सियासत बदल देगा नागरिकता बिल
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
लोकसभा में नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 के पारित होने से पूर्वोत्तर भारत में उथल-पुथल के एक नए चरण की शुरुआत हो गई है। यह ऑल असम स्टुडेंट्स यूनियन (एएएसयू) के आठ जनवरी के बंद के दौरान हुई हिंसा से स्पष्ट है, जिसे पूर्वोत्तर राज्यों के कई स्वदेशी समूहों का समर्थन मिला। असम गण परिषद (एजीपी) ने बिल के विरोध में भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ दिया है और मेघालय, नगालैंड एवं मिजोरम में अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी, जिन्होंने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई है, इसके खिलाफ तीखा विरोध जताया है। उन्हें भय है कि यह विधेयक, जो धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भागकर आए गैर-मुस्लिम प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना चाहता है, उससे उनके राज्य में बांग्लादेश से आए बंगाली हिंदुओं और बौद्ध चकमाओं को भी वैधता मिल जाएगी। असम के भाजपा प्रवक्ता मेहदी आलम बोरा ने इस विधेयक के विरोध में पार्टी से इस्तीफा दे दिया है।
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने भी इस विधेयक का विरोध किया है, उनका तर्क है कि भारतीय संविधान के तहत धर्म के द्वारा किसी की नागरिकता निर्धारित नहीं की जा सकती। दोनों पार्टियों को डर है कि इससे पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में बंगाली हिंदुओं के बीच भाजपा की स्थिति मजबूत होगी और मुसलमानों के लिए असहज स्थिति पैदा हो जाएगी, खासकर पूर्वी बांग्ला मूल के लोगों की, जिनकी आबादी अच्छी-खासी है। कृषक मुक्ति संग्राम समिति जैसे असम के स्थानीय समूह ने इस बिल के खिलाफ दिल्ली में नग्न प्रदर्शन किया। यह बिल असम के राजनीतिक परिदृश्य से एएएसयू और एजीपी को निकाल बाहर करने की कोशिश करता है, जहां बांग्लादेश से अवैध प्रवासन बार-बार उठने वाला विषय रहा है। दर्जनों असमी युवा अलगाववादी उल्फा में शामिल होने के लिए जंगल चले गए हैं, क्योंकि वे इसे 'दिल्ली द्वारा असम के साथ एक और धोखा' मानते हैं।
असम में सत्तारूढ़ भाजपा, जिसके एक मंत्री हेमंत बिस्व शर्मा ने यह कहकर बिल को उचित ठहराया है कि '18 सीटों (विधानसभा की) को जिन्ना (इसे मुस्लिम पढ़ें) के हाथों जाने से रोकने का यह एक मात्र उपाय है', 1985 के असम समझौते के खंड छह को लागू करके इसके प्रतिकूल प्रभाव को खत्म करने की कोशिश कर रही है। ऐसा करने का मतलब असम में छह अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों (ओबीसी)-चाय जनजाति/आदिवासी, ताई-अहोम, चुटिया, मोरन, मोटोक और कोच-राजबोंगशी की स्थिति अनुसूचित जनजातियों (एसटी) जैसी हो जाएगी। मोदी सरकार ने लंबे समय से इसका वायदा किया था। भाजपा को लगता है कि इस कदम से स्वदेशी समुदायों के एक बड़े हिस्से के बीच खोई जमीन वापस पाने में मदद मिलेगी। 2011 की जनगणना के अनुसार, असम में लगभग चालीस लाख आदिवासी हैं, जो राज्य की 3.1 करोड़ आबादी का 13 प्रतिशत हिस्सा हैं। जब इन छह ओबीसी को एसटी का दर्जा दे दिया जाएगा, तो राज्य में एसटी की आबादी बढ़कर कुल आबादी का 54 फीसदी हो जाने की संभावना है। हालांकि अभी एसटी के रूप में जो समुदाय सूचीबद्ध हैं, वे केंद्र के इस फैसले को सहजता से नहीं ले रहे हैं, लेकिन भाजपा को उम्मीद है कि ये समुदाय उनके फैसले का जबर्दस्त स्वागत करेंगे।
