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आखिर हम कैसा समाज बना रहे हैं?: खो रहा है इंसानियत का सुर, हिंसा के दौर में प्रेम और अहिंसा की पुकार
Fri, 02 Oct 2026 06:47 AM IST
देवेश त्रिपाठी
नन्दितेश निलय, स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक
नन्दितेश निलय, स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Fri, 02 Oct 2026 06:47 AM IST
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चोंगथम विक्रम की हत्या ने क्यों झकझोरा?
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अमर उजाला प्रिंट
विस्तार
पिछले महीने उन्मादी भीड़ द्वारा एक ऐसे कलाकार को मार दिया गया, जो संगीत की गहरी समझ रखता था। उन्हें सुर से बेहद लगाव था और सुर को भी उनसे। गिटार के तार उनके दोस्त थे, लेकिन उस रात उन्हें कोई बचा नहीं पाया। संगीत उस अंध घृणा से हार गया। लेकिन, उनके मन में तो सिर्फ संगीत और प्रेम था। वह पूरब के उस राज्य से ताल्लुक रखते थे, जो हाल ही में बहुत उथल-पुथल से गुजर चुका था। वह दिल्ली की सड़कों पर अपने आसपास सब कुछ संगीतमय करना चाहते थे। लेकिन, उस रात भीड़ को उनका चेहरा कुछ अलग-सा दिख रहा था। संविधान की प्रस्तावना का ‘हम भारत के लोग’ उस भीड़ के लिए अधूरा था और वह उस भीड़ के लिए कुछ अलग थे। नहीं तो रात के पहर में ऊंचे संगीत की ध्वनि को कुछ कम करने के आग्रह पर बात इतनी नहीं बढ़ जाती कि उस प्रसिद्ध मणिपुरी संगीतकार और गिटारवादक की हत्या हो जाए। पर, यह हुआ और वह मारे गए। वह कलाकार थे चोंगथम विक्रम सिंह।यह सब किसी छोटे कस्बे में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुआ, जो सभी को समेटना जानती है। लेकिन, वह तो भीड़ से अलग थे, सोच में, भाव में, शक्ल और दर्शन में भी। क्रोधित समाज को भेद ज्यादा दिखता है और संगीत से ज्यादा अपनी ऊंची आवाज तथा हिंसा पर भरोसा होता है। जिस जीवन का उद्देश्य ही किसी की जान लेना है, वहां घृणा और क्रोध में पलता समाज क्या हमारे देश के भविष्य के लिए सही हो सकता है? आज दो अक्तूबर को हम गांधीजी की जयंती मना रहे हैं। लेकिन, लोग एक पल के लिए भी नहीं सोचते कि गांधीजी अहिंसा में अटूट विश्वास रखते थे और उन्होंने दुनिया को भी अहिंसा का ही रास्ता दिखाया था।
भारत कभी मॉब लिंचिंग का देश नहीं रहा। मॉब लिंचिंग भीड़ द्वारा की गई वह हिंसात्मक घटना है, जिसमें अनियंत्रित भीड़ या लोगों के एक समूह द्वारा कानून को अपने हाथ में लेकर किसी व्यक्ति को किसी अपराध के संदेह, आरोप या मात्र अफवाहों के आधार पर पीट-पीट कर मार डाला जाता है। गांधीजी की अहिंसा सिर्फ बाहरी नहीं, बल्कि अंदरूनी भावना भी थी। नहीं तो चौरी चौरा की घटना संसार को यह न सिखा जाती कि नेतृत्व को अपने अहिंसात्मक मूल्यों पर अटूट भरोसा होना चाहिए। लेकिन, क्या हम दिनों-दिन और हिंसक होते जा रहे हैं? खासकर अपनी भाषा के मामले में भी? हर बात पर किसी का मजाक उड़ाया जाता है। अब ‘बिटवीन द लाइन्स’ नहीं, बल्कि उपहास करना मूल अधिकार बन चुका है।
हालांकि, ‘स्वच्छ भारत मिशन’ से बहुत उम्मीदें जगी हैं और ऐसा लगता है कि बापू अपने दूरदर्शी चश्मे से हमें देख रहे हैं, लेकिन मन की स्वच्छता का क्या? भारत सिर्फ भौगोलिक रूप से साफ-सुथरा होकर काम नहीं चला सकता। इन्सान को सिर्फ एक इकाई नहीं, बल्कि सच्चा इन्सान बनना होगा। हमारे बच्चों और हम सभी को मिल-जुलकर रहने के मूल्यों को समझना होगा। घर में गुस्सा, सड़क पर गुस्सा और बात-बात पर हिंसा! यह चिंता का विषय है। अहिंसा के मूल्य हम तभी आसानी से अपना सकते हैं, जब गांधीजी हमारे विचारों और व्यवहार में झलकें।
