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पर्यावरण: ए टेल ऑफ टू सिटीज...दिल्ली दमघोंटू हवा की चादर के पीछे छिपी, बीजिंग पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा
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वायु प्रदूषण
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अमर उजाला
विस्तार
कुछ वर्षों पहले तक दो पड़ोसी देशों, भारत और चीन की राजधानियां दिल्ली और बीजिंग, दोनों ही वायु प्रदूषण की गिरफ्त में फंसी तड़प रही थीं। तेज आर्थिक विकास, जनसंख्या वृद्धि और वाहनों की बढ़ती संख्या ने शहर के पर्यावरण, खास तौर पर इसकी वायु गुणवत्ता पर बहुत ज्यादा दबाव डाला।हालांकि, बीजिंग ने हाल के वर्षों में अपनी वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए उल्लेखनीय प्रगति की है, जो इसी तरह की चुनौतियों से जूझ रहे अन्य शहरों के लिए एक उदाहरण है। वहीं, दिल्ली अब भी संघर्ष कर रही है। सितंबर, 2013 में जारी एयर पॉल्यूशन एक्शन ने चीन को 2014 और 2017 के बीच अपनी वायु गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार करने में मदद की, जिससे बीजिंग में पीएम2.5 का स्तर 33 प्रतिशत और पर्ल रिवर डेल्टा में 15 फीसदी कम हो गया।
भारत ने नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) के तहत वायु प्रदूषण से निपटने के लिए काम शुरू किया गया, लेकिन उसकी प्रगति उम्मीदों के अनुरूप नहीं रही। वहीं वायु प्रदूषण के खिलाफ अपनी लड़ाई के दूसरे चरण के हिस्से के रूप में चीन ने साल 2018 में ब्लू स्काई वॉर जीतने के लिए अपनी तीन साल की कार्ययोजना शुरू की। जहां 2013 की कार्ययोजना में केवल बीजिंग-तियानजिन-हेबेई, पर्ल और यांग्त्जी डेल्टा के शहरी समूहों के लिए पीएम2.5 स्तर के लक्ष्य निर्धारित किए गए थे, वहीं नई तीन वर्षीय कार्ययोजना चीन के सभी शहरों पर लागू होती है।
इस सदी के आरंभ में चीन के प्रमुख शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर लगभग वैसा ही था, जैसा 1890 में औद्योगिक क्रांति के चरम पर लंदन में था। मगर युद्ध के बाद लंदन में फैले ग्रेट स्मॉग के कारण आठ हजार लोगों की मौत के बाद चीन ने अपनी हवा को बि्रटेन के मुकाबले दोगुनी तेजी से साफ किया। इतना होने के बावजूद वर्ष 2017 के अंत तक चीन के 338 में से सिर्फ 107 शहर ही डब्ल्यूएचओ के 35 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के अंतरिम मानक को पूरा कर सके।
जाहिर है कि भारत के वायु गुणवत्ता निगरानी ढांचे को अपने उत्सर्जन के हिसाब से विस्तार देने की जरूरत है। इसके सटीक प्रबंधन के लिए उन्नत मल्टी-मॉडल डाटा एकीकरण आवश्यक है। साथ ही, प्रदूषण हॉटस्पॉट की सटीक पहचान करना भी जरूरी है। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम 2.0 (एनसीएपी 2.0) बेहतर रणनीतियों, मल्टी-मॉडल डाटा एकीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के साथ वायु प्रदूषण की समस्याओं से निपटने में कितना सफल होगा, यह तो समय ही बताएगा। प्रदूषण को प्रभावी ढंग से समझने और कम करने के लिए दीर्घकालिक डाटा संग्रह और स्रोत विभाजन महत्वपूर्ण हैं। चार-स्तंभ दृष्टिकोण-नवाचार और अनुसंधान, क्षमता निर्माण, कानूनी रूपरेखा और आउटरीच-वायु गुणवत्ता प्रबंधन को आधार प्रदान करना चाहिए। जहां भारत का पर्यावरण संरक्षण बजट वैश्विक मानकों के हिसाब से मामूली है, इसकी बढ़ती अर्थव्यवस्था अधिक निवेश की क्षमता प्रदान करती है। भारत चीन जैसे देशों से प्रेरणा ले सकता है, जो यह दर्शाता है कि कैसे लक्षित प्रयास अपनी यात्रा की शुरुआत में अपेक्षाकृत कम जीडीपी के साथ परिवर्तनकारी प्रगति की ओर ले जा सकते हैं।