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गठबंधन का अर्थ है सहयोग...चिदंबरम यूं गिना रहे कांग्रेस की खूबियां
Sun, 21 Mar 2021 02:38 AM IST
पी. चिदंबरम
पी चिदंबरम
पी चिदंबरम
Published by: पी. चिदंबरम
Updated Sun, 21 Mar 2021 02:38 AM IST
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कांग्रेस
- फोटो : social media
एक समय था जब कोई विचार या विचारधारा अलग-अलग राज्यों के लोगों को, विभिन्न भाषाएं बोलने वालों को, विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोगों को, विभिन्न जातियों में पैदा होने वाले लोगों को और समाज के विभिन्न आर्थिक तबकों से ताल्लुक रखने वाले लोगों को मजबूती से जोड़ने का काम करती थी। किसी विचार या विचारधारा के आधार पर राजनीतिक दलों की स्थापना होती थी। भारत में इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही है, जिसकी स्थापना 1885 में हुई थी।
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कांग्रेस के संस्थापकों का मुख्य उद्देश्य था सरकार में पढ़े-लिखे भारतीयों की मजबूत हिस्सेदारी और एक ऐसा मंच तैयार करना जिससे उनके तथा ब्रिटिश के बीच संवाद हो सके। उस समय स्वतंत्रता हासिल करने के बारे में कोई विचार नहीं किया गया था। इसका समावेश बाद में 1919 से 1929 के दौरान किया गया।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस), हालांकि खुद को एक गैर राजनीतिक दल बताता है, एक और उदाहरण है। इसके सदस्यों को जोड़ने वाला विचार है, हिंदू राष्ट्र। शुरुआती वर्षों में इसका चाहे जो भी मतलब रहा हो, मगर आज यह पूर्वजता और अन्य लोगों से भय से ग्रस्त विचारधारा है जो कि मुस्लिमों, ईसाइयों, दलितों, प्रवासियों को निशाना बनाती है और चालाकी के साथ महिलाओं, गैर हिंदी भाषी लोगों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के साथ अपमानजनक ढंग से पेश आती है।
राज्य स्तर पर कई उदाहरण मौजूद हैं। द्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) की स्थापना क्षेत्रीय अभिमान, तमिल से प्रेम, स्वाभिमान, अंधविश्वास विरोध और जाति विरोध के आधार पर की गई थी। इससे अलग हुए धड़े अन्नाद्रमुक (अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) का जन्म जाहिरा तौर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध से हुआ।
विचारधाराओं का विकास
कोई भी विचारधारा अपरिवर्तित नहीं रहती। कांग्रेस ने, वर्षों में, आजादी हासिल करने की कसमें खाई, रूढ़िवादियों और प्रगतिशीलों दोनों तरह के लोगों को जगह दी, वामपंथ की ओर मुड़ी, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद को अपनाया, मध्य मार्ग की ओर मुड़ी, बाजारवादी अर्थव्यवस्था का समर्थन किया, कल्याणकारी विचारधारा को गले लगाया और अब वह अपनी आर्थिक और सामाजिक नीतियों को इस तरह परिभाषित करने की कोशिश कर रही है, जो दिखाएंगी कि वह भाजपा से अलग है। भाजपा निर्लज्जता के साथ और अधिक हिंदू राष्ट्रवादी तथा और अधिक पूंजीवादी बन गई है। कम्युनिस्ट पार्टियों ने बहुदलीय लोकतंत्र को स्वीकार किया है। क्षेत्रीय पार्टियों ने भी अपनी नीतियों और स्थितियों को उदार बनाया है। उदाहरण के लिए द्रमुक से अलग होने वाली अन्नाद्रमुक शुरुआत से एक आस्तिक पार्टी थी, और हाल के वर्षों में स्पष्ट तौर पर द्रमुक ने अनिश्वरवाद से किनारा किया है।
मैंने इन दलों और बदलती विचारधाराओं पर विचार किया है। प्रत्येक विचारधारा आस्थावानों को जोड़ती प्रतीत होती है और गैरआस्थावानों को बहिष्कृत करती प्रतीत होती है, जबकि उनके वोट और उनका समर्थन भी उतना ही आवश्यक है, जितना आस्थावानों का। इसलिए जरूरत सतत परिवर्तन और समायोजन की है। खुद को बहिष्कृत पाने वाले गैरआस्थावानों ने अपने राजनीतिक दल बना लिया जो कि उनकी सहानुभूतियों और उनके विद्वेष को प्रतिबिंबित करते हैं। ऐसे ही विशिष्ट विद्वेषों ने कांग्रेस (ओ), कांग्रेस (आर), जनता दल, सपा, एनसीपी, बीजू जनता दल और तेलुगू देशम को जन्म दिया। पृथक राज्य की इच्छा या और अधिक स्वायत्तता की चाहत ने टीआरएस तथा एजीपी के गठन को प्रेरित किया।
