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आपदा प्रबंधन: जलवायु परिवर्तन अब एक सच्चाई, हमें हिमालय में निर्माण कार्य इसे ध्यान में रखकर ही करने चाहिए
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हिमालय
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विस्तार
समग्र हिमालय की तरह हिमाचल प्रदेश भी जलवायु परिवर्तन के दौर में लगातार आपदाओं की चपेट में आता जा रहा है। गत वर्ष की तबाही को अभी तक प्रदेश भूल नहीं पाया है। आपदा प्रभावितों के जख्मों पर अब तक पूरी तरह मरहम नहीं लगाया जा सका है। प्रदेश की कमजोर आर्थिकी और केंद्रीय सहायता के इंतजार में बहुत काम अटका पड़ा है। खासकर, जिनके मकानों के नीचे की जमीन धंस गई हैं, उन्हें वन संरक्षण अधिनियम के चलते वैकल्पिक जमीन देना भी असंभव बना हुआ है।
गत वर्ष दो हजार घर पूरी तरह से तबाह हो गए थे और नौ हजार आंशिक रूप से तबाह हुए। 400 से अधिक लोग काल का ग्रास बन गए थे। बाढ़-भूस्खलन का यह सिलसिला भले जलवायु परिवर्तन के चलते भयावह हो गया हो, या अवैज्ञानिक निर्माण कार्यों के कारण, दोनों ही मामलों में ये आपदाएं मानव निर्मित ज्यादा हैं और प्राकृतिक कम। अक्सर हम इन्हें प्राकृतिक आपदाएं कह कर अपनी गलतियां छिपाने की कोशिश करते रहते हैं। बाढ़-भूस्खलन प्राकृतिक तौर पर भी आते रहते हैं, किंतु मानव निर्मित कारणों से ये भयानक बन जाती हैं। बढ़ते वैश्विक तापमान के चलते ग्लेशियर पिघलने के कारण हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर के भाग टूटकर और कुछ मलबा मिश्रण घाटियों में फंसकर कृत्रिम झीलों का निर्माण करता है। ये झीलें अचानक टूट जाती हैं और नीचे भयानक बाढ़ की विभीषिका देखने को मिलती है। पिछले साल हुई तबाही में कई जगह बादल फटने की घटनाएं भी कारण बनीं। बादल फटने की घटनाएं भी वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण ही बढ़ी हैं।
अब जलवायु परिवर्तन एक सच्चाई बन चुका है, इसलिए हमें हिमालय में निर्माण कार्य इसे ध्यान में रखकर ही करने चाहिए। एक तो जलवायु परिवर्तन के कारण अतिवृष्टि और ग्लेशियर पिघलने के कारण आने वाली बाढ़ों का खतरा बढ़ जाता है। दूसरे, हिमालय एक युवा पहाड़ है, जो अभी बन ही रहा है। इस कारण यह कमजोर और भुरभुरा है। भारी बारिश की मार न सह सकने के कारण यहां भूस्खलन होते हैं। ऐसे नाजुक भू-स्थल में जब निर्माण कार्यों के चलते अंधाधुंध तोड़फोड़ होती है, तब भी भूस्खलन से तबाही होती है। जब भूस्खलन का मलबा नदी-नालों में पंहुचता है, तो पानी और बाढ़ का बहाव तबाही मचा देता है। बांध, सुरंगें, चौड़ी सड़कें बनाने के दौरान निकले मलबे ढलानों पर फेंके जाने से तबाही बढ़ती है।
इन निर्माण कार्यों के लिए भारी मात्रा में वृक्ष भी काटे जाते हैं, जो कमजोर भूस्थल को और कमजोर बना देते हैं। खनन कार्य भी इस तबाही में योगदान देते हैं। ये सभी कार्य एक तरफ प्रकृति विध्वंस का कारण बनते हैं, तो दूसरी तरफ इन कार्यों से जुड़े लोगों के लिए आय का साधन होते हैं। इसलिए स्थानीय समुदाय दो हिस्सों में बंट जाता है। जो इस तबाही का शिकार होते हैं, वे इसका विरोध करते हैं, और जिन लोगों की आजीविका इन निर्माण कार्यों से चलती है, वे समर्थन में खड़े होते हैं। जो विस्थापित हो जाते हैं, उन्हें कुछ पीढ़ियों तक विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है। इस द्वंद्व में हिमालय क्षेत्र फंसा हुआ है।
हिमालय देश को जिंदा रहने के लिए सबसे जरूरी हवा, पानी और भोजन की सुरक्षा की व्यवस्था करता है। हिमालय की इन पर्यावरणीय सेवाओं को बनाए रखकर ही देश और हिमालयी क्षेत्र का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है। इसलिए हिमालय के पर्यावरणीय तंत्र को सुरक्षित रखना और विकास कार्यों के विरोधाभास को समाप्त करना जरूरी है। सड़क निर्माण से लेकर पनबिजली परियोजनाओं तक हमारी निर्माण गतिविधियों को वैकल्पिक तकनीकों द्वारा पर्वत विशिष्ट मॉडल के रूप में विकसित करना होगा। मसलन, सड़क निर्माण कट ऐंड फिल तकनीक से करके डंपिंग से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।
हालांकि, पर्यटन भी स्थानीय आजीविका के लिए जरूरी आधार बनता जा रहा है, किंतु इसके कारण भी पहाड़ी ढलानों पर बढ़ते बोझ और कचरों से फैलने वाले प्रदूषण के चलते इसका भी नियमन किया जाना जरूरी है। इस व्यवसाय से जुड़े कुछ लोग उत्तरदायी पर्यटन की अवधारणा को लागू करने की बात कर रहे हैं। इससे पर्यावरण सुरक्षा के साथ-साथ पर्यटन व्यवसाय का टिकाऊपन भी सुनिश्चित हो सकेगा। मंडी और कुल्लू में कुछ समूह इस दिशा में कार्यरत हैं। फिर भी कुछ आपदाओं से बचाव के लिए आपदा प्रबंधन को चाक-चौबंद करना होगा। आपदा की स्थिति में तत्काल राहत के लिए स्थानीय समुदायों, स्वयंसेवी संस्थाओं, महिला मंडलों, युवा मंडलों, पंचायतों को जागरूक करना और प्रशिक्षित करना होगा।
(लेखक पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)