{"_id":"64decbfc1b2ad5418701f0c3","slug":"cinematograph-amendment-bill-2023-initiative-to-curb-menace-of-film-piracy-2023-08-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"तकनीक: पाइरेसी के विरुद्ध पहल, कानून में बदलाव से अंकुश लगने की उम्मीद","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
तकनीक: पाइरेसी के विरुद्ध पहल, कानून में बदलाव से अंकुश लगने की उम्मीद
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
सांकेतिक तस्वीर
- फोटो :
iStock
विस्तार
फिल्म गदर 2 रिलीज होने के दिन ही ऑनलाइन लीक हो गई। फिल्म का एचडी प्रिंट विभिन्न टोरेंट साइट्स पर रिलीज कर दिया गया। यह फिल्म तमिल रॉकर्स, टेलीग्राम, फिल्मजिला और मूवीरुल्ज जैसी पाइरेसी वेबसाइट्स पर उपलब्ध है। पूरी दुनिया में पाइरेसी (गैर कानूनी नकल) एक बड़ी समस्या है और इंटरनेट ने इसे और भी जटिल बना दिया है। सॉफ्टवेयर पाइरेसी से शुरू हुआ यह सफर फिल्म, संगीत, धारावाहिकों तक पहुंच गया है।
इंटरनेट के आगमन ने इसमें तेजी ला दी है। हमारे देश में इंटरनेट का प्रसार बहुत तेजी से हो रहा है। साथ ही ऑनलाइन पाइरेसी का कारोबार भी उच्च गति वाले इंटरनेट स्मार्टफोन के जरिये हाथोंहाथ पहुंच रहा है। पाइरेसी के काम में संलिप्त कई वेबसाट्स उपभोक्ताओं को दूसरों के द्वारा तैयार सामग्रियां मुफ्त में उपलब्ध कराती हैं और अपनी वेबसाइट्स पर आने वाले ट्रैफिक के जरिये विज्ञापनों से कमाई करती हैं। इस तरह मूल निर्माताओं तक उन सामग्रियों की कुल कमाई नहीं पहुंच पाती है। ऑडियो–वीडियो कंटेंट को मुफ्त में पाने के लिए लाइव स्ट्रीमिंग का सहारा लिया जा रहा है, क्योंकि इंटरनेट की गति बढ़ी है।
यूट्यूब जैसी वीडियो वेबसाइट कॉपीराइट जैसे मुद्दों के प्रति संवेदनशील है। इसलिए वह पाइरेटेड वीडियो को तुरंत अपनी साइट से हटा लेती है, लेकिन इंटरनेट पर लाखों ऐसी वेबसाइट्स हैं, जो पाइरेटेड ऑडियो-वीडियो कंटेंट उपभोक्ताओं को उपलब्ध करा रही हैं। जेलर और पठान जैसी फिल्में भी लीक हो गईं। दक्षिण भारत में तमिल रॉकर्स जैसी पाइरेसी साइट्स ने कोहराम मचा रखा है। इसे जैसे ही ब्लॉक किया जाता है, यह यूआरएल बदलकर फिर से काम करने लगती है। पाइरेसी के कारण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को सालाना 20 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।
वैश्विक सलाहकार फर्म अंकुरा की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में टोरेंट साइटों के जरिये सात अरब से अधिक विजिट के साथ कंटेंट पाइरेसी वेबसाइटों पर विजिट करने के मामले में अमेरिका और रूस के बाद भारत तीसरे स्थान पर है। संगीत, फिल्मों, सॉफ्टवेयर और किताबों की पाइरेसी में व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे मेसेजिंग एप ने स्थिति और गंभीर बना दी है, जो पाइरेटेड सामग्रियों वाले टोरेंट साइट्स या एग्रीगेटर एप्स के बारे में जानकारी प्रसारित करते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पाइरेसी वेबसाइटों पर आने वाले कुल ट्रैफिक में टीवी सामग्री का हिस्सा 46.6 प्रतिशत था, इसके बाद प्रकाशन सामग्री (किताबें) का योगदान 27.80 प्रतिशत रहा। फिल्म पाइरेसी 12.40 प्रतिशत तक पहुंच गई है, इसके बाद संगीत और सॉफ्टवेयर पाइरेसी का हिस्सा क्रमशः सात प्रतिशत और 6.20 प्रतिशत है।
भारत में वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पाइरेसी के कारण कुल राजस्व का 25-30 प्रतिशत हिस्सा गंवा रहे हैं। सरकार ने इससे निपटने के लिए सिनेमैटोग्राफ संशोधन बिल, 2023 में कुछ नए प्रावधान जोड़े हैं। इस विधेयक का उद्देश्य ‘पाइरेसी’ की समस्या पर अंकुश लगाना है। इसमें फिल्म की पाइरेसी करने वालों को तीन महीने से लेकर तीन साल की जेल हो सकती है। साथ ही, फिल्म निर्माण लागत का पांच प्रतिशत जुर्माना भी भरना होगा। फिल्म को गैरकानूनी तरीके से दिखाना या फिर इसकी गैर कानूनी रिकॉर्डिंग भी अपराध की श्रेणी में आएगी।
सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 में अंतिम महत्वपूर्ण संशोधन वर्ष 1984 में किया गया था। नए प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों के कारण अब कई कानून प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। कॉपीराइट अधिनियम, 1957 जैसे मौजूदा कानूनों में कई समस्याएं हैं और वे पर्याप्त कठोर नहीं हैं, जिससे अपराधियों को दंडित करना मुश्किल हो जाता है। राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) नीति, 2016 सहित नए कानूनों का पालन और साइबर डिजिटल अपराध इकाइयों की स्थापना अब भी प्रारंभिक चरण में है। पर्याप्त कानूनों के अभाव में अदालतें पाइरेसी के मामले में कुछ खास नहीं कर पाती हैं। सिनेमैटोग्राफ संशोधन बिल, 2023 पाइरेसी की समस्या पर कितना अंकुश लगा पाएगा, यह देखने वाली बात होगी।