बहिष्कृत राजनीति
भारत में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा बड़ी संख्या में लोगों के समूह छूट गए या फिर उन्होंने खुद से ऐसा महसूस किया। इनमें मुस्लिम और दलित शामिल हैं। इन वर्गों को सांप्रदायिक या जातिवादी बताकर उनकी आलोचना नहीं की जा सकती। मुख्यधारा की राजनीति से जब तक ये वर्ग बहिष्कृत होते रहेंगे, ये वर्ग न्यायसंगत तरीके से अपनी खुद की पार्टियां बनाते रहेंगे। बहिष्करण, फिर वह कानूनी तौर पर हो या वास्तविक हो, मेरे दृष्टिकोण में भारतीय राजनीति और गठबंधन की चाहत को समझने की धुरी है।
मैं याद कर सकता हूं कि भाजपा ने गुजरात (2017, 182 सीट, मुस्लिम आबादी 9.65 फीसदी) या उत्तर प्रदेश (2017, 402 सीट, मुस्लिम आबादी 19.3 फीसदी) में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था। इन दो राज्यों के मुस्लिमों को क्या करना चाहिए? अन्य पार्टियों ने वास्तव में अलग दृष्टिकोण अपनाया और मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए, लेकिन अक्सर यह प्रतीकात्मक ही रहा। दलितों की बात है, तो सारे दलों ने उन्हें 'आरक्षित' क्षेत्रों में निर्वासित कर रखा है। इसका कुल नतीजा है राजनीतिक समावेशन के बजाय राजनीतिक बहिष्करण। समय के साथ, मुस्लिमों, दलितों और अन्य बहिष्कृत समूहों को अपने हितों की रक्षा और विकास के लिए अलग राजनीतिक दलों के गठन का एहसास हुआ।
आॅल इंडिया मुस्लिम लीग का गठन 1906 में हुआ था। स्वतंत्र भारत में मुस्लिमों द्वारा स्थापित अनेक पार्टियां हैं ः आईयूएमएल, एआईयूडीएफ, एआईएमआईएम और अन्य छोटी पार्टियां। इसी तरह से दलितों ने बसपा, लोजपा (बिहार में) और वीसीके (तमिलनाडु में)। आरएसएस तथा भाजपा मुस्लिमों द्वारा स्थापित पार्टियों की तीखी आलोचना करते हैं, लेकिन दलितों द्वारा स्थापित दलों से गठबंधन करते हैं; इससे अधिक स्वार्थपरकता और क्या हो सकती है। ( भाजपा ने कहा जाता है कि असम में जिला परिषद के चुनाव में एआईयूडीएफ से गठबंधन किया था।)
शासन के लिए बेहतर
कई विशेष दलों को देखें, तो गठबंधन ने अधिक समावेशी राजनीति का रास्ता दिखाया है। मौजूदा चुनावों में मुस्लिमों और दलितों द्वारा स्थापित पार्टियों ने असम, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में गठबंधनों में अपने लिए जगह बनाई है। मैं समझता हूं कि यह अच्छा है। यदि ये पार्टियां अकेले चुनाव लड़ें तो विधायी संस्थाओं में अपनी मौजूदगी नहीं करा पाएंगी और उन्हें बाहर रहने और आंदोलनकारी बने रहने को मजबूर होना पड़ेगा। अच्छा यह है कि वे संसद और विधानसभाओं में प्रवेश करें और देश तथा राज्यों के शासन में हिस्सा बटाएं।
प्रत्येक पार्टी गठबंधन बनाने की कोशिश करती है। यह संभव है कि कुछ राज्यों में कुछ चुनावों में कोई राजनीतिक दल अपने दम पर बहुमत हासिल करने में सफल हो जाए, लेकिन ऐसे मामलों में भी वह पार्टी कुछ अन्य पार्टियों के वोट जोड़ना चाहेगी और अपने बहुमत को मजबूती देगी। अब अधिकांश चुनाव गठबंधनों के बीच लड़ाई का सबब बन गए हैं। राज्यों के मौजूदा चुनावों में असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी इन सभी राज्यों में व्यापक रूप से दो गठबंधन आमने-सामने हैं। पश्चिम बंगाल में तीन गठबंधन हैं, लेकिन उनकी ताकत असमान है। मेरा अनुभव रहा है कि एक गठबंधन सरकार कहीं अधिक जवाबदेही और कहीं अधिक उत्तरदायी होती है।
वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह की सरकारें गठबंधन सरकारें थीं। इसलिए, चुनावी गठबंधन या गठबंधन सरकारों को कोसिये मत। ऐसी सरकारें एकल पार्टी के निरंकुश शासन से बेहतर होती हैं और बेहतर नतीजे देती हैं।