फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Confidence to overcome the economic impasse

आर्थिक गतिरोध दूर होने का भरोसा

Sat, 20 Sep 2014 03:30 AM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Sat, 20 Sep 2014 03:30 AM IST
विज्ञापन
Confidence to overcome the economic impasse

नरेंद्र मोदी और उनकी टीम के साथ शी जिनपिंग का संवाद कई वजहों से बेहद महत्वपू्र्ण है। 1954 के बाद, जब भारत-चीन दोस्ती अपने चरम पर थी और चाउ एनलाई का यहां भव्य स्वागत हुआ था, यह पहला मौका है, जब किसी शीर्ष चीनी नेता का भारत में सार्वजनिक स्वागत किया गया है। संशयवादी इसकी याद दिला सकते हैं कि सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित वह सौजन्यता 1962 में किस तरह चीनी धोखे में तब्दील हुई थी। लेकिन उसके जवाब में उतना ही मजबूत तर्क दिया जा सकता है कि यह 2014 है, 1962 नहीं, जब माओ के नेतृत्व में चीन राजनीतिक रूप से शक्तिशाली अपने कम्युनिस्ट सहयोगी तत्कालीन सोवियत संघ की उपेक्षा से खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा था, क्योंकि उसके प्रधानमंत्री निकिता ख्रुश्चेव ने हथियारों के नियंत्रण के मुद्दे पर अमेरिका के साथ खुली बातचीत शुरू कर दी थी। जबकि माओ उस समय चीनी परमाणु बम बनाने की जद्दोजहद में लगे हुए थे। तब बेहद शक्तिशाली ख्रुश्चेव ने पश्चिम एशिया में उभर रहे संकटों से निपटने के क्रम में विभिन्न वैश्विक मंचों पर नेहरू को अपने साथ लेना शुरू कर दिया था। बहुतेरे लोगों को मानना है कि ख्रुश्चेव को संदेश देने के लिए, जिसके साथ कुछ हद तक माओ का तालमेल नहीं बैठ रहा था, चीन ने नेहरू की प्रतिष्ठा ध्वस्त करने का फैसला किया था।

विज्ञापन


लेकिन तब के विपरीत आज चीन सफल है और विश्व-व्यवस्था में अपनी स्थिति को लेकर आश्वस्त है। किसी के सामने खुद को साबित करने के लिए उसे नकारात्मक रवैया अपनाने की जरूरत नहीं। 21वीं सदी के मुख्य भू-राजनीतिक मंच एशिया प्रशांत क्षेत्र में घोषित अमेरिकी नीति को नियंत्रित करने के लिए चीन भारत के साथ गहरा रिश्ता कायम करने के लिए उत्सुक है। ऐसे में जिनपिंग का यह कहना आश्चर्यजनक नहीं कि भारत के साथ चीन 'शीघ्र ही' सीमा विवाद हल करने को इच्छुक है।
विज्ञापन


चीनी अपने शब्दों को लेकर काफी सतर्क होते हैं। हाल के समय में मुझे चीन का ऐसा कोई राष्ट्राध्यक्ष नजर नहीं आया, जिसने सीमा विवाद के समाधान में तेजी को लेकर ऐसी सतर्क प्रतिबद्धता व्यक्त की हो। जिनपिंग ने यह भी कहा कि जब तक सीमा विवाद का स्थायी समाधान नहीं ढूंढ लिया जाता, तब तक घुसपैठ की छिटपुट घटनाओं को असर डालने का मौका नहीं दिया जाएगा। साफ है कि भारत और चीन की सीमा पर शांति का सवाल कायम है। गौरतलब है कि 2003 में सीमा निर्धारण की प्रक्रिया पर चर्चा के लिए औपचारिक व्यवस्था बनाए जाने के बाद से शायद ही किसी की जान गई हो। जबकि इस दौरान भारत-पाकिस्तान सीमा पर 700 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है।
विज्ञापन
विज्ञापन


ऐसे में, मोदी-जिनपिंग की वार्ता के खुशनुमा माहौल के दौरान चीनी सैनिकों के सीमा पर घुसपैठ का उद्देश्य समस्या के शीघ्र समाधान की इच्छा दर्शाना रहा हो सकता है। चिकित्सा की कुछ पद्धतियों में विकृति को थोड़ा उभारा ही जाता है, ताकि उसे पूरी तरह खत्म किया जा सके। सुखद माहौल में दोनों नेताओं की मुलाकात के दौरान हुई मामूली घुसपैठ का खास मकसद तो रहा ही होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के पिछले हफ्ते दिए गए एक बयान से इसे समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने भारत और चीन के रिश्तों में दिशा में कुछ बदलाव लाने की बात कही थी।

चीनी राष्ट्रपति के इस दौरे का एक उद्देश्य भारत के आधारभूत क्षेत्र, औद्योगिक पार्क और स्मार्ट सिटी में भारी निवेश करना भी है। चीन ने भारत में निवेश के क्षेत्रों को सावधानीपूर्वक चिह्नित किया है। भारत-चीनी आर्थिक संवाद में एक बुनियादी समस्या यह है कि दोनों देशों के बीच व्यापार 2001 में जहां ढाई अरब डॉलर से भी कम था, वह बढ़कर 2011 में 73 अरब डॉलर जरूर हो गया, मगर दोनों का कुल निवेश डेढ़ अरब डॉलर से भी कम पर ठिठका हुआ है। जब चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, तब दोतरफा विदेशी निवेश का स्तर इतना कम रहना अविश्वसनीय है। व्यापार और निवेश के बीच इतना फर्क असामान्य है। यह दोनों सरकारों और व्यापारिक समुदायों के बीच भरोसे की कमी को भी रेखांकित करता है। खुद भारत दूरसंचार, बंदरगाहों, जहाजरानी आदि क्षेत्रों में सुरक्षा का तर्क देकर चीनी निवेश रोक रहा है। जबकि दोतरफा निवेश को गति देने के लिए आपसी संदेहों को कम से कम करना आवश्यक है।

भारत की यह पुरानी शिकायत है कि चीन गैर शुल्क बाधाओं के जरिये फार्मास्यूटिकल्स और कृषि उत्पादों के प्रतिस्पर्धी निर्यातों पर अंकुश लगाता है। बीजिंग ने इस शिकायत को दूर करने का भी वायदा किया है। भारतीय जेनेरिक दवाओं को अपने बाजार में प्रवेश करने देने में चीन वर्षों लगा देता है। भारत ने जिन सत्तरह कृषि उत्पादों को चीन में बेचने की इच्छा जताई, अब तक चीन ने उनमें से केवल तीन को ही मंजूरी दी है। मोदी और जिनपिंग ने जिन समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, वे इनमें से कई गतिरोध की गांठ खुलने का भरोसा दिलाते हैं। चीनी बैंकों ने भी व्यापक आधारभूत परियोजनाओं के लिए सस्ता कर्ज मुहैया कराने का वायदा किया है। यह इसलिए स्वागतयोग्य है, क्योंकि पश्चिमी पूंजी न सिर्फ महंगी है, बल्कि आने वाले दिनों में वह सुलभ भी नहीं रहेगी।


अमेरिका, जाहिर है, इन समझौतों को ईर्ष्या के भाव से देखेगा। प्रतिस्पर्धी कूटनीति में लाजिमी तो यही है कि मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान भारत अमेरिका के साथ भी इसी तरह के समझौते करे। रणनीतिक बहुआयामी संबंध इसी को कहते हैं, जिसमें आप सबके साथ एक जैसे रिश्ते में बंधे होते हैं, किसी एक के साथ खास रिश्ते में नहीं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed