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क्या राष्ट्रपति की नसीहत मानेंगे

Thu, 22 Jan 2015 08:12 PM IST
अनुराग दीक्षित
अनुराग दीक्षित Updated Thu, 22 Jan 2015 08:12 PM IST
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Consider the advice of the President

केंद्र सरकार द्वारा एक के बाद एक लाए गए अध्यादेश समेत अन्य संसदीय मुद्दों को लेकर बीते दिनों राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने चिंता जाहिर की। उन्होंने विपक्ष और सरकार, दोनों को व्यावहारिक समाधान निकालने और बार-बार अध्यादेश लाने से बचने की नसीहत दी। वैसे अध्यादेश लाना कोई अपराध नहीं, बल्कि संसदीय प्रकिया का ही हिस्सा है। ऐसा भी नहीं कि मोदी सरकार ही सबसे ज्यादा अध्यादेश ला रही हो। जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में 208, इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 200, और मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री काल में 61 अध्यादेशों पर मुहर लगी थी। सरकार जनता पार्टी की हो या पिछली एनडीए सरकार की, कोई भी अध्यादेशों से अछूती नहीं रही। वर्ष 1952 से पिछले साल तक 637 अध्यादेश लाए गए हैं। यानी औसतन ग्यारह अध्यादेश हर साल!

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फिर इस बार इतना बवाल क्यों? आखिर क्यों विपक्ष मौजूदा सरकार को ‘अध्यादेश वाली सरकार’ करार दे रहा है? अध्यादेश लाने की टाइमिंग समेत इसके कई कारण हो सकते हैं। विरोध की बड़ी वजह भूमि अधिग्रहण अध्यादेश है, जहां विपक्ष की कोशिश सरकार को कठघरे में खड़ा करने की है। मामला गांव, किसान, खेती बनाम शहर, विकास और उद्योग का है। ऐसे में सरकार को घेरने के लिए मुद्दों का अभाव झेल रहे विपक्ष को अध्यादेश के बहाने ही सही, विरोध का मौका तो मिल ही गया है।
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वैसे अध्यादेश लाना शायद ही किसी सरकार की प्राथमिकता हो। सदन में बहुमत का न होना इसकी बड़ी वजह रहा है। मोदी सरकार लोकसभा में भले पूर्ण बहुमत के साथ हो, पर 245 सदस्यों वाली राज्यसभा में भाजपा के केवल 45 सांसद हैं। राज्यवार होने वाले विधानसभा चुनावों और उनमें भाजपा की संभावनाओं से जुड़े चुनावी गणित को समझें, तो अगले लगभग दो वर्षों तक उच्च सदन में सरकार को राहत मिलती नहीं दिखती। ऐसे में विवादित या महत्वाकांक्षी विधेयकों पर राज्यसभा में तकरार तय है। तो क्या संसद का संयुक्त सत्र इस समस्या का समाधान है? राष्ट्रपति के मुताबिक, लंबित विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद का संयुक्त सत्र बुलाने का विकल्प भी अव्यावहारिक है। संयुक्त सत्र की नौबत तभी आती है, जब सरकार अपने किसी महत्वपूर्ण विधेयक को पारित न करा पा रही हो। पर भारतीय संसदीय व्यवस्था में संयुक्त सत्र को अव्यावहारिक ही माना गया है। तभी पिछले 62 वर्षों में केवल तीन बार ही दोनों सदनों के माननीय संयुक्त सत्र के लिए एक साथ बैठे हैं।
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साफ है कि लंबित विधेयकों की समस्या का समाधान न तो अध्यादेश हैं, न ही संयुक्त सत्र। राष्ट्रपति ने कहा है कि 'शोर-शराबा करने वाले अल्पमत को बहुमत की आवाज को दबाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वह पहले भी संसद की स्थिति पर चिंता जाहिर कर चुके हैं। पर हमें 15वीं लोकसभा याद है, जहां रिकॉर्ड व्यवधान देखने को मिला, और मौजूदा संसद का बीता सत्र भी याद है, जब राज्यसभा में हर छोटे-बड़े मुद्दे पर गतिरोध दिखता रहा।


संसदीय व्यवस्था में संवाद और सहमति सर्वोच्च हैं। संवाद स्थापित करना सरकार की जिम्मेदारी है, तो प्रतिपक्ष को भी हठधर्मिता छोड़नी होगी। इसके बावजूद यह मानना चमत्कार से कम नहीं होगा कि 23 फरवरी से शुरू हो रहे बजट सत्र में सत्ता और प्रतिपक्ष के रवैये में, खासकर राज्यसभा में, परिपक्वता दिखेगी।

-लेखक लोकसभा टीवी में एंकर हैं

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