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टोपी में आम आदमी

सुधीर विद्यार्थी Updated Mon, 28 Jan 2013 09:47 AM IST
common man in topi
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साधो, बहुत पहले हिंदी के साहित्यकार आम आदमी की तलाश करते रहे, पर वह उन्हें नहीं मिला। आम आदमी यह जान भी नहीं पाया कि हिंदी के कलमघिस्सू उनकी खोज में दिन-रात एक किए हुए हैं। आम आदमी खेतों-खलिहानों, पगडंडियों और गलियों-कूचों में भटकता रहा, पर वहां उनकी शिनाख्त करने हिंदी का रचनाकार नहीं पहुंचा।
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उस रोज जब ’आम आदमी’ की टोपी लगाए एक शख्स देश की राजधानी में दिखाई पड़ा, तो मेरे एक लेखक मित्र की बांछें खिल गईं। वह बोले, जिसको खोजते आंखें थक गईं और तन बुढ़ा गया, वह आज मिला। मैं इस पर कविता, कहानी या उपन्यास लिखना चाहता हूं। मैं इसे साहित्य में अमर कर दूंगा।

मैंने कहा, सिर पर टोपी धर लेने से कोई आम आदमी नहीं हो जाता। आम आदमी की पहचान करनी है, तो उसकी जिंदगी में झांको, उसका हुलिया देखो, उसके दरो-दीवार का मुआयना करो, उसके बीवी-बच्चों की आंखों में तकलीफों के उमड़ते समंदर के खारेपन को पहचानो। उसका चेहरा चुसे आम की तरह होता है। उसके तन पर बहुत मामूली कपड़े होते हैं, जिनमें जेब का आकार बहुत छोटा होता है। उसके पैर की बिवाइयां फटी होती हैं। वह सड़क पर एक किनारे बचकर चलता है। उसके ऊपर पुलिस का मामूली सिपाही अपना डंडा फटकार सकता है।

उसे तहसील का अमीन आकर धमका सकता है। वह अपनी गुजर-बसर के लिए बैंक या महाजन के पास अपनी जमीन गिरवी रखता है और आजीवन उस कर्ज की किस्तें चुकाता है। वह अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ने नहीं भेज सकता। वह शहर की चमकीली दुकानों और होटलों में घुसने से घबराता है।

उसे कुर्सी-मेज पर बैठकर खाने की तमीज नहीं होती। उसे नहीं पता कि चाउमीन, पिज्जा या बर्गर क्या होता है। वह पेट भरने के लिए चम्मच या कांटों का प्रयोग नहीं करता। उसके कपड़े डिटर्जेंट से धुले नहीं होते। वह खुशबूदार साबुन से नहीं नहाता। उसे सोने के लिए नींद की गोली की जरूरत नहीं होती।

उसे ब्लड प्रेशर या टेंशन जैसी बीमारियां नहीं होतीं। उसकी सबसे बड़ी बीमारी भूख है। वह क्रांतिकारी लफ्फाजी नहीं जानता। उसकी दुनिया का दायरा बहुत छोटा होता है। साफ कपड़ों में सफेद टोपी पहना यह शख्स आम आदमी नहीं है, यह तो राजनीतिक पार्टी बनाकर खास हो चुका है।
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