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हमराह बनते भारत और चीन

Thu, 11 Apr 2013 11:31 PM IST
चिंतामणि महापात्र
चिंतामणि महापात्र Updated Thu, 11 Apr 2013 11:31 PM IST
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दक्षिण अफ्रीका के डरबन में ब्रिक्स के पांचवें शिखर सम्मेलन में जब भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और चीन के नवनियुक्त राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने-सामने हुए, तो वह उनकी पहली मुलाकात थी।

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हालांकि इसमें संदेह नहीं कि भविष्य में ऐसे और ज्यादा अवसर आएंगे, जब दो सबसे बड़ी आबादियों, सबसे पुरानी सभ्यताओं, तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं और एशिया की दो प्रमुख शक्तियों के इन दोनों प्रतिनिधियों की और मुलाकातें हों, जिसमें वे अपने अपने हितों को बढ़ावा दें और वैश्विक मामलों में रचनात्मक भूमिका निभाएं।
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वैसे भारत और चीन के नेताओं की इस मुलाकात को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना गैर-पश्चिमी और तीव्र गति से उदीयमान आर्थिक ताकतों के समूह के रूप में ब्रिक्स का दिन-ब-दिन मजबूत होना।
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वास्तव में, अमेरिका और यूरोपीय संघ के नेता ब्रिक्स को उस पश्चिमी वर्चस्व के समक्ष एक चुनौती के रूप में देखने लगे हैं, जो उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से कायम कर रखा है।

और यह सिर्फ चीन नहीं, बल्कि संगठित ब्रिक्स है, जो इस ताकत के खिलाफ बहुध्रुवीय दुनिया को साकार कर सकता है। भारत और चीन इसी ब्रिक्स के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
 
बेशक दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों का इतिहास सुखद नहीं रहा है, लेकिन वैश्विक मुद्दों के संदर्भ में उन्हें हाथ मिलाना होगा।

दिवंगत भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी और चीन के राष्ट्रपति देंग श्या ओपिंग जब द्विपक्षीय मनमुटाव को दरकिनार कर सहयोग के संभावित क्षेत्रों में संबंध सुधारने को लेकर तत्पर हुए थे, तब कई विश्लेषकों ने कल्पना नहीं की थी कि कुछ दशकों में ही चीन और भारत वैश्विक ताकत के रूप में उभरेंगे और वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक सत्ता में बड़ी भूमिका की तरफ कदम बढ़ाएंगे।

शायद इसलिए अब शी जिनपिंग और मनमोहन सिंह ने यह माना है कि वैश्विक मामलों में अकेले चलकर अपने हितों की रक्षा नहीं की जा सकती। हालांकि चीन और भारत के इस साझा प्रयास की राह में कई रोड़े भी हैं।

पहली समस्या तो निर्विवाद रूप से संवेदनशील द्विपक्षीय विवादों से जुड़ी हुई है, जो दोनों देशों के सहयोगात्मक उद्यम को खत्म कर सकती है।

क्षेत्रीय विवाद, तिब्बत मुद्दा, चीन-पाकिस्तान डब्ल्यूएमडी (जनसंहारक हथियार) सहयोग, भारत के पड़ोसी देशों में चीन की बढ़ती सक्रियता, हिंद महासागर में चीनी नौसैनिकों की बढ़ती मौजूदगी, दक्षिण चीन सागर में चीन की हठधर्मिता, असंतुलित द्विपक्षीय व्यापार और चीन की अनुचित वीजा नीति आदि कई बाधाएं हैं, जो कलह और तनाव का कारण बन सकती हैं और विश्व मंच पर भारत और चीन को महत्वपूर्ण ताकत के रूप में उभरने से रोक सकती हैं।

वैसे व्यापार संबंधी दोहा वार्ता के बाद भारत और चीन में बढ़ता सहयोग, जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन, ब्रिक्स सम्मेलन, पूर्वी एशिया सम्मेलन जैसे कई अन्य मंच हैं, जो उपरोक्त तनाव रोकने या खत्म करने में मददगार हो सकते हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल सावधानी से करने पर ही अपेक्षित परिणाम मिल पाएंगे।

दूसरा अवरोध चीन का पहाड़-सरीखा अहंकार है। वैसे कुछ हद तक, चीन का यह अहंकार उसकी आर्थिक समृद्धि से पनपा है, जो स्वाभाविक है और भारत को इसे समझने की जरूरत है।

चीन की साख वाकई उल्लेखनीय है- तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था, दूसरी सबसे बड़ी वैश्विक आर्थिक ताकत, बड़ा निर्माता, वस्तुओं का सबसे बड़ा निर्यातक, विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा धारक, विलासिता के सामान का सबसे बड़ा उपभोक्ता, आर्थिक मंदी में भी बेहतर प्रदर्शन आदि।

ऐसे प्रदर्शन चीनी नेताओं को इतना गौरवान्वित करते हैं कि वे अपनी हठधर्मिता के नकारात्मक असर को देख ही नहीं पाते। चीनी नेताओं को यह याद रखने की जरूरत है कि चीन विश्व के सिरमौर के रूप में तब तक उभर नहीं सकता, जब तक भारत सहित कई देशों के प्रति उनकी सोच में व्यापक बदलाव न आए।

सैन्य ताकत के मोर्चे पर चीन और अमेरिका में कोई मुकाबला नहीं है और अगले कुछ वर्षों तक इसमें बदलाव नहीं आने वाला। इसके अतिरिक्त, चीन बेशक विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत बन जाए, लेकिन गुणवत्ता, विकास और मानव संसाधन के मोर्चे पर वह अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पछाड़ नहीं पाएगा। लिहाजा उसे भारत सहित ब्रिक्स के अन्य सदस्य देशों की जरूरत पड़ेगी।

लेकिन यहां यह न समझा जाए कि भारत और चीन अमेरिका-विरोधी वैश्विक तंत्र खड़ा करने की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसा करना अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। चीन अमेरिका का महत्वपूर्ण आर्थिक सहयोगी है और भारत-अमेरिकी सामरिक सहयोग की राह दिनोंदिन सुखद हो रही है।

ऐसे में न चीन और न ही भारत वैश्विक मामलों में अकेले अपनी भागीदारी बढ़ा पाएंगे। दूसरी तरफ, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ब्रिक्स के सदस्य देशों और ट्रांस-अटलांटिक भागीदारों (अटलांटिक से बाहर के देश) के बीच सत्ता का खेल शुरू होने वाला है।

इसका आधार उदीयमान आर्थिक ताकतों का बढ़ना, यूरोपीय अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत और अमेरिकी अर्थव्यवस्था का धीमा विकास है। ऐसे में ब्रिक्स के सदस्य देशों के मतभेद ट्रांस-अटलांटिक भागीदारों को हावी होने का मौका दे सकते हैं, जिसमें भारत और चीन अपने लिए बेहतर जगह नहीं खोज सकते।


लिहाजा ब्रिक्स में भारत और चीन के राष्ट्राध्यक्षों की मुलाकात से यह उम्मीद जगती है कि चीनी और भारतीय हुक्मरान आपसी मतभेद कम करने में सफल होंगे और द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मतभेद की अनदेखी किए बिना भी वृहद-राजनीति को तवज्जो देते हुए आपसी सहयोग को कुशल कूटनीति के बूते मजबूत बनाएंगे।

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