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सेक्यूलर होने का मौसम
श्याम विमल
Updated Tue, 07 May 2013 09:57 PM IST
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सेक्यूलर राजनीतिक दलों का बड़ा प्रिय शब्द है। खासकर जब राज्यों या केंद्र में चुनाव के दिन निकट आते हैं, तब इसका खूब इस्तेमाल होता है। बारहों महीने जात-पांत की राजनीति करने वाली और धर्म के नाम पर हिंसा भड़काने वाली पार्टियां भी चुनाव के समय सेक्यूलर हो जाती हैं।
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वैसे भी चुनाव जीतने के मामले में नैतिक-अनैतिक में फर्क आजकल कौन करता है! जिनके पास धनबल होता है, जिनकी छत्रछाया में बाहुबली पलते हैं या जो खानदानी खून होने का भाग्य लिखा लाए होते हैं, वे वरणीय जनप्रतिनिधि हो जाते हैं।
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वे किसी भी जाति, धर्म, मजहब के हों, किंतु सेक्यूलर के मौसमी स्लोगन के सहारे जीतने की उम्मीद पाले होते हैं। उनके चंगू-मंगू कहते हैं कि सेक्यूलर होने के कारण ही विरोधियों ने उनके खिलाफ मुकदमे दाखिल कर रखे हैं और उनके नेताजी को झूठ-मूठ में जेल की हवा खिलाई गई है।
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कई नेता तो कुर्सी पद की चाह-चिंता में इतने खीझे हुए होते हैं कि रैलियों और प्रेस कांफ्रेंसों में अक्सर उनकी जुबान फिसल जाती है। कभी हाई कमान के इशारे पर उन्होंने जुबान गंदी कर भी ली और मीडिया में फजीहत होने लगी, तो खेद या सॉरी जैसा हल्का शब्द बोलकर या शब्द वापस लेकर मामले को रफा-दफा करने में उनका जोड़ नहीं है।
ठीक भी है। वचने का दरिद्रता! आज की राजनीति का दस्तूर यही हो चला है भैया। बदजुबानी का तीर कमान से निकलकर लक्ष्यभेद भी कर ले, तो क्या जाता है अपना! अगर कारण बताओ नोटिस मिलता है, तो कह दिया जाएगा कि मीडिया वालों की नासमझी है। अपना पौवा बढ़ाना है,तो मीडिया को साधे रखना है।
अपना मीटर डाउन हो रहा है, तो मीडिया पर ठीकरा फोड़कर पाक-साफ निकल लेना है। जिसने नेतागीरी का यह ककहरा न सीखा, उसके एक्सपीरियएंस पर शक होता है। वैसे भी आज कौन आदमी मूल्यों की राजनीति करना चाहता है? किसके पास फुर्सत है भाई! मूल्य से तो वे यही समझते हैं कि राजनीति में आए हैं, तो जितना मूल्य वसूलना है, वसूल लो।
चुनाव के दौर में सेक्यूलर-सेक्यूलर की चाहे जितनी गूंज हो, यह शब्द इतना भी ज्यादा नहीं घिसा है कि अर्थ बदल जाए। मान लो, अगर सिद्धू प्राजी भाजपा छोड़कर यूपीए में चले जाते हैं, तो क्या वह सेक्यूलर हो जाएंगे? चालाक नेता यह नहीं समझते कि मतदाता उनकी सेक्यूलर चालाकी खूब समझता है।