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चुनावी फंडिंग: संस्थागत सुधार की दरकार, करने होंगे ये काम

Tue, 13 Apr 2021 02:48 AM IST
बीके चतुर्वेदी बी के चतुर्वेदी
बी के चतुर्वेदी Published by: बीके चतुर्वेदी Updated Tue, 13 Apr 2021 02:48 AM IST
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Civil liberties: the need for institutional reform
चुनाव सुधार - फोटो : PTI

कुछ समय पहले एक अमेरिकी थिंक टैंक फ्रीडम हाउस ने एक रिपोर्ट जारी की थी कि भारत केवल आंशिक रूप से स्वतंत्र है। इसने उल्लेख किया कि संविधान अभिव्यक्ति स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता के साथ नागरिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, पर पत्रकारों, गैर सरकारी संगठनों और सरकार के अन्य आलोचकों का उत्पीड़न मोदी के शासन में काफी बढ़ गया है। मुस्लिम, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिये पर हैं। विशेष रूप से उसका आकलन था कि देश में नागरिक स्वतंत्रता की स्थिति बहुत खराब है। ये वार्षिक आकलन हैं और वर्ष के दौरान नीतियों या महत्वपूर्ण घटनाओं में बदलाव के आधार पर ये बदल सकते हैं। पर कुछ बुनियादी मुद्दे हैं, जिनके हमारे लोकतंत्र के लिए दीर्घकालीन निहितार्थ हैं। ये देश के कई नागरिकों को चिंतित करते हैं। इनमें से अधिकांश हमारे संस्थानों की ताकत से संबंधित हैं। जब तक ये बदलाव नहीं होंगे, हमारे देश में लोकतंत्र फल-फूल नहीं सकता। 


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चुनाव सुधार संस्थागत पुनर्गठन का एक प्रमुख तत्व है। चुनाव प्रक्रिया की ईमानदारी (पवित्रता) राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की प्रभावी भागीदारी पर काफी कुछ निर्भर करती है। इसके लिए चुनाव में धन खर्च करना पड़ता है। जाहिर है, सत्तारूढ़ पार्टी को चुनाव लड़ने और पैसा खर्च करने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन विपक्षी दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों के पास संसाधनों की कमी होती है। इसलिए चुनावों के वित्तपोषण की प्रक्रिया को बदलने की तत्काल आवश्यकता है। हमें चुनावी प्रक्रिया के राज्य द्वारा वित्तपोषण के बारे में विचार करना चाहिए। जर्मनी, स्वीडन जैसे देशों में ऐसी व्यवस्था है। यह भी जरूरी है कि चुनावों का वित्तपोषण ज्यादा पारदर्शी हो। 

उम्मीद की गई थी कि ऐसा धीरे-धीरे हो जाएगा, पर नहीं हुआ। चुनावी बांड ने इस प्रक्रिया को और अपारदर्शी बना दिया है। अब आम तौर पर लोगों को पता ही नहीं चलता कि किस व्यावसायिक घराने या कंपनी ने किसे चंदा दिया है और उसमें क्या गड़बड़ी है। इसका नतीजा हुआ कि ज्यादातर फंडिंग (कुछ रिपोर्ट के अनुसार 80 फीसदी) केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को हुई। इसलिए कानून में संशोधन करने और चुनावी बांड की प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी बनाने की जरूरत है। सर्वोच्च न्यायालय को इस कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर तेजी से सुनवाई करनी चाहिए। केंद्र सरकार को भी चुनावी फंडिंग को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए पुनर्विचार करना चाहिए। 

