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यह सिक्का उन हजारों रुपयों से कहीं अधिक कीमती है
धर्मदत्त त्यागी
Updated Thu, 12 Mar 2015 09:30 AM IST
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महात्मा गांधी तब देश भर में भ्रमण कर चरखा संघ के लिए धन इकट्ठा कर रहे थे। वह भुवनेश्वर में किसी सभा को संबोधित करने पहुंचे। वहां उन्होंने लोगों को आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनने के लिए घरेलू और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
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भाषण के बाद श्रोताओं में से एक बूढ़ी गरीब महिला खड़ी हुई। उसके कपड़े फटे हुए थे, और वह झुककर चल रही थी। किसी तरह भीड़ से निकलती हुई वह गांधी जी के पास पहुंची। उसने अपनी साड़ी के पल्लू में बंधा एक तांबे का सिक्का निकाला, और उनके चरणों में रख दिया। गांधी जी ने सिक्का उठाया और अपने पास रख लिया।
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उस समय चरखा संघ का कोष जमनालाल बजाज संभाल रहे थे। उन्होंने गांधी जी से वह सिक्का मांगा, लेकिन गांधी जी ने उसे देने से मना कर दिया। कोई वजह समझ नहीं आ रही थी। गांधी जी को गंभीर देखकर जमनालाल ने हंसते हुए कहा, बापू मैं चरखा संघ के लिए हजारों रुपये के चेक संभालता हूं। आपको लग रहा है कि मैं इस सिक्के को संभाल नहीं पाऊंगा या आप मुझ पर यकीन नहीं कर रहे हैं?
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गांधीजी बोले, यह सिक्का उन हजारों रुपये से कहीं अधिक कीमती है। यदि किसी के पास लाखों रुपये हैं और वह हजार-दो हजार रुपये दे देता है, तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन यह सिक्का शायद उस औरत की कुल जमा-पूंजी थी। उसने अपना सारा धन दान दे दिया। कितना बड़ा बलिदान दिया है उसने! इसीलिए यह सिक्का मेरे लिए काफी मूल्यवान है।
बापू ने उस सिक्के को यह कहते हुए कई सभाओं में दिखाया कि बेशक इस सिक्के का कोई मूल्य नहीं है, लेकिन इस सिक्के को देने वाली माताजी की भावना हजारों, लाखों गुना वंदनीय है।