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शहर पर कवि
कुमार अनुपम।
Updated Sat, 11 May 2013 10:55 PM IST
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कुमार अनुपम।
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कवि, चित्रकार, कला समीक्षक। 2011 का पहला कविता-समय युवा सम्मान।
‘बारिश मेरा घर’ काव्य संग्रह से शहर पर लिखी गई एक कविता।
जिस शहर की रगों में
नहीं बहती है कोई नदी
उस शहर का
दिल से कोई रिश्ता नहीं होता।
धूप में पकती निबौरियों
की मिठास
हवा को सोंधी स्वस्थ गमक से भर देती
पर, शहर से कहां गायब हो गए
नीम के सारे के सारे दरख्त?
शहर में ऊंची ऊंची इमारतें
इमारतों की फुनगी पर बैठा हुआ कौआ
देखता है नीचे और करता है अट्टहास
कि देखो देखो कितने तुच्छ दिख रहे हैं
जमीन पर रेंगते हुए आदमी।
शहर में दो तरह के प्राणी रहते हैं
सफल कौवे
और असफल विक्षिप्त।
एक दूरबीन निगाह रखती है पल पल
सारे शहर पर
कौन कैसे हंसता है कितने
इंच दांत चियार
किसको आते हैं आंसू सचमुच के
किसकी यारबाश आदतें
शहर के मानकों के लिए विध्वंसक
उन तथाकथित विक्षिप्तों की शिनाख्त
युद्धस्तर पर जारी है।
जल्द ही
शहर अपनी अंधी रफ्तार से भागता बेतहाशा
चला जाएगा अस्तित्व से इतना दूर कि समय
उसके चिह्न तक खोजे न पाएगा अपनी स्मृति तक में
मेरा शाप है।