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सर्वानुमति का संघ दर्शन

Thu, 20 Sep 2018 06:51 PM IST
tarun veejay तरुण विजय
Updated Thu, 20 Sep 2018 06:51 PM IST
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Consensus philosphy of RSS
तरुण विजय

दिल्ली के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक को सुनने के लिए तीन दिन लगातार देश के शिखर बुद्धिजीवी, राजनयिक, कलाधर्मी और विभिन्न पंथों के शिरोमणि संत आए हों और हर दिन पिछले दिन से अधिक भीड़ रही हो। देश के करोड़ों लोगों ने विभिन्न चैनलों पर भी उनको सुना और जाना कि वास्तव में संघ किस मूल्य बोध में विश्वास करता है और भविष्य के भारत के बारे में उसकी क्या दृष्टि है।


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संघ के विरोधी संगठन, दल और पत्रकार अक्सर लिखते हैं कि संघ मुस्लिम विरोधी है, महिला विरोधी है, देश को अतीतजीवी विचारधारा के आधार पर पिछड़ेपन के अंधेरे में धकेलना चाहता है, उसकी न कोई शिक्षा नीति है, न कोई अर्थनीति। वह केवल उद्वेग और विचारहीन आवेश के बल पर एकत्र उस भीड़ का नाम है, जो स्वतंत्र अभिव्यक्ति का गला घोंटना चाहता है। पर मोहन भागवत ने कठोरतम प्रश्नों को सरल भाव से स्वीकार करते हुए तीसरे दिन वैचारिक दिग्विजय का वातावरण बना दिया, जिसमें मुख्य स्वर था सर्वानुमति, अर्थात सबकी सहमति भारत के स्वभाव का मूल अंग है और संघ भी उसी को मानता है। वह अपने विचार किसी पर थोपना नहीं चाहता। जिसका जो विचार है, वह अपने विचार और पद्धति से भारत के हित में कार्य करता रहे, भले ही वे हमारे विरोध में हों, तो भी हम उसका साथ देंगे। संघ का कोई शत्रु नहीं। संघ किसी को अपना शत्रु नहीं मानता।

संघ राजनीति में नहीं है, पर राष्ट्रहित के प्रश्न पर डंके की चोट पर बोलेगा ही, जैसे घुसपैठ का प्रश्न। छल-कपट, लालच हम कभी स्वीकार नहीं कर सकते। राम जन्मभूमि पर मंदिर बनना ही चाहिए और जितनी जल्दी बने, जिस विधि और मार्ग से बने, उसका हम समर्थन करते हैं।
 
संघ को न जानने वाले विरोधियों को लगता था कि समलैंगिकता जैसे मुद्दे पर संघ कहेगा कि यह पाप है, अपराध है और ऐसे लोगों का समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। लेकिन सर संघचालक ने कहा कि ऐसा विषय हमारे समाज में पहले भी रहा है और किसी का रुझान भिन्न है, तो केवल उस कारण से उसे समाज से बाहर करना उचित नहीं है। इस विषय पर और इस समुदाय की ओर सहृदयता से ही विचार करना चाहिए।

सबसे बड़ी बात यह कि मोहन भागवत ने हिंदुत्व को सतत चलने वाले सनातन मूल्यबोध की ऐसी प्रक्रिया बताया, जो स्वयं को हर काल, परिस्थिति के अनुरूप ढालने में सक्षम होती है। यही कारण है कि वर्तमान विश्व में जब सब तीसरी वैकल्पिक व्यवस्था की खोज में हैं, तब हमारी अटल श्रद्धा यह है कि वह तीसरी वैकल्पिक व्यवस्था केवल भारतीयता का भाव ही दे सकती है, केवल भारतीय मूल्यबोध दे सकते हैं, जिन्हें हम हिंदुत्व के नाम से मानते हैं। जो हिंदुत्व शब्द को स्वीकार नहीं करना चाहते, वे उसे केवल भारतीयता ही कहें, तो भी हमें स्वीकार है।
 
अन्य मत, पंथों के साथ तालमेल बिठाने में समर्थ केवल भारतीय विचारधारा है। भागवत ने जातिभेद पर प्रहार करते हुए कहा कि संघ जाति से परे रोटी-बेटी का संबंध स्थापित करने का पक्षधर है। भागवत के व्याख्यान के इस उपक्रम को वैचारिक स्वतंत्रता का उत्सव कहा जा सकता है, जिसने भारतीयता और संविधान में अटूट्, अगाध निष्ठा व्यक्त करते हुए भविष्य के वैभव संपन भारत के निर्माण हेतु विभिन्नताओं में एकता के सूत्र को स्थापित किया। यह व्याख्यान भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक ही नहीं, राजनीतिक भाषा और व्यवहार में परिवर्तन के संकेत भी देता है।

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