ अचाया जैसे महान खाद्य इतिहासकार, ललित कला, संगीत, साहित्य और नृत्य के पारखी को अपना पूरा जीवन परिचितों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों और अपने वैज्ञानिक सहयोगियों से अपनी यौन पहचान को छिपाए हुए बिताना पड़ा।
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