गांधीजी ने एक ऐसी बेहतर सामाजिक व्यवस्था की वकालत की थी, जहां शांति और सच्चाई ही सही मकसद तक पहुंचने का जरिया हो। गांधीजी के मन, वचन और कर्म हमेशा एक-दूसरे से जुड़े हुए और तालमेल में रहते थे। तो बिना समय बर्बाद किए, आइए हम महात्मा गांधी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें। मार्टिन लूथर किंग हमें आगाह करते हैं कि ‘अगर इन्सानियत विकास के लिए है, तो गांधीजी उसमें शामिल हो सकते हैं।’ वह दुनिया में शांति और सद्भाव वाली मानवीय सोच से प्रेरित थे। उनकी सोच और भावनाएं भी वैसी ही थीं। उन्हें नजरअंदाज करना हमारे लिए ‘जोखिम भरा’ हो सकता है।
कभी-कभी अहिंसा का मूल्य हमें बहुत जिम्मेदार बना देता है, क्योंकि यह हमें दूसरों को चोट पहुंचाना नहीं सिखाता; यह जान लेने की नहीं, बल्कि जान बचाने की जिम्मेदारी बन जाता है। और, हमारा स्वभाव भी कठोर व आक्रामक नहीं रह जाता। दृढ़ता तथा साहस के मूल्य हमारे गुण बन जाते हैं। अच्छे स्वभाव के कारण हम निडर और आत्मविश्वास से भरे हुए लगते हैं। बातचीत में, बोलने से ज्यादा सुनने और समझने की भावना को महत्व मिलने लगता है। हम ऐसी छोटी-छोटी बातें अपनाना शुरू कर देते हैं, जो हमें अपनी गैर-जिम्मेदाराना हरकतों से आजाद करती हैं। हम परिवार में जीतने की भावना से ऊपर उठकर साथ मिलकर चलने की भावना महसूस करने लगते हैं।
हिंसा और अहिंसा का सबसे बड़ा उदाहरण जापान है। हिरोशिमा और नागासाकी के बाद, जापान ने न तो अमेरिका को हराने का अहंकार पाला और न ही बम बनाए, बल्कि अपने देश के बच्चों को सही और गलत के बीच का फर्क करना समझाया और स्त्री-पुरुषों को मानवीय मूल्यों से जोड़ा। घर और देश की स्वच्छता की भावना में कोई अंतर नहीं होता और शायद जिम्मेदारी की यही भावना एक स्वतंत्र नागरिक या देश को इन्सानियत के रंग में रंग देती है। हम ऐसे इन्सान बनते हैं, जिस पर न तो जाति का रंग चढ़ता है और न ही किसी धर्म का। अगर कोई रंग चढ़ता है, तो वह जिम्मेदारी के बगीचे में केवल अहिंसा का ही रंग होता है। जितनी तेजी से यह समाज घृणा को पोषित और अलंकृत करता जा रहा है, उससे लगता है कि समय हम सभी से कुछ कहना चाह रहा है। मौजूदा समय इस देश के तमाम लोगों से, जेन-जी और जेन-अल्फा से और फिर आने वाली पीढ़ियों से भी भारत को संभालकर रखने का आग्रह कर रहा है। और, तभी अहिंसा तथा प्रेम से मानसिक व आत्मिक दृढ़ता के साथ विकसित भारत की यात्रा चरितार्थ हो सकती है।
वर्ष 1948 में जब महात्मा गांधी की हत्या हुई, तो पंडित रवि शंकर से एक दुखद धुन बनाने के लिए कहा गया। उस भावुक समय में, ऐसी धुन बनाना एक चुनौती थी, जिसमें दर्द, दुख और करुण क्रंदन... सब कुछ समाहित हो। धुन के बारे में सोचते हुए, एक दिन पंडित रवि शंकर की सोच ‘गांधी’ नाम पर आकर ठहर गई। उस शब्द में ही संगीत के सुरों-ग, ध, नि (तीसरा, छठा और सातवां सुर) का समावेश था। फिर उनकी सोच को एक नई दिशा मिली। और, इस तरह, एक नए राग ‘मोहनकौंस’ का जन्म हुआ।
शायद मणिपुरी संगीतकार और गिटारवादक चोंगथम भी उस संगीत के माध्यम से दिल्ली की गलियों में भारत को याद कर रहे थे। लेकिन, गिटार का तार टूट गया। और, टूट गया वह सब कुछ, जो जुड़ने के लिए बना था।
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