चीन के इरादों को लग सकता है झटका
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चार महीने पहले एक रविवार को कोलंबो के बंदरगाह में बिना पूर्व सूचना के एक पोत पहुंचा। यह चीनी नौसेना का पोत था और जिसका नाम था, ग्रेट वॉल नंबर 329। इसमें क्रूज मिसाइल और करीब 164 किलोग्राम का मुखास्त्र ले जाने की क्षमता है। श्रीलंका के तत्कालीन रक्षा मंत्री ने इसका बचाव करते हुए कहा कि यह सिर्फ सद्भावना यात्रा पर आया है। मगर चिंता की लकीरें दिल्ली तक खिंच गईं, जहां इस यात्रा को श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की मेहरबानी से भारतीय उपमहाद्वीप में चीन की दस्तक के रूप में देखा गया। रणनीतिक रूप से अहम श्रीलंका के लिए चीन की दूरगामी योजना जो भी रही हो, लेकिन शुक्रवार को उसकी इस योजना को धक्का लगा जब श्रीलंका के लोगों ने राजपक्षे को सत्ता से बेदखल कर दिया।
ऑस्ट्रेलिया की नेशनल यूनिवर्सिटी में स्ट्रेटेजिक ऐंड डिफेंस स्टडीज सेंटर के विजिटिंग फैलो डेविड ब्रेव्स्टर का कहना है कि तेजी से केंद्रीकृत सत्ता की ओर बढ़ रही किसी सरकार के साथ चलने का यह नुक्सान है, क्योंकि उसके सत्ता से बेदखल होने से रिश्तों पर असर पड़ता है। दरअसल हाल के वर्षों में जब पश्चिमी देशों ने राजपक्षे को मानवाधिकार हनन को लेकर आड़े हाथ लेना शुरू किया था, तब श्रीलंका की चीन से निकटता बढ़ती गई। चीन ने नए बंदरगाह और सड़कों के निर्माण के लिए अरबों डॉलर कर्ज में दिए हैं। हाल के महीनों में चीन और श्रीलंका की यह मित्रता और गाढ़ी हुई जिससे पड़ोसी भारत में एक तरह का भय का वातावरण बना। आधिकारिक तौर पर इसका खंडन किए जाने के बावजूद राजपक्षे परंपरा को तोड़कर चीन की सैन्य गतिविधियों के लिए श्रीलंका का क्षेत्र उपलब्ध कराने को राजी दिख रहे थे। चीन की मदद से बन रही आधारभूत संरचना से संबंधित परियोजनाएं राजपक्षे की प्रमुख उपलब्धियों में से हैं। कोलंबो में तटों के नजदीक आधुनिक क्रेनें खड़ी नजर आती हैं, जहां पिछले वर्ष सितंबर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 1.5 अरब डॉलर की लागत से बनने वाली पोर्ट सिटी के निर्माण की आधारशिला रखी थी। यहां मॉल, होटेल और बंदरगाह बनाया जाना है, जिसमें चीनी निवेश की हिस्सेदारी होगी। चीन इसके लिए चार अरब डॉलर का कर्ज दे रहा है।
एक स्थानीय अखबार के मुताबिक कई चीनी कंस्ट्रक्शन कंपनी ने वहां काम भी शुरू कर दिया है, जिसे देखते हुए अचानक स्थानीय लोगों में चीनी भाषा सीखने की होड़ लगी है ताकि वे दुभाषिये का काम कर सकें। मगर चीनी परियोजनाओं के कारण कुछ संशय का भी माहौल है। शी के प्रवास से पहले कोलंबों के अखबार संडे टाइम्स ने लिखा था कि चीनी परियोजाओं को जिस तरह से गोपनीय रखा जा रहा है और जिस गति से उन्हें अंजाम दिया जा रहा है, उसमें कुछ लोग साजिश की गंध महसूस कर रहे हैं और उन्हें लगता है कि कहीं श्रीलंका चीन की जेब में तो नहीं चला जाएगा।
विपक्षी नेता मतदाताओं को चीन से लिए कर्ज के बढ़ते बोझ को लेकर आगाह कर रहे थे। शुक्रवार को श्रीलंका के नए राष्ट्रपति के रूप में कमान संभालने वाले मैत्रीपाला सिरिसेना ने प्रचार के दौरान आशंका जताई थी कि 'यदि राजपक्षे की नीतियां अगले छह वर्ष तक इसी तरह जारी रहीं तो, श्रीलंका उपनिवेश बन जाएगा और हम सब गुलाम बन जाएंगे।'
अपने घोषणापत्र में उन्होंने लिखा था, सैन्य ताकत के दम पर उस गोरे आदमी ने जो जमीन हथिया ली थी उस पर अब विदेशी लोग कुछ लोगों को रिश्वत देकर कब्जा कर रहे हैं।
शुक्रवार को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले रानिल विक्रमसिंघे ने कहा है कि वह 1.5 अरब डॉलर की लागत से तैयार होने वाली पोर्ट सिटी की योजना को रद्द कर देंगे। युनाइटेड नेशनल पार्टी के आर्थिक मामलों के प्रवक्ता हर्षा डिसिल्वा ने कहा कि नई सरकार सभी बड़ी आधारभूत परियोजनाओं की 'अनियमितताओं' की जांच करेगी। उन्होंने कहा कि हम चीन को एक अच्छा मित्र मानते हैं। मगर कुछ कंपनियां जिन पर सवाल हैं, वे चीन की हैं। पिछली सरकार के विपरीत हम भारत और चीन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण रखेंगे। पिछली सरकार ने चीन के साथ अपनी बढ़ती करीबी के कारण भारत के साथ करीब-करीब शत्रुता मोल ले ली थी।
राजपक्षे के चीन के इतना करीब जाने की एक बड़ी वजह यह थी कि श्रीलंका के अमेरिका और कनाडा जैसे पारंपरिक दानदाताओं ने तमिल विद्रोहियों के खिलाफ उनकी सरकार की कार्रवाई की तीखी आलोचना की थी और अपनी मदद में भी कटौती कर दी थी। पश्चिम के कदम खींचने के बाद चीन को वहां जाने का मौका मिल गया, जोकि समृद्ध भी था और मानवाधिकार को लेकर जिसे खास एतराज भी नहीं था। इसके अलावा हिंद महासागर में चीन भी अपनी भूमिका देख रहा है। वास्तव में श्रीलंका शी की एक महत्वपूर्ण विदेशी परियोजना की धुरी बन गया है। चीन को यूरोप से समुद्री मार्ग से जोड़ने वाली इस परियोजना को सिल्क रुट के नाम से जाना जाता है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद सिरिसेना को फोन कर बधाई दी। चीन के विश्लेषकों का कहना है कि वे नहीं समझते कि राजपक्षे की पराजय से श्रीलंका में चीनी परियोजनाओं में बाधा आएगी। शंघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज के दक्षिण एशिया के विशेषज्ञ वांग देहुआ कहते हैं कि चुनाव के समय कई राजनीतिक कुछ कहते हैं लेकिन चुनाव जीतने के बाद कुछ और। मुझे नहीं लगता कि श्रीलंका की नई सरकार इन परियोजनाओं को रद्द करेगी।