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लोकतंत्र को पटरी से उतारने की साजिश
कुलदीप तलवार
Updated Fri, 08 Feb 2013 12:09 AM IST
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पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार की पांच साल की अवधि आगामी 16 मार्च को समाप्त हो रही है। कार्यवाहक सरकार के तहत मई में आम चुनाव होने हैं। सत्ताधारी पीपीपी और सबसे बड़ी पार्टी मुस्लिम लीग (एन) समय से और निष्पक्ष व शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव कराना चाहती हैं।
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दूसरी तरफ पाक सेना में शामिल कट्टरपंथी तत्व सरकार को अस्थिर करने और लोकतंत्र को पटरी से उतारने में लगे हुए हैं। कादरी के रुख के बाद अब इमरान खान के रवैये से भी शक पैदा होने लगा है। ऐसे समय में सर्वोच्च न्यायालय के भी कई ऐसे फैसले आए हैं, जिनसे सरकार मुश्किल में घिर गई है।
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कुछ समय पहले तहरीक-ए-मिनाज-उल-कुरान के मुखिया प्रो. ताहिर-उल-रहमान कादरी ने जब कनाडा से सात साल बाद लौटकर अपने हजारों समर्थकों के साथ चुनाव सुधारों के अलावा संसद और प्रांतीय विधानसभाओं को भंग करने की मांग की, तो इस्लामाबाद के होश उड़ गए।
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कादरी के तेज-तर्रार तेवर से लगा था कि पाकिस्तान में अरब जैसी जनक्रांति जैसी स्थिति बन सकती है। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। दरअसल पाकिस्तान के हालात मिस्र, लीबिया या सीरिया से अलग हैं। इसलिए कादरी के रवैये को चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयास के तौर पर देखा गया। यह भी स्पष्ट हुआ कि उनकी मांगों के पीछे सेना के कट्टरपंथी धड़े का हाथ है।
कादरी ने सरकार में शामिल दलों के नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों के दस सरकारी प्रतिनिधिमंडल से बातचीत की थी। उन्होंने गृह मंत्री रहमान मलिक को बातचीत में शामिल न करने, राष्ट्रपति जरदारी और प्रधानमंत्री राजा परवेज मुशर्रफ के इस्तीफे के अलावा संसद और सभी प्रांतीय विधानसभाओं को भंग करने, अगले चुनाव से पहले कार्यवाहक सरकार का गठन करने, सेना और न्यायपालिका समेत संविधान के हर स्तंभ के प्रतिनिधियों को शामिल करने, चुनाव आयोग का पुनर्गठन करने जैसी सख्त मांगें रख दी थीं।
सरकारी प्रतिनिधिमंडल से लंबी बातचीत के बाद तय हुआ था कि 16 मार्च को या उससे पहले नेशनल असेंबली भंग कर दी जाएगी और कार्यवाहक प्रधानमंत्री के लिए दो निष्पक्ष नामों का प्रस्ताव किया जाएगा। लेकिन अभी इस समझौते की स्याही सूखी भी नहीं है कि इस पर मतभेद सामने आने शुरू हो गए हैं।
दरअसल आशंका यह भी है कि कादरी कार्यवाहक सरकार के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के तौर पर फौज की तरफ झुकाव रखने वाले उम्मीदवार को बढ़ावा देकर राजनीतिक संकट खड़ा कर सकते हैं। पाकिस्तान में फौजी सरकार का लंबा इतिहास है। कादरी ने 1999 में फौजी तख्तापलट का समर्थन किया था और वर्तमान आंदोलन में भी फौज की प्रशंसा की। काबिल-ए-गौर है कि वहां जिस ईशनिंदा कानून के तहत जिसे चाहे मौत की सजा सुना दी जाती है, उसे जनरल जियाउल हक ने कादरी से सलाह-मशविरे के बाद ही लागू किया था।
हालांकि कादरी के साथ इस समझौते पर सरकार के हस्ताक्षर का कोई कानूनी या सांविधानिक महत्व नहीं है। इसलिए यह सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं है। जबकि कादरी ने कहा है कि अगर समझौते पर अमल न हुआ, तो उन्हें दोबारा आंदोलन करने का हक हासिल है। कादरी और इमरान खान, दोनों अब चुनाव आयोग के पुनर्गठन की मांग पर अड़ गए हैं, जिसका समर्थन नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग पर सवाल अभी ही क्यों उठाया जा रहा है? कादरी अगर बदलाव लाना चाहते हैं, तो चुनाव लड़ें और संसद में आकर अपनी मांग को अमली जामा पहनाएं, लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं हैं। ऐसा लगता है कि कादरी और सरकार के बीच हुए समझौते पर अमल नहीं हो पाएगा। लेकिन कादरी अगर दोबारा आंदोलन शुरू करते हैं, तो इसकी भी आशंका है कि आम चुनाव निर्धारित समय पर नहीं हो पाएंगे।
वैसे भी एक बार कार्यवाहक सरकार का गठन होने के बाद नागरिक सरकार का गठन तीन साल के लिए टल सकता है। वैसे में फौज भी तख्तापलट सकती है। बहरहाल एक पड़ोसी होने के नाते भारत तो चाहेगा कि पाकिस्तान में समय पर निष्पक्ष चुनाव के जरिये एक मजबूत लोकतांत्रिक सरकार कायम हो। यही इस पूरे क्षेत्र के हित में है।