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हथियार फैक्टरियों की दशा, आर विक्रम सिंह से जानिए हम क्यों नहीं बना पा रहे बेहतर उपकरण
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : ANI
सीमाओं पर हमारा मोर्चा चीन-पाकिस्तान से लगा हुआ है। राष्ट्रीय संकट के इस दौर में यदि देश की ऑर्डनेंस (आयुध निर्माण) फैक्टरियों की यूनियनों द्वारा हड़ताल और कामबंदी की घोषणा होती है, तो यह बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होगी। हमारे देश में कुल 41 फैक्टरियां हैं, जो रक्षा उत्पादन का सामान बनाती हैं।
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अभी कुछ समय पूर्व ही सेना ने अवगत कराया है कि ऑर्डनेंस फैक्टरियों में बने बहुत से गोला-बारूद निम्न स्तरीय हैं, जिनसे दुर्घटनाएं हो रही हैं। सैनिक मारे जा रहे हैं। ऐसे में, सेना को दूषित सीरीज के एम्युनिशन और लैंड माइन्स बर्बाद करने पड़ रहे हैं। यह क्रम आज से नहीं, बल्कि बहुत समय से चल रहा है। जबकि आयातित गोला-बारूद में फिलहाल ऐसी शिकायतें नहीं देखी गई हैं। जाहिर है, इससे अपनी ऑर्डनेंस फैक्टरियों पर हमारा भरोसा कम होता है। इसका परिणाम यह होता है कि रक्षा क्षेत्र में आयात से जुड़े सक्रिय विदेशी दलालों को तर्क मिल जाता है।
निम्न गुणवत्ता दरअसल सैनिकों की सुरक्षा के प्रति सजगता के अभाव के कारण है। दुनिया में सभी जगह हथियारों से संबंधित नई खोजें हो रही हैं। एक करोड़ से भी कम आबादी वाला इस्राइल भारत को अरबों की रक्षा सामग्री निर्यात कर रहा है। दक्षिण कोरिया से हम तोपें खरीद रहे हैं। स्वीडन एक छोटा-सा यूरोपीय देश है, जहां से हमने चर्चित बोफोर्स तोपें खरीदी थीं। दुनिया के दूसरे देशों में उन्नत तकनीक की बेहतर तोपें, टैंक, राइफलें आदि बनाई जा रही हैं। लेकिन हमारे यहां न किसी फैक्टरी में कोई वैज्ञानिक सोच विकसित होती दिखी, न कहीं कोई नई खोज हुई, न अपने यहां कोई नया बेहतर उपकरण बनते देखा गया।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे अधिक ऑर्डनेंस फैक्टरियां भारत में थीं। लेकिन आजादी के बाद अहिंसक सरकार ने यह मान लिया था कि दुनिया में भारत का कहीं कोई शत्रु नहीं है। नतीजतन वर्ष 1951-52 तक सरकार ने सेना की संख्या एक लाख कम कर सैनिकों को उनके घर भेज दिया। चारों ओर बड़ी प्रशंसा हुई।
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को बधाइयां मिलीं। हमारे नेता रक्षा संबंधी विषयों के बारे न कुछ जानते थे, न ही कुछ जानना चाहते थे। कश्मीर युद्ध में हमारी सेना को विजय के श्रेय से हमारे ही नेतृत्व द्वारा युद्धविराम कराकर वंचित कर दिया गया था। संपूर्ण रक्षा-सैन्य क्षेत्र एक प्रकार की हीन भावना का शिकार था। राष्ट्रीय नीति निर्धारण में सेना और रणनीतिकारों की कोई भूमिका ही नहीं थी।
ऐसे ही माहौल में 1962 की पराजय हुई। रक्षा आधुनिकीकरण के लिए आवाज उठाने वाला ही कोई नहीं था। नौकरशाह ऑर्डनेंस फैक्टरियां चलाते रहे। यदि हम चाहते, तो अपने द्वितीय विश्वयुद्धकालीन शस्त्र निर्माण के इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास कर शस्त्र उत्पादन में आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि बड़ा निर्यातक देश भी बन सकते थे। लेकिन यह संभावना नीतिगत अस्पष्टता की बलि चढ़ गई। देश के सार्वजनिक क्षेत्र के साथ ऑर्डनेंस क्षेत्र भी सफेद हाथी बनता चला गया।
सेना का कहना है कि जितना गोला-बारूद वे खराब घोषित कर चुके हैं, उतने में तोपखाने की 100 नई तोपें आ गई होतीं। सेना इन समस्याओं से परेशान है। देश की सुरक्षा ब्लैकमेल हो रही है। बाध्य होकर सरकार को इन फैक्टरियों के निगमीकरण का निर्णय लेना पड़ा है। लेकिन उसका भी बड़ा व्यापक विरोध हो रहा है।
इसकी वजह यह है कि जब सरकारी सेवा के अति सुरक्षित कवच में रहने की आदत हो गई हो, तो कार्य की जवाबदेही की अपेक्षा एक बड़ी समस्या बन जाती है। इसके तहत लक्ष्य के मुताबिक काम करने की प्रवृत्ति विकसित करनी पड़ती है। हमने देखा है कि सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों में यूनियनों का इतना आतंक होता है कि इनको कार्य के लिए लक्ष्योन्मुखी बनाने का प्रयास हड़ताल को आमंत्रण देने जैसा है। इसकी भुक्तभोगी भारतीय सेना है। आपूर्ति की निम्न गुणवत्ता के कारण सेना अब अपने जवानों को मरवाने के लिए तैयार नहीं है। सेना और ऑर्डनेंस फैक्टरियों में बेहतर सामंजस्य आज के समय की आवश्यकता है।
इसके लिए सरकार को संरचनात्मक परिवर्तन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे। आज विभिन्न फैक्टरियों सहित कुल ऑर्डनेंस कर्मचारी 82,000 के आसपास हैं। इस समस्या का समाधान जबर्दस्त प्रशासनिक इच्छाशक्ति की अपेक्षा करता है। पहला कदम तो यह उठाना चाहिए कि अनुत्पादक अतिरिक्त मैनपावर का बोझ कम किया जाए।
पचास साल के ऊपर के लोगों को बैंकों के समान सेवानिवृत्ति का आकर्षक विकल्प दिया जाए। ऐसे ही 30-50 वर्ष के अतिरिक्त घोषित कर्मचारियों को आर्मी ऑर्डनेंस कोर (एओसी) के सिविलियन विंग में समायोजित कर दिया जाए। ऑर्डनेंस फैक्टरियों के प्रबंधन के लिए सेना के रिटायर्ड अधिकारियों एवं निजी क्षेत्र से प्रबंधकों को दायित्व के लिए चुना जाए। सैन्य आवश्यकताओं के अनुरूप रक्षा वैज्ञानिकों द्वारा संचालित रिसर्च एवं डेवेलपमेंट की विश्व स्तरीय इकाई स्थापित की जाए।
अगला सुझाव परंपरा से हटकर है, लेकिन यह समस्या के समाधान के लिए रामबाण साबित हो सकता है। हो सकता है कि यह राजनीतिक इच्छाशक्ति का एक बड़ा इम्तहान हो। ऑर्डनेंस फैक्टरियां अपना उत्पादन सुरक्षा सेनाओं के लिए करती हैं।
इन्हें एक सैन्य कोर का स्तर प्रदान करते हुए इन ऑर्डनेंस फैक्टरियों के प्रशासन को आर्मी ऐक्ट के अंतर्गत ले आया जाए, ताकि वे हड़ताल आदि की संस्कृति से बाहर निकलें और उनमें सैनिकों के समान दायित्वबोध विकसित होना प्रारंभ हो। आर्मी ऐक्ट के अंतर्गत आने पर हम लोग स्वयं ऑर्डनेंस फैक्टरियों के प्रशासन और कर्मचारियों के दृष्टिकोण में जमीन-आसमान का अंतर देखेंगे। तब हमारी यही ऑर्डनेंस फैक्टरियां अपने उत्पादन की गुणवत्ता व कार्य संस्कृति में इस्राइल-जापान से टक्कर लेने लगेंगी। हम सब यह देखकर आश्चर्यचकित हो जाएंगे कि व्यवस्था में एक मामूली बदलाव से कितना जबर्दस्त परिवर्तन संभव है।