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के लोकनीति द्वारा असम चुनाव के बाद कराए गए एक सर्वे के मुताबिक, इन छह समुदायों की 49 फीसदी आबादी ने एसटी का दर्जा पाने के लिए भाजपा को वोट दिया था। इसने मुख्यरूप से कांग्रेस के वोटबैंक में सेंध लगाई, खासकर चाय जनजातियों में, जो छोटानागपुर मूल के हैं। 2011 के असम चुनाव के दौरान यह संख्या 33 फीसदी थी। एसटी का दर्जा देने से इन समुदायों में भाजपा का वोट शेयर ज्यादा नहीं, तो दोगुना हो सकता है, ऐसा पार्टी के प्रबंधक बिस्व शर्मा मानते हैं।
भाजपा असम की आशंकाओं को यह कहते हुए शांत करने की कोशिश कर रही है कि असम समझौते के खंड छह के लागू होने का मतलब होगा कि 126 सीटों वाली राज्य विधानसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों की संख्या में काफी वृद्धि होगी। यहां तक कि अगर यह 50 प्रतिशत का आंकड़ा पार नहीं करता है, तो यह निश्चित रूप से 40 प्रतिशत से अधिक होगा। जातीय असमियों के वर्चस्व वाली सामान्य सीटों को भी इसमें जोड़ दें, तो भाजपा को उम्मीद है कि इससे राजनीतिक ताकत हमेशा स्वदेशी समूहों के पास रहेगी। यह न केवल हिंदुओं को एकजुट करेगा, नागरिकता बिल से बंगाली हिंदुओं (जो असम की आबादी में करीब 12 फीसदी हैं) को निष्ठावान वोटबैंक में बदला जाएगा, बल्कि मुसलमानों को सत्ता से बाहर रखना और उन्हें किंग मेकर की भूमिका से अपदस्थ करना, मेहनती कार्यबल की हैसियत प्रदान करना, और राजनीतिक ढांचे में उनका प्रभाव खत्म करना भी संभव होगा। भाजपा को यह भी उम्मीद है कि इस बिल से पश्चिम बंगाल में उसकी सीटें बढ़ाने में मदद मिलेगी, क्योंकि हिंदू प्रवासी इसका स्वागत करेंगे।
जिन्होंने छह ओबीसी समुदाय को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने का समर्थन किया है, उनका तर्क है कि यह बांग्लादेश से असम में अवैध घुसपैठ की समस्या से निपटने में मददगार साबित होगा, क्योंकि यह सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए कथित अवैध आप्रवासियों के प्रभाव को कम करेगा। वे क्षेत्र जहां ये छह समुदाय रहते हैं, विशेष रूप से निचले असम में, वहां बांग्लाभाषी मुसलमानों की बहुतायत है। भाजपा के नेताओं का कहना है कि नए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र में बांग्ला भाषी मुसलमानों के वोट घट जाएंगे। लेकिन यह कदम असमिया समाज को एसटी और गैर-एसटी क्षेत्रों में विभाजित करेगा और असमिया राष्ट्रीयता के गठन की प्रक्रिया को बाधित करेगा। और अगर एनआरसी बहिष्करण और नागरिकता बिल से परेशान ब्रह्मपुत्र घाटी में बंगाली मूल के मुसलमान 2021 की जनगणना में अपनी मातृभाषा बंगाली (और असमिया नहीं, जैसा कि वे अभी कर रहे हैं) बताते हैं, तो राज्य में असमिया बोलने वालों की तुलना में बंगाली बोलने वाले अधिक होंगे। असम की जातीय-धार्मिक बिसात में इतने जोखिम हैं कि एक गलत चाल से पूरा खेल बिगड़ सकता है।