चुनाव में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। अधिकांश देशों में यह लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने में अहम भूमिका अदा करता है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान इससे सभी दलों को बराबर महत्व दिए जाने की उम्मीद रहती है। पर दुर्भाग्य से लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में कुछ वर्षों में प्रेस की स्वतंत्रता और इसके कामकाज में कमजोरी आई है। तेजी से ऐसी भावना बढ़ रही है कि प्रेस अपना काम सही तरीके से नहीं कर रहा। वर्ष 2020 में, प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों में से भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंक 136 (2015) से गिरकर 142 पर आ गई है। प्रेस परिषद और मीडिया के अन्य स्व-विनियमन निकायों को इस पर ध्यान देना चाहिए। निर्वाचन आयोग एक ऐसा संगठन है, जो देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए उत्तरदायी है। अतीत में इसने बहुत अच्छा काम किया और वैश्विक स्तर पर इसकी प्रशंसा हुई। पर कुछ हालिया कार्रवाई के चलते इसकी कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं।

इसके कई फैसलों ने इस विश्वास को बल दिया है कि आयोग मानदंडों के अनुसार पूरी तरह से काम नहीं कर रहा। वर्ष 2019 में जब एक चुनाव आयुक्त ने सत्ताधारी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के आचरण को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन बताया, तो उन्हें हटा दिया गया और कुछ सरकारी जांच एजेंसियों ने उनके परिवार के एक सदस्य के खिलाफ जांच शुरू कर दी। चुनाव  आचार संहिता में एक प्रावधान है कि मतदान से 48 घंटे पहले राजनीतिक रैलियां और सभाएं बंद हो जाएंगी। लेकिन पड़ोसी निर्वाचन क्षेत्र में जब वरिष्ठ नेता रैली करते हैं और उसे टीवी पर दिखाया जाता है, तो इसका खुलेआम उल्लंघन होता है। चुनाव आयोग को अपने कामकाज पर विचार करना चाहिए और ऐसे मानदंड बनाने चाहिए, जिससे और भरोसा पैदा हो।

एक महत्वपूर्ण मुद्दा चुनावी प्रक्रिया के दौरान भ्रष्टाचार-विरोधी एजेंसियों की भूमिका है। सीबीआई, आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय जैसी भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों की भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों को पकड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका है। हालांकि इन्हें स्वतंत्र रूप से काम करना चाहिए। पर अधिकांश सरकारें उनके कामकाज में दखल देने की कोशिश करती हैं। यह तब  और अधिक चिंताजनक हो जाता है, जब ऐसी धारणा बनती है कि ये चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए सरकार के उपकरण के रूप में काम कर रही हैं। वैश्विक स्तर पर अधिकांश भ्रष्ट कार्य सत्ताधारी राजनेता और सरकारी अधिकारी करते हैं। पर सत्तारूढ़ दल के भ्रष्ट नेताओं पर शायद ही कभी छापे पड़े हों।

हाल ही में एक अंग्रेजी दैनिक में वर्षवार पिछले पांच वर्ष के ऐसे छापों की सूची प्रकाशित की गई थी। इस सूची में बीस मामलों का जिक्र है, पर एक भी छापे केंद्र में सत्तारूढ़ दल के राजनेताओं के खिलाफ नहीं पड़े हैं। तर्क दिया जा सकता है कि सरकारी एजेंसियों को अपराध के खिलाफ अपना काम करना चाहिए। लेकिन जब बार-बार इस तरह की कार्रवाई चुनावों के दौरान कई वर्षों से हो रही हैं और वह भी मुख्य रूप से विपक्षी दलों के खिलाफ, तो यह मानना मुश्किल है कि सरकार ने इन एजेंसियों के फैसलों को प्रभावित नहीं किया है। यह न तो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को मजबूत करता है और न ही भ्रष्टाचार से निपटने में मदद करता है। इसलिए कुछ ऐसे मानदंड बनाने चाहिए, जिससे न तो इन एजेंसियों को कार्य करने में बाधा हो और न ही चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो। 

हमारे देश में संसदीय लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हैं। हमारे संविधान ने इसके लिए ठोस आधार प्रदान किया है। लेकिन इसके लिए हमारे संस्थानों को मजबूत बनाने की आवश्यकता है, और चुनाव सुधार इसके लिए बहुत जरूरी है